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इसे पढ़कर डॉक्टरों के बारे में आपकी सोच बदल जाएगी
साधु वासवानी
Updated Fri, 19 Sep 2014 03:29 PM IST
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इंग्लैंड के शल्य चिकित्सक लॉर्ड मोनिहन अपने चिकित्सा कार्य में अत्यंत दक्ष थे। वह सभा-गोष्ठियों में भी जाते, तो अपने साथ ऑपरेशन में काम आने वाले उपकरण साथ ले जाना नहीं भूलते। क्योंकि कई बार ऐसी स्थिति आती कि दर्शकों में ही उनका कोई मरीज होता।
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और डॉ मोनहिन जरूरी समझते, तो वहीं ऑपरेशन कर देते। भीड़-भाड़ वाली जगहों में भी वह बड़ी आसानी से ऑपरेशन कर लेते थे। उनका एक विद्यार्थी रेमनसे उनसे बहुत प्रभावित था। एक दिन उसने पूछा, इतनी भीड़-भाड़ वाली जगहों में भी आप पूरी एकाग्रता से रोगी का ऑपरेशन कैसे कर लेते हैं?
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डॉ मोनिहन का उत्तर था, जब मैं ऑपरेशन करता हूं, उस समय तीन व्यक्ति ही होते हैं। एक मैं, दूसरा रोगी और तीसरा मेरा भगवान, ऐसे में विचलित होने का प्रश्न ही कहां उठता है?
रेमनसे ने फिर पूछा, लेकिन मुझे बात इतनी ही नहीं लगती। जरूर कोई दैवीय शक्ति आपकी सहायता करती है। जब आप ऑपरेशन करते हैं, उस वक्त उपचार की कोई सुविधा तो रहती नहीं।
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मोनिहन ने कहा, ऐसी विकट स्थितियों में उस मां की कल्पना करता हूं, जिसका बच्चा बीमार है और मीलों दूर तक कोई अस्पताल नहीं हैं। वह अस्पताल की परवाह किए बिना अपने बच्चे को रोगमुक्त देखना चाहती है। मैं अपने आपको उसकी जगह देखता हूं।