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ऐसा गुनाह जो बन गया पुरस्कार, मिली मौत की सजा से मुक्ति
स्वामी सत्यभक्त
Updated Fri, 05 Dec 2014 03:26 PM IST
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राजा महेंद्र कीर्ति विद्वतजनों का बहुत सम्मान किया करते थे। उनके दरबार में दूर-दूर से चित्रकार, मूर्तिकार, लेखक, कवि आदि आते और अपनी रचनाओं पर भरपूर प्रशंसा व पुरस्कार पाते थे। एक दिन किसी दूरस्थ स्थान से एक ख्यात मूर्तिकार दरबार में आया। उसने राजा को तीन मूर्तियां भेंट कीं और बोला, राजन, जब तक ये तीनों मूर्तियां आपके दरबार में रहेंगी, तब तक राज्य में सुख-समृद्धि बनी रहेगी।
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राजा ने प्रसन्न होकर मूर्तिकार को इनाम में सोने के सिक्कों से भरा एक थैला दिया। राजा ने अपने सेवकों को उन मूर्तियों के रख-रखाव का आदेश दिया, जिसका यथाविधि पालन होने लगा। एक दिन सफाई के लिए नियुक्त सेवक के हाथ से काम करते वक्त तीन में से एक मूर्ति गिरकर टूट गई।
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चूंकि मूर्तियों का संबंध राज्य के सुख और वैभव से था, और उनके लिए भारी कीमत भी चुकाई गई थी। इसलिए राजसभा में इस पर विचार हुआ कि सेवक को कौन-सी सजा सुनाई जाए। न्यायाधीश इस बात पर एकमत हुए कि सेवक को मृत्युदंड दिया जाए। राजा ने इस आदेश की तस्दीक भी कर दी।
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सेवक को सजा सुना दी गई। आदेश सुनते ही उस सेवक ने बाकी दोनों मूर्तियों को भी पटककर तोड़ दिया। इस घटना की जानकारी होते ही राजा महेंद्र कीर्ति ने उस सेवक को बुलाया और इस विचित्र बर्ताव के बारे में पूछा। सेवक ने जवाब दिया, किसी न किसी के हाथ से तो ये मूर्तियां टूटनी ही थीं। ऐसा करके मैंने दो अन्य व्यक्तियों को मौत के मुंह में जाने से बचा लिया है।
राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ और उसने उसे क्षमा कर दिया। सही कहा गया है कि दूसरों का हित चिंतन करने वाले का भगवान भी भला करते हैं। अत: सदैव स्वयं से पहले दूसरों का ध्यान रखें।