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Sakat Chauth 2024: संकटों को हरने वाली संकष्टी चतुर्थी आज, जानिए गणेशजी और चंद्रदेव की पूजा का महत्व
Mon, 29 Jan 2024 04:13 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Mon, 29 Jan 2024 04:13 AM IST
सार
संतानों को सभी कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत माघ कृष्णपक्ष चतुर्थी को मनाया जाता है। इसे संकष्टी चतुर्थी, तिलकुटा चौथ या माघी चौथ भी कहते हैं।
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शुक्लपक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक और कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
Sakat Chauth 2024 Puja Importance: चतुर्थी तिथि के देव के रूप में सुखकर्ता श्रीगणेश सर्वत्र पूजे जाते हैं। संतानों को सभी कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत माघ कृष्णपक्ष चतुर्थी को मनाया जाता है। इसे संकष्टी चतुर्थी, तिलकुटा चौथ या माघी चौथ भी कहते हैं। गणेश जी की कृपा पाने के लिए इस व्रत को कोई भी कर सकता है, लेकिन मुख्यरूप से सुहागन स्त्रियां ही इस व्रत को परिवार की खुशहाली के लिए करती हैं।
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व्रत का महत्व
इस दिन विघ्नहर्ता, मंगलकारी श्रीगणेश, चौथ माता और चंद्रदेव की विधिपूर्वक पूजा का विधान है। नारदपुराण के अनुसार मन के स्वामी चंद्रमा और बुद्धि के स्वामी श्रीगणेश के संयोग के परिणामस्वरूप इस चतुर्थी व्रत को करने से मानसिक शांति, कार्यों में सफलता, प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। इस दिन किया गया व्रत और पूजा पाठ वर्ष पर्यंत सुख-समृद्धि और पारिवारिक विकास में सहायक सिद्ध होता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने से कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है।
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ऐसे प्रसन्न होंगे गणेश
प्रातः काल व्रत का संकल्प लेकर व्रती सुबह से चंद्रोदय काल तक नियमापूर्वक रहें। संध्याकाल में लकड़ी के पाटे पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर ईशान कोण में मिट्टी के गणेश व चौथ माता की तस्वीर स्थापित कर रोली, मोली, अक्षत, फल, फूल, शमीपत्र, दूर्वा आदि से विधिपूर्वक पूजन करें। फिर मोदक तथा गुड़ में बने हुए तिल के लड्डू का नैवेद्य अर्पण करें और आरती कर चौथ माता एवं गणेशजी की कहानी सुनें।
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ऐसे प्रसन्न होंगे चंद्रदेव
शास्त्रों में वर्णित है कि सौभाग्य,पुत्र, धन-धान्य,पति की रक्षा एवं संकट टालने के लिए चंद्रमा की पूजा की जाती है। चंद्रोदय होने पर लोटे में शुद्ध जल भरकर उसमें लाल चन्दन,कुश,पुष्प,अक्षत आदि डालकर चन्द्रमा को यह मंत्र बोलते हुए अर्घ्य दें।'गगनार्णवमाणिक्य चंद्र दाक्षायणीपते। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक'। अर्थात-'गगन रुपी समुद्र के माणिक्य चन्द्रमा ! दक्ष कन्या रोहिणी के प्रियतम !गणेश के प्रतिविम्ब !आप मेरा दिया हुआ यह अर्घ्य स्वीकार कीजिए'।चन्द्रमा को यह दिव्य तथा पापनाशक अर्घ्य देकर परिवार की कुशलता की प्रार्थना करें।
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इस दिन दान का महत्व
मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न तिल और माता लक्ष्मी के द्वारा प्रकट किए गन्ने के रस से बने गुड का तिलकुटा बनाकर उसे दान करना चाहिए। व्रत करने वालों के लिए यदि संभव हो तो दस महादान जिनमें अन्नदान, नमक का दान, गुड का दान, स्वर्ण दान,तिल का दान, वस्त्र का दान, गौघृत का दान, रत्नों का दान, चांदी का दान और दसवां शक्कर का दान करें। ऐसा करके प्राणी दुःख-दरिद्र,कर्ज, रोग और अपमान के विष से मुक्ति पा सकता है। इस दिन गाय और हाथी को गुड खिलाने से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। विधार्थी इस दिन 'ॐ गं गणपतये नमः' का 108 बार जप करके प्रखर बुद्धि और उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। 'ॐ एक दन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात' का जप जीवन के सभी संकटों और कार्य बाधाओं को दूर करेगा।