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Datta Jayanti 2020: भगवान दत्तात्रेय जयंती आज, ऐसे करें उपासना और जानिए कथा
Tue, 29 Dec 2020 01:38 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Tue, 29 Dec 2020 01:38 PM IST
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दत्तात्रेय जयंती 2020
- फोटो : pinterest
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हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा तिथि पर भगवान दत्तात्रेय की जयंती मनाई जाती है। इस बार यह 29 दिसंबर को है। भगवान दत्तात्रेय की त्रिदेवों के रूप में पूजा होती है। शास्त्रों के अनुसार भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव तीनों का सम्मलित स्वरूप माना जाता है।
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दत्तात्रेय ने बनाए 24 गुरु
भगवान दत्तात्रेय ने अपने जीवन में कुल मिलाकर 24 गुरु बनाए थे। इस कारण से भगवान दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों के गुण और रूप मिलते हैं। इनके गुरुओं में पृथ्वी, जल,अग्नि, वायु, आकाश, समुंद्र, चन्द्रमा, सूर्य सर्प, मकड़ी, झींगुर, पतंगा, भौंरा, मधुमक्खी, मछली, कौआ, कबूतर, हिरण, अज़गर, हाथी, बालक, लोहार, कन्या और पिंगला नामक वेश्या को भी इन्होंने अपना गुरु स्वीकार किया। भगवान दत्तात्रेय द्वारा इन सबको गुरु स्वीकार करने के पीछे का उद्देश्य यह कि जीवन में जिस किसी से भी ज्ञान, विवेक और कोई भी शिक्षा मिले, उसे ही अपना गुरु मान लेना चाहिए।
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भगवान दत्तात्रेय की उपासना
पूर्णिमा तिथि पर सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर भगवान दत्तात्रेय की फोटो को स्थापित करें। इसके बाद उनकी प्रतिमा पर पीले फूल और पीले रंग की चीजें अर्पित करें। फिर इसके बाद इन मंत्रों का जाप करें। ॐ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा और ॐ महानाथाय नमः
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भगवान दत्तात्रेय जयंती की तिथि
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: 29 दिसंबर, सुबह 07 बजकर 54 मिनट से
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 30 दिसंबर, सुबह 8 बजकर 57 मिनट तक
भगवान दत्तात्रेय जन्म कथा
एक बार की बात है जब नारदजी ने अनुसूया के पति धर्म की सराहना तीनों देवियों से की तो माता पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती ने अनुसूया की परीक्षा लेने की ठान ली। सती अनसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने के लिए त्रिदेवियों के अनुरोध पर तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु और शिव पृथ्वी लोक पहुंचे। अत्रि मुनि की अनुपस्थिति में तीनों देव साधु के भेष में अनुसूया के आश्रम में पहुंचे और माता अनसूया के सम्मुख भोजन करने की इच्छा प्रकट की। देवी अनुसूया ने अतिथि सत्कार को अपना धर्म मानते हुए उनकी बात मान ली और उनके लिए प्रेम भाव से भोजन की थाली परोस लाई।
परन्तु तीनों देवताओं ने माता के सामने यह शर्त रखी कि वह उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन कराए। इस पर माता को संशय हुआ।इस संकट से निकलने के लिए उन्होंने ध्यान लगाकर जब अपने पति अत्रिमुनि का स्मरण किया तो सामने खड़े साधुओं के रूप में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश खड़े दिखाई दिए। माता अनसूया ने अत्रिमुनि के कमंडल से जल निकलकर तीनों साधुओं पर छिड़का तो वे छह माह के शिशु बन गए। तब माता ने शर्त के मुताबिक उन्हें भोजन कराया।
वहीं बहुत दिन तक पति के वियोग में तीनों देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद मुनि ने उन्हें पृथ्वी लोक का वृत्तांत सुनाया। तीनों देवियां पृथ्वी लोक पहुंचीं और माता अनसूया से क्षमा याचना की। तीनों देवों ने भी अपनी गलती को स्वीकार कर माता की कोख से जन्म लेने का आग्रह किया। इसके बाद तीनों देवों ने दत्तात्रेय के रूप में जन्म लिया।तीनों देवों को एकसाथ बालरुप में दत्तात्रेय के अंश में पाने के बाद माता अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के चरणों का जल तीनों देवो पर छिड़का और उन्हें पूर्ववत रुप प्रदान कर दिया।