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क्या ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी बने रहने का फायदा जानते हैं?
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 20 Dec 2013 10:34 AM IST
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राजगृह के राजकीय कोषाध्यक्ष की पुत्री भद्रा बचपन से ही प्रतिभाशाली थी। उसने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध एक युवक से विवाह कर लिया। विवाह के बाद उसे पता चला कि वह अपराधी किस्म का है।
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एक दिन उस युवक ने भद्रा की हत्या का प्रयास किया, पर भद्रा ने अपनी जान बचा ली। इस घटना ने उसमें सांसारिक सुख से विरक्ति की भावना पैदा कर दी। वह भिक्षुणी बन गई। जल्दी ही उसने शास्त्रों का अध्ययन कर लिया। उसकी ख्याति विदुषी साध्वियों में होने लगी। भद्रा को अहंकार हो गया कि वह सर्वश्रेष्ठ शास्त्रज्ञ है।
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एक बार वह श्रावस्ती पहुंची। उसे पता चला कि अग्रशावक सारिपुत्र प्रकांड पंडित माने जाते हैं। भद्रा ने सारिपुत्र को शास्त्रार्थ की चुनौती दे डाली। उसने सारिपुत्र से अनेक प्रश्न किए, जिनका सारिपुत्र ने जवाब दे दिया। अंत में सारिपुत्र ने उनसे पूछा, वह सत्य क्या है, जो सबके लिए मान्य हो?
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भद्रा यह सुनते ही सकपका गई। पहली बार उसने किसी विद्वान के समक्ष समर्पण करते हुए कहा, भंते, मैं आपकी शरण में हूं। सारिपुत्र ने उत्तर दिया, मैं बुद्ध की शरण में हूं। उनका शिष्यत्व ग्रहण करो।
भद्रा बुद्ध के पास पहुंची। बुद्ध ने उसे उपदेश देते हुए कहा, देवी, किसी भी प्रकार का अहंकार समस्त सद्कर्मों के पुण्यों को क्षीण कर देता है। धर्म के केवल एक पद को जीवन में ढालो कि मैं ज्ञानी नहीं, अज्ञानी हूं। इन शब्दों ने भद्रा को अहंकारशून्य कर दिया।