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सच जानने आए शिष्य के साथ गुरु ने किया यह कैसा व्यवहार
संत नागपाल
Updated Wed, 08 Jul 2015 12:11 AM IST
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गुरु गेहूं के एक खेत के पास खड़े थे। उन्हें वहां खड़ा देख कुछ शिष्य भी उनके पास आ गए। कुछ आते ही गुरु की सेवा में जुट गए, जबकि कुछ शिष्य अपने साथी शिष्यों से चर्चा करने लगे। उन्हीं शिष्यों में से एक ने अपनी समस्या या कहें कि जिज्ञासा गुरु के सामने रखी।
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वह शिष्य परमात्मा के लिए उत्सुक था, जिसे वेदांत की परंपरा में सत्य भी कहते हैं। परमात्मा या सत्य के संबंध में शिष्य ने गुरु से पूछा, सत्य मुझे प्राण से भी ज्यादा प्रिय लगता है, इसलिए मैं उसे पाना चाहता हूं। उसकी ओर ले-जानेवाला मार्ग कौन सा है? मैं उसकी खोज कैसे करूं?
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गुरु उसकी बात सुनकर चुप रहे, मानो उन्होंने कुछ सुना ही न हो। वह शिष्य भी कुछ पल उत्तर की प्रतीक्षा करता रहा और फिर दूसरी दिशा में देखने लगा, जैसे वह गुरु के पास से जाने के बारे में सोच रहा हो। तभी गुरु ने पूछा, तुमने अपने दाएं हाथ में कौन-सी अंगूठी पहनी है? शिष्य ने कहा, यह मेरे पिता की निशानी है। अंतिम समय में उन्होंने मुझे बड़े स्नेह से यह दिया था। इसे मैं हमेशा पहने रहता हूं।
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यह सुनकर गुरु ने कहा, इसे मुझे दे दो। शिष्य ने उंगली से अंगूठी निकालकर विनयपूर्वक गुरु को सौंप दी। गुरु ने तत्क्षण वह अंगूठी खेत के बीच गेहूं की बालियों की ओर उछाल दी। शिष्य अचरज मिश्रित भय से चिल्लाया, यह आपने क्या किया? अब मुझे सब कुछ छोड़कर अंगूठी की खोज करनी पड़ेगी। वह मेरे लिए बहुमूल्य है! उसे मैं किसी भी कीमत पर पाना चाहता हूं।
गुरु ने शांत स्वर में जवाब दिया, वह तो तुम्हें मिल ही जाएगी, पर उसे पा लेने पर तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भी मिल जाएगा। सत्य का पथ भी ऐसा ही होता है। वह अन्य सभी पथों से अधिक मूल्यवान और जरूरी है।