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विवाह पंचमी: दूर होती है विवाह में आने वाली बाधाएं, जानिए क्या है श्रीराम और सीताजी के विवाह की कथा

Sun, 20 Dec 2020 07:05 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन, वास्तुविद
अनीता जैन, वास्तुविद Published by: विनोद शुक्ला Updated Sun, 20 Dec 2020 07:05 AM IST
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vivah panchami 2020 lord ram and sita vivah katha
भगवान राम और माता सीता

मार्गशीर्ष (अगहन) मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम तथा जनक पुत्री जानकी का विवाह हुआ था। तभी से इस पंचमी को 'श्रीपंचमी' या 'विवाहपंचमी' पर्व के रूप में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। श्रीरामचरितमानस में महाकवि गोस्वामी तुलसीदासजी ने त्रेता युग के भगवान श्री राम और जनकनन्दिनी सीता के विवाह का वर्णन बड़ी ही सुंदरता से किया है। इनका विवाह पूरी रामायण की सबसे महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि प्रकृति के नियंता को ज्ञात था कि जीवन में चौदह वर्ष का वनवास और रावण जैसे अहंकारी असुर का वध धैर्ये के वरण के बगैर संभव नहीं है। अतः श्रीराम-जानकी का विवाह मुख्य रूप से यह एक बड़े संघर्ष से पूर्व धैर्यवरण की घटना है। भगवान श्रीराम और सीताजी का विवाह रामायण में रावण के अंत के लिए बढ़ाया हुआ एक पग भी है ,क्योंकि रावण के अंत का सृजन सीताजी के हरण की घटना से ही प्रारम्भ हो गया था।

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विवाह पंचमी की कथा 

रामायण के अनुसार त्रेता युग में राजा जनक बहुत ही विद्वान एवं धार्मिक विचारों वाले राजा थे। शिव के प्रति इनकी अपार श्रद्धा थी। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवन शंकर ने इन्हें अपना धनुष प्रदान किया था। यह धनुष अत्यंत भारी था। जनक की पुत्री सीता धर्मपरायण थीं, वे नियमित रूप से पूजास्थल की साफ़-सफाई करती थीं। एक दिन की बात है जनक जी जब पूजा करने आए  तो उन्होंने देखा कि शिव का धनुष एक हाथ में  लिए हुए सीता पूजा स्थल की सफाई कर रही हैं। इस दृश्य को देखकर जनक जी आश्चर्यचकित रह गए कि इस अत्यंत भारी धनुष को एक सुकुमारी ने कैसे उठा लिया। उसी समय जनक जी ने तय कर लिया कि सीता का पति वही होगा जो शिव के इस धनुष पर प्रत्यंचा चढाने में सफल होगा। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार राजा जनक ने धनुष-यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में  सम्पूर्ण संसार के राज , महाराजा, राजकुमार तथा वीर पुरुषों को आमंत्रित किया गया। समारोह में अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण अपने गुरु विश्वामित्र के साथ उपस्थित हुए। जब धनुष पर प्रत्यंचा चढाने की बारी आई तो वहाँ उपस्थित किसी भी वीर से प्रत्यंचा तो दूर धनुष हिला तक नहीं। इस स्थिति को देख राजा जनक को अपने आप पर बड़ा क्षोभ हुआ।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है -
''अब अनि कोउ माखै भट मानी ,वीर विहीन मही मैं जानी 
तजहु आस निज निज गृह जाहू, लिखा न विधि वैदेही विवाहु 
सुकृतु जाइ जौ पुन पहिहरऊँ, कुउँ रि  कुआरी रहउ का करऊँ  
जो तनतेऊँ  बिनु भट भुविभाई , तौ पनु करि होतेऊँ न हँसाई ''  

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सभी कष्ट होते हैं दूर

राजा जनक के ऐसे वचन सुनकर लक्ष्मण जी काफी विचलित हुए, तभी ऋषि विश्वामित्र ने प्रभु श्रीराम को आज्ञा देते हुए कहा -हे राम! उठो ,शिवजी का धनुष तोड़ो और जनक का संताप मिटाओ। गुरु विश्वामित्र के वचन सुनकर श्रीराम तत्पर उठे और धनुष पर प्रत्यंचा चढाने के लिए आगे बढे। यह दृश्य देखकर सीताजी के मन में उल्लास छा गया। प्रभु की ओर देखकर सीताजी ने मन ही मन निश्चय किया कि यह शरीर इन्हीं का  होकर रहेगा या फिर रहेगा ही नहीं। माता सीता के मन की बात श्रीराम जान गए और उन्होंने देखते ही देखते भगवान शिव का महान धनुष उठाया। इसके बाद उस पर प्रत्यंचा चढ़ाते ही एक भयंकर ध्वनि के साथ धनुष टूट गया। यह देखकर सीताजी  के मन को संतोष हुआ।

माता सीता श्रीराम के निकट आईं , सखियों के बीच में जनकपुत्री ऐसे शोभित हो रही थीं जैसे बहुत सी छवियों के बीच में महाछवि हो। तब एक सखी ने सीता से जयमाला पहनाने को कहा , उस समय उनके हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो डंडियों सहित दो कमल चंद्रमा को डरते हुए जयमाला दे रहे हों । तब सीताजी ने श्रीराम के गले में जयमाला पहनाई , यह दृश्य देखकर देवता फूल बरसाने लगे , नगर और आकाश में बाजे बजने लगे । श्रीराम-सीता की जोड़ी इस प्रकार सुशोभित हो रही थी , मानो सुंदरता और श्रृंगार रस एकत्र हो गए हों। पृथ्वी,पाताल और स्वर्ग में यश फ़ैल गया कि श्रीराम ने धनुष तोड़ कर सीता जी का वरण कर लिया ।  इसके बाद जनक जी ने दूत को अयोध्या भेजा और तब राजा दशरथ अपनी प्रजा सहित जनकपुरी पहुंचे व श्रीराम और सीता का विवाह बहुत ही धूमधाम से संपन्न हुआ।

सभी कष्ट होते हैं दूर
प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष की शुक्ल पंचमी को राम मंदिरों में विशेष उत्सव मनाया जाता है । आज के दिन भगवान श्रीराम का विधिवत पूजन और सांकेतिक रूप से या उत्सव के रूप में भगवान का विवाह सीताजी से कराया जाए तो जीवन में सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। जिनके वैवाहिक जीवन में संतान या परिवार से सम्बंधित कोई भी समस्या है, वे इस दिन श्रीराम और सीताजी का पूजन करके श्रीराम रक्षा स्रोत का पाठ करें तो अवश्य लाभ होगा।

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