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नहीं जानते होंगे सबसे पहले किसे भोजन करना चाहिए

Fri, 13 Feb 2015 08:18 AM IST
सत्यभक्त
सत्यभक्त Updated Fri, 13 Feb 2015 08:18 AM IST
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budh sangh.

बुद्ध के संघ में कुछ भिक्षु 'छह वर्गीय' कहलाते थे। इनमें से कई भिक्षु संसार त्यागी बन जाने पर भी अपने आराम का दूसरों से अधिक ध्यान रखते थे। प्रत्येक पड़ाव पर वे सबसे पहले पहुंचकर निवास, स्थान और शय्याओं पर कब्जा कर लेते थे कि यह हमारे उपाध्याय के लिए है, यह हमारे आचार्य के लिए है, यह हमारे लिए है। एक दिन विहार में ठहरने के सभी स्थानों पर इन साधुओं ने कब्जा कर लिया। इस तरह अधिकार कर लेने के बाद सारिपुत्र को सोने की जगह न मिल पाई। वह रात बाहर ही किसी वृक्ष के नीचे बैठे रहे।

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रात्रि का कुछ समय शेष रहने पर बुद्ध जागे। तभी सारिपुत्र को खांसी आ गई। बुद्ध ने कहा कि वहां कौन है? सारिपुत्र ने अपना नाम लिया। बुद्ध ने पूछा सारिपुत्र! तुम वहां क्यों बैठे हो? सारिपुत्र ने सारी बात कह सुनाई। भगवान ने भिक्षु-संघ को संबोधित किया, भिक्षुओ! क्या छह वर्गीय भिक्षु सचमुच आगे-आगे जाकर विहार और शय्याएं दखल कर लेते हैं?
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यह सत्य है, भगवन! संघ में से किसी ने कहा। बुद्ध ने उनको धिक्कारते हुए कहा, कैसे हैं ये भिक्षु, जो आगे जाकर विहार और शय्याएं दखल कर लेते हैं? फिर कुछ पल रुककर बुद्ध ने कहा, भिक्षुओ, तुम्हें मालूम है कि प्रथम आसन, प्रथम जल, प्रथम परोसा किसे मिलना चाहिए? किसी ने कहा, भगवन, जो क्षत्रिय-कुल से प्रव्रजित हुआ हो। किसी ने ब्राह्मण-कुल का नाम लिया, तो किसी ने कहा कि जो गृहपति (वैश्य) कुल से प्रव्रजित हुआ हो।
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इसी प्रकार अन्य व्यक्तियों ने सूत्रपाठ करने वाले, विनयधर, धर्म व्याख्याता आदि के नाम बताए। बुद्ध ने कहा, भिक्षुओ! जाति और कुल के आधार पर किसी को सम्मान नहीं दिया जा सकता। इसलिए जो पहले प्रव्रजित हुआ था, वही बड़ा है, चाहे वह किसी जाति का हो। इसी नियम के अनुसार आदर-सत्कार, प्रथम आसन, प्रथम जल, प्रथम परोसा-भोजन आदि दिया जाना चाहिए।

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