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धनवान बनने से पहले जरा इन बातों को जान लें

Wed, 19 Feb 2014 03:26 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Wed, 19 Feb 2014 03:26 PM IST
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Because of craving Incest is increased

सभी धर्मशास्त्रों में धन-संपत्ति तथा अन्य सांसारिक पदार्थों के प्रति तृष्णा को पतन का मूल कारण बताया गया है। महाभारत के वन पर्व में कहा गया है, तृष्णा सर्वाधिक पापमयी है। तृष्णा के कारण मानव घोर पाप कर्म करने में भी नहीं हिचकिचाता।

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विष्णु पुराण में कहा गया है, जो व्यक्ति धन-संपत्ति को ईश्वर की धरोहर मानकर उसका सत्कर्मों में उपयोग करता है और सांसारिक वस्तुओं पर अपना अधिकार नहीं मानता, वह तृष्णा से बचा रह सकता है।
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पुराण में कहा गया है, इस पृथ्वी पर जितने धान, जौ, सुवर्ण, पशु आदि द्रव्य हैं, वे सब यदि किसी एक पुरुष को मिल जाएं, तो भी उसे संतोष नहीं होगा। पुरुष की आशा-आकांक्षा की कोई सीमा नहीं है। तृष्णा समुद्र के समान है, वह कभी भरती ही नहीं।
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धर्मशास्त्रों में तो यह भी कहा गया है कि न्यायपूर्वक अर्जित धन का दसवां हिस्सा सेवा-परोपकार आदि सत्कर्मों पर अवश्य व्यय किया जाना चाहिए। जो अधिक धन अर्जित कर लेते हैं, उन्हें पांचवां अंश अभावग्रस्त लोगों के कल्याण पर खर्च करना चाहिए।


पार्वती से भगवान शिव कहते हैं, देवी, अर्थ को अनर्थ का मूल समझो। धनवान पर सदा पांच शत्रु चोट करते हैं-राजा, चोर, उत्तराधिकारी भाई-बंधु, अन्यान्य प्राणी और क्षय। वस्तुतः आज यह बात साबित हो रही है कि धन की बढ़ती हुई तृष्णा के कारण ही अनाचार और भ्रष्टाचार बढ़ रहे हैं।

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