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यकीन मानिए, मृत्यु करीब आती है तो हर व्यक्ति को यह बात याद आती है
रामजी उपाध्याय
Updated Fri, 24 Jul 2015 12:10 PM IST
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भक्त आनंद राज भगवान चतुर्भुज के मंदिर में जाकर प्रतिदिन मुक्ति के लिए प्रार्थना करते थे। प्रार्थना सुनकर भगवान एक दिन प्रकट हो गए। उन्होंने आनंद से कहा, मुक्ति प्राप्त कर ले। आनंद घबरा गए, आज ही, इसी क्षण! वह ऐसा सोच भी नहीं सकते थे। वह घबराकर बोले, दीनबंधु, ठीक है। मुझे एक माह की मोहलत दे दें। बच्चे की शादी कर लूं और उसे घर का भार सौंप दूं।
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भगवान वायदे के अनुसार एक माह बाद पुनः प्रकट हुए। उन्होंने फिर कहा, आनंद, शादी हो गई। अब भार सौंपो और मुक्त हो जाओ। आनंद ने सोचा कि बुरे फंसे। कुछ सोचने के बाद उन्होंने कहा, नाती का मुंह देख लूं। एक साल बाद भगवान फिर प्रकट हुए। इस बार आनंद गिड़गिड़ाकर बोले, प्रभु, क्षमा करें। मैं स्वयं ही आपके पास आ जाऊंगा। भगवान चले गए। आनंद निश्चिंत होकर नाती-पोतों में रम गए।
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इस तरह कुछ बरस बीते। आनंद बीमार हुए। उनकी उम्र बढ़ रही थी और शरीर को भी ढलना ही था। बीमार और बूढ़े बाप के प्रति पुत्र और बहू के साथ नाती-पोते भी उपेक्षा बरतने लगे। बरसों तक बीमारी की पीड़ा झेलने के बाद आनंद को भगवान की याद आई। लेकिन उनके पास जाने की हिम्मत फिर भी नहीं होती थी। तभी किसी दिन उनके गुरु नारायण स्वामी आए और कहने लगे, भगवान को याद करो।
आनंद ने कहा, भगवान शायद ही आएं। वह तो पहले ही मुक्ति दे रहे थे। मैंने ही मना कर दिया। गुरु ने फटकार लगाई। आनंद की मानो आंखें खुल गईं। उन्हें लगा कि बिना आसक्ति और मोह की निवृत्ति के मुक्ति मांगकर उन्होंने गलती की। उन्हें अपने भीतर कुछ पिघलता-सा लगा। उनका मोह और लोभ बह रहा था, जबकि आसक्ति और कामनाएं बिखर रही थीं।