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बनारस में बंदरों के हमले ने बदल दिया था विवेकानंद का जीवन
सत्येंद्रनाथ मजूमदार
Updated Tue, 12 Jan 2016 04:00 PM IST
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स्वामी रामकृष्ण परमहंस तब जीवित थे, पर बीमार थे। स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु से हिमालय के किसी एकांत स्थान में योग समाधि के लिए जाने की अनुमति मांगी। रामकृष्ण ने कहा, आसपास के लोग जब भूख से तड़प रहे हों और चारों तरफ अज्ञान का अंधेरा छाया हो, तो तुम्हारी आत्मा क्या स्वीकार करेगी कि एकांत समाधि में जाओ?
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स्वामी रामकृष्ण के निधन के बाद दक्षिणेश्वर मंदिर की व्यवस्था बदलने लगी थी। उनके तमाम शिष्य भी यहां-वहां बिखरने लगे। स्वामी विवेकानंद भी दीन-दुखियों की सेवा के लिए निकले। फिलहाल उन्होंने तीर्थाटन का मन बनाया।
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यात्रा के दौरान कुछ समय वह बनारस में भी रहे। वहीं किसी दिन वह मां दुर्गा के मंदिर के पास से निकल रहे थे कि तभी बंदरों ने उन्हें घेर लिया। वे नजदीक आने लगे और डराने लगे। बंदर उनके हाथ में रखा प्रसाद भी छीनने लगे। स्वामी जी खुद को बचाने के लिए भागने लगे। पर बंदर तो पीछे ही पड़ गए थे, वे उन्हें दौड़ाने लगे।
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पास खड़े एक वृद्ध संन्यासी यह सब देख रहे थे। उन्होंने स्वामी जी को रोककर कहा, रुको! डरो मत, उनका सामना करो। यह सुनकर स्वामी जी तुरंत पलटे और बंदरों की तरफ बढ़ने लगे। उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि उनके ऐसा करते ही सभी बंदर तुरंत भाग गए।
इस घटना का स्वामी जी ने कई बार जिक्र किया। वह कहते थे कि बंदरों से डरकर मैं चुप रह जाता, तो स्वामी परमहंस के बाद हम लोगों की जैसी दशा हो गई थी, उसे संभालते और खुद को बचाते हुए ही हम अपना जीवन गुजार देते। वह स्वामी जी ही थे, जो संन्यासी के रूप में मुझे अभय का संदेश देकर चले गए। तभी से यह मंत्र मिला कि कभी डरकर भागो मत, पलटो और सामना करो।