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बुराई और बड़ाई के शब्दों से दूर
शिवकुमार गोयल
Updated Mon, 24 Mar 2014 07:38 PM IST
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सभी धर्मग्रंथों में किसी की निंदा करने, सुनने तथा दोष दर्शन को वाणी, कानों और नेत्रों का पाप कहा गया है। बाइबिल में लिखा है, जो बुराई सुनता है, किसी की निंदा करता है, वह व्यर्थ ही अपना शत्रु पैदा करता है। यदि दोष ढूंढना हो, तो अपना दोष तलाश कर उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
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अरब देश में उच्च कोटि के एक फकीर रहते थे। लोग उन्हें बहरा समझकर 'बहरा हातिम' कहते थे। एक दिन कुछ लोग हातिम के दर्शन के लिए पहुंचे। वह बैठे हुए थे कि सामने की दीवार पर मक्खी मकड़ी के जाल में फंस गई। एकाएक हातिम के मुंह से निकला, ऐ लोभ की मारी, अब क्यों भिनभिना रही है? तू शक्कर, शहद और कंद के लोभ में घूमती-घूमती मकड़ी द्वारा फैलाए जाल में फंसकर उसकी शिकार बन जाती है। अब फंस चुकी है, तो भुगत लोभ का परिणाम।
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सामने बैठे लोग हैरान थे कि हातिम बहरे हैं, तो उन्होंने मक्खी की भिनभिनाहट कैसे सुन ली। एक व्यक्ति ने पूछ ही लिया, तो संत हातिम ने कहा, मैं कानों में किसी की बुराई या अपनी बड़ाई के शब्द नहीं आने देना चाहता। लोग मुझे बहरा समझकर मुझसे बेकार की बातें नहीं करते। मैं बुरे शब्द सुनने से बचा रहता हूं। साथ ही, यदि कोई बहरा समझकर आपस में मेरे दोष का वर्णन करता है, तो मैं उन्हें चुपचाप दूर करने का प्रयत्न करता हूं। इस तरह बहरा बनने से मुझे अनायास कई फायदे हो जाते हैं।
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