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एक महामूर्ख जो बन गया महाविद्वान, दुनिया करती है उसे नमन
- विष्णु शर्मा
Updated Wed, 13 Jan 2016 12:45 PM IST
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कहने को उसका नाम राम था, लेकिन व्यावहारिक जीवन में अत्यंत दरिद्र, मंदबुद्धि और इस कारण लोगों की नजरों में वह हमेशा हास्यास्पद ही रहता। सहपाठी उसका मजाक उड़ाते। उसकी ऊल-जलूल हरकतों का कोई अर्थ नहीं होता, उनसे जड़ता ही झलकती।
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उसकी मूर्खताओं को देखते हुए सहपाठी उसे बरधराज (बैलों का राजा) कहकर पुकारने लगे थे। वह अपने सहपाठियों की हरकतों से तंग आकर कहीं और चला गया। कोई गंतव्य तो था नहीं, बहुत देर तक इधर-उधर घूमता रहा। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे, जिससे उपहास न हो।
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सोचते-सोचते वह एक कुएं के पास जा बैठा। वहां कुछ महिलाएं पानी भर रही थीं। राम उन्हें देखने लगा। देखते-देखते उसका ध्यान जगत के पत्थर पर गया और फिर रस्सी पर भी। पानी खींचते हुए रस्सी की बार-बार की रगड़ से जगत पर लगे पत्थर पर निशान पड़ गया था। एक महिला ने उसे पहचानकर कटाक्ष किया, तू इस जगत का पत्थर ही हो जाता, तो बदल जाता।
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देख, यह पत्थर भी रस्सी की रगड़ से इतना घिस गया कि उस पर निशान पड़ गया है। बात मजाक में कही गई थी, लेकिन राम के मन को छू गई। वह सोचने लगा कि लगातार अभ्यास करूं, तो मैं बुद्धिमान क्यों नहीं बन सकता? उसने अभ्यास करने का निश्चय किया और पाठशाला लौट आया।
उसके निरंतर अभ्यास का ही नतीजा था कि अपने विषय में उसने इतना ज्ञान हासिल कर लिया कि एक दिन व्याकरण का उद्भट विद्वान बना। उसकी गिनती संस्कृत के बड़े-बड़े विद्वानों में होने लगी। कुछ वर्ष बाद उसने लघुसिद्धांत कौमुदी नामक ग्रंथ की रचना की। उसकी विद्वत्ता देखकर लोग उसे अब बरधराज की जगह ‘वरदराज’ कहने लगे।