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इनके सदुपयोग से व्यक्ति अमर हो जाता है।
शिवकुमार गोयल
Updated Tue, 14 Jan 2014 11:31 AM IST
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प्रत्येक प्राणी किसी-न-किसी रूप में हर क्षण खुश रहने की आकांक्षा रखता है। वह किसी ऐसे अमृतरूपी अमोघ साधन की खोज में लगा रहता है, जो उसे सुखी-समृद्ध व स्वस्थ रखे। वेदों में वायु, जल, अन्न, औषधि, विद्या, सत्य, पवित्रता, सौंदर्य आदि को आत्मा-परमात्मा बताया गया है।
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इनके सदुपयोग से व्यक्ति अमर हो जाता है। यजुर्वेद में कहा गया है, अमृतेन सर्वम। यानी भगवान अमृत हैं और हम अमृत-पुत्र।
कहा गया है, अमृत-पुत्रों को अमृत या किसी मोक्ष सुख की प्राप्ति के लिए अन्यत्र भटकने की आवश्यकता नहीं है। वेदों के अनुसार, जीवन ही अमृत है। ब्रह्मांड में तैंतीस देवों की जितनी भी गति, प्रगति तथा परमगति है, वह जीवन के लिए ही है। सुदीर्घ जीवन की कामना इसलिए की गई है कि अमृत-पुत्र मानव ज्यादा-से-ज्यादा सत्कर्म करता हुआ राष्ट्र-समाज का हित करता रहे।
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उपनिषद में कहा गया है, अमृत पद ही मोक्ष पद है। अंधकार से मुक्त होना ही मुक्ति है। ईश्वर को जान लेने पर मानव के सर्व बंधनों का विनाश हो जाता है। अविद्या का नाश, संशय का विनाश और दुष्कर्मों का क्षय होने पर जीव स्वतः मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
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पद्म पुराण में भी कहा गया है, जिस प्रकार धन से वासनाओं की तृप्ति होती है, वैसे ही सत्कर्मों में लिप्त रहने से या सांसारिक भोगों से विरत होने से हृदय और मन की संतुष्टि होती है। अतः मानव को हर क्षण वासनाओं से मुक्त होकर सत्कर्मों में जीवन व्यतीत करना चाहिए।