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पूर्वजन्म में था कंगाल कैसे बना अगले जन्म में मालामाल
सुदर्शन सिंह
Updated Mon, 12 Oct 2015 01:59 PM IST
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प्रतिष्ठानपुर नरेश सातवाहन आखेट को निकले, और सैनिकों से अलग होकर वन में भटक गए। भटकते भूखे-प्यासे राजा सातवाहन एक भील की झोपड़ी पर पहुंचे। भील उन्हें पहचानता नहीं था, फिर भी अतिथि समझकर उसने उनका स्वागत किया। भील की झोपड़ी में कुछ था नहीं, सिवाय सत्तू के। राजा ने सत्तू खाकर भूख मिटाई। रात्रि हो चुकी थी।
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रात्रि शीतकाल की थी। शीतल वायु चल रही थी। भील स्वयं झोपड़ी से बाहर सोया और राजा सातवाहन को उसने झोपड़ी में सुलाया। रात्रि में वर्षा भी हुई। भील भीगता रहा। उसे सर्दी लग गई, और उसी रात उसकी मृत्यु हो गई।
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प्रातःकाल राजा के सैनिक उन्हें ढूंढते हुए पहुंचे। सातवाहन ने सम्मान से भील का अंतिम संस्कार कराया। भील की पत्नी को उन्होंने बहुत-सा धन दिया। यह सब करके भी नरेश को शांति नहीं हुई। वह नगर तो लौट आए, किंतु उदास रहने लगे। उनका शरीर दिनोंदिन दुर्बल होने लगा। राजा को चिंता का रोग था, और उसकी औषधि किसी के पास नहीं थी।
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राजा की चिंता थी, बेचारे भील ने मुझे सत्तू दिया, मुझे झोपड़ी में सुलाकर खुद बाहर सोया, और उसकी मृत्यु हो गई। दान और अतिथि-सत्कार का ऐसा ही फल होता हो, तो कौन दान-पुण्य करेगा?
कई महीने हो गए। एक दिन भगवती सरस्वती के कृपा-पात्र पंडित वररुचि प्रतिष्ठानपुर पहुंचे। राजा की चिंता का समाचार पाकर वह राजभवन पहुंचे, और राजा को लेकर नगरसेठ के घर गए। नगरसेठ के छोटे पुत्र को जब राजा के सामने लाया गया, तो वह अबोध बालक सहसा बोल उठा, राजन, मैं आपका बहुत कृतज्ञ हूं। आपको सत्तू देने के फल से भील का शरीर छोड़कर मैं नगरसेठ का पुत्र हुआ हूं, और उसी पुण्य के प्रभाव से मुझे पूर्वजन्म का स्मरण भी है। यह देखकर राजा की चिंता दूर हो गई।