{"_id":"701ddcae426e0f31414e4ac503ffe586","slug":"and-krishna-s-chariot-turned-to-vidur-house-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"श्रीकृष्ण को आखिर विदुर के घर क्यों जाना पड़ा?","category":{"title":"Metaphysical","title_hn":"परामनोविज्ञान","slug":"metaphysical-parasychology"}}
श्रीकृष्ण को आखिर विदुर के घर क्यों जाना पड़ा?
महाभारत
Updated Thu, 04 Sep 2014 12:45 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
द्वारकाधीश कृष्ण पांडवों के संधि-दूत बनकर आ रहे थे। दुःशासन का भवन, जो राजभवन से भी सुंदर था, वासुदेव के लिए खाली कर दिया गया था। धृतराष्ट्र ने आदेश दिया था, अश्व, गज, रथ, गाएं, रत्न, आभरण और दूसरी जो भी वस्तुएं हमारे यहां सर्वोत्तम हों, वे दुःशासन के भवन में एकत्र कर दी जाएं। वे सब श्रीवासुदेव को भेंट कर दी जाएं।
विज्ञापन
दुर्योधन के मन में प्रेम नहीं था, पर वह ऊपर से बड़े ही उत्साहपूर्वक पिता की आज्ञा का पालन कर रहा था। उसने भवन, मार्ग और तोरण-द्वार सजाने के लिए राज्य के सब कारीगर जुटा रखे थे। ऐसी साज-सज्जा की गई थी कि वह हस्तिनापुर इतिहास के लिए नवीन थी।
विज्ञापन
द्वारकाधीश कृष्ण का रथ आया। नगर से बाहर जाकर दुर्योधन ने भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर आदि वृद्ध सम्मान्य पुरुषों तथा भाइयों के साथ उनका स्वागत किया। उनके साथ सब नगर में आए।
विज्ञापन
'आप पधारें!' बड़ी नम्रता से दुर्योधन ने मार्ग दिखलाया। मगर वासुदेव बोले, राजन, आपके उदार स्वागत के लिए धन्यवाद! किंतु दूत का कर्तव्य है कि जब तक उसका कार्य न हो जाए, वह दूसरे पक्ष के यहां भोजनादि न करे।
दुर्योधन को बुरा लगा, किंतु खुद को संयत करके वह बोला, आप हमारे सम्मान्य संबंधी हैं। आप हमारा स्वागत क्यों अस्वीकार कर रहे हैं? श्रीकृष्ण ने जवाब दिया, राजन, जो भूख से मर रहा हो, वह जहां चाहे भोजन कर लेता है, किंतु जो भूखा नहीं है, वह दूसरे घर तभी भोजन करता है, जब उसके प्रति वहां प्रेम हो। भूख से मैं मर नहीं रहा हूं और प्रेम आपमें नहीं है।
द्वारकानाथ का रथ मुड़ गया विदुर के भवन की ओर। उनके लिए जो दुःशासन का भवन सजाया गया था, उसकी ओर तो उन्होंने देखा भी नहीं।