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World Teachers Day 2023: इन शिक्षिकाओं को सलाम, किसी ने दिलाई पढ़ने की आजादी तो किसी ने उठाया शिक्षा का खर्च

Wed, 04 Oct 2023 04:23 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवानी अवस्थी Updated Wed, 04 Oct 2023 04:23 PM IST
सार

वर्तमान में भी कई महिला शिक्षिकाएं हैं, जो बच्चों की पढ़ाई के लिए सराहनीय कार्य कर रही हैं। किसी छात्र की पढ़ाई में गरीबी रुकावट बनी तो उन्होंने मदद की। पढ़ाई तो दूर कई छात्रों को मुश्किल से भोजन मिल पाता था, लेकिन इन शिक्षिकाओं ने पढ़ाने के साथ-साथ खाने का भी प्रबंध किया।

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World Teachers Day 2023 Story Of Kind Female Teachers Who Help Students To Secure Their Future in Hindi
Happy World Teachers Day - फोटो : Istock

विस्तार

प्रभा किरण / वसुंधरा

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भारत में शिक्षक दिवस 5 सितंबर को मनाया जाता है, हालांकि वैश्विक स्तर पर 5 अक्तूबर को विश्व शिक्षक दिवस मनाते हैं। 5 अक्तूबर 1966 को पेरिस में एक कॉन्फ्रेंस का आयोजन हुआ, जिसमें शिक्षकों के अधिकारों, जिम्मेदारियों संबंधित कई मुद्दों पर आईं सिफारिशों को यूनेस्को ने अपनाया और इसी दिन की याद में 1994 से हर साल 5 अक्तूबर को विश्व शिक्षक दिवस के तौर पर मनाया जाने लगा।

 

डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, ज्योतिबा बाई फुले आदि भारत के सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों में शामिल हैं, लेकिन वर्तमान में भी कई महिला शिक्षिकाएं हैं, जो बच्चों की पढ़ाई के लिए सराहनीय कार्य कर रही हैं। किसी छात्र की पढ़ाई में गरीबी रुकावट बनी तो उन्होंने मदद की। पढ़ाई तो दूर कई छात्रों को मुश्किल से भोजन मिल पाता था, लेकिन इन शिक्षिकाओं ने पढ़ाने के साथ-साथ खाने का भी प्रबंध किया। किसी छात्र के माता-पिता नहीं चाहते थे कि बच्चा पढ़े तो उन्होंने अभिभावकों तक को पढ़ाई के लिए मनाया। ये असल जिंदगी की कहानियां हैं, जिनको हमारे और आपके बीच रहने वाली शिक्षिकाओं ने बुना है।

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घर से टिफिन लाकर देती थीं गीतिका जोशी
 

नैनीताल जिला शिक्षा व प्रशिक्षण संस्थान में खंड शिक्षा अधिकारी एवं प्राचार्य गीतिका जोशी कार्यरत हैं। गीतिका कहती हैं, मैंने लगभग नौ वर्ष तक अध्यापिका के रूप में कार्य किया और इस कार्य के दौरान बहुत से बच्चों को अत्यंत विषम परिस्थितियों से गुजरते देखा। कक्षा 9 की एक छात्रा थी, जो बहुत खामोश रहती थी और कुछ पूछने पर बस रो देती थी। मुझे उसकी चिंता हुई और मैंने उसकी मां को विद्यालय बुलाया। पूछने पर पता चला कि पिता, जो पहले बग्गी चलाते थे, रीढ़ की हड्डी पर चोट लगने के कारण बिस्तर पर पड़े थे। पिता की देखभाल के कारण मां ज्यादा काम नहीं कर सकती। वह एक घर में झाड़ू-पोछा का काम करती थी। घर का खर्च भी बहुत मुश्किल से चल पाता था। उसके घर में एक समय ही खाना बन पाता था। सुबह अन्य तीन भाई-बहन स्कूल में मिड-डे मील खाते थे, जबकि उसे कक्षा 9 में पढ़ने के कारण खाना नहीं मिलता था। बच्ची कुपोषित थी।

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मैंने उसके लिए अपने घर से टिफिन लाना शुरू किया। उसकी बढ़ती उम्र के लिए आवश्यक आयरन-कैल्शियम सप्लीमेंट और उसकी पढ़ाई की फीस देनी शुरू की। बच्ची कक्षा में दूसरी, तीसरी पोजीशन लाने लगी। हाईस्कूल और इंटर प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर आज वह अपने पैरों पर खड़ी होकर निजी क्षेत्र में नौकरी कर रही है।

 

ऐसे बहुत-से बच्चों को सहारा देते हुए मैं आगे बढ़ी और उनकी समस्याओं को गहन रूप से अनुभव किया। 2014 में मेरा चयन उत्तराखंड पीसीएस की परीक्षा में हुआ और शिक्षा विभाग में उप शिक्षा अधिकारी पद पर मेरी नियुक्ति हुई। सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की जर्जर परिस्थितियों को ठंड और बारिश से बचने का प्रयास करते बच्चों की हालत को देखकर मुझे बहुत दुख हुआ और मैंने रूपांतरण कार्यक्रम शुरू किया। इससे सैकड़ों विद्यालयों की स्थितियां बदलीं और बच्चों को निजी स्कूलों जैसी सुविधाएं मिलीं। अब रूपांतरण कार्यक्रम पूरे प्रदेश में लागू हो चुका है। इसके तहत जरूरतमंद बच्चों को सहायता दी जाती है, जिससे वे न सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र, बल्कि खेलकूद में भी नाम रोशन कर रहे हैं।
 

World Teachers Day 2023 Story Of Kind Female Teachers Who Help Students To Secure Their Future in Hindi
शिक्षक दिवस 2023 - फोटो : pixabay

कोर्स का खर्च उठाया

दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर सीमा भारती झा कहती हैं कि हम शिक्षक हैं, इसलिए हमारा मूल कर्तव्य बच्चों को पढ़ना और उन्हें अच्छी शिक्षा देना है। लेकिन इसके अलावा शिक्षक बच्चों के लिए एक होलिस्टिक डेवलपमेंट (सर्वांगीण विकास) के रूप में भी काम करते हैं। यह सर्वांगीण विकास तब तक संभव नहीं है, जब तक हम इन बच्चों को करीब से नहीं जानते और उनकी परेशानियों एवं मुश्किलों को नहीं समझते।

2015 से मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक के तौर पर पढ़ाना शुरू किया। यहां पढ़ने वाले बच्चे एक सामान्य आय वर्ग वाले घरों से आते हैं, इसलिए उनकी आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं होती है। ऐसे ही एक बार कॉलेज के दो बच्चे मेरे पास आए। उनकी आर्थिक स्थिति काफी खराब थी। उन्हें यहां रहने, खाने-पीने और पढ़ाई का खर्च उठाने में काफी परेशानी हो रही थी। उनके हालात देखकर मुझे लगा कि अगर इन्हें मदद नहीं मिली तो ये अपनी पढ़ाई पूरी करे बिना ही यहां से चले जाएंगे। इसलिए मैंने कोर्स पूरा होने तक उनकी पढ़ाई का खर्च उठाया। उन दोनों ही बच्चों ने अपनी पढ़ाई पूरी की और आज उनमें से एक अपने क्षेत्र में ऊंचे पद पर है।

इसके बाद मैंने अपने साथ कुछ अन्य लोगों को जोड़ा, जो इनके जैसे ही बच्चों की मदद कर सकते हैं या इच्छुक हैं। हमारे इस कदम से कई बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी कर पाए। इन बच्चों को सफल होते देख लगता है कि जिंदगी में जो कुछ भी इनके लिए किया, जो समय इन्हें दिया, वह सार्थक रहा।

ट्यूशन फीस भरकर की मदद

दिल्ली के माउंट आबू पब्लिक स्कूल की शिक्षिका शिप्रा गोम्बर पहले सोनीपत में शिक्षण का कार्य कर रही थी, तब उनके विद्यालय की कक्षा 12 में एक छात्रा थी, जो समृद्ध परिवार से थी, लेकिन कई वर्षों से उसके परिवार की माली हालत अच्छी नहीं चल रही थी। इसकी वजह से वह पढ़ाई को सुचारू रूप से आगे चलाने में असमर्थ थी।

शिप्रा बताती हैं एक दिन उसने अपनी समस्या के बारे में मुझे बताया। उसकी समस्या के बारे में जानकर मुझे बहुत दुख हुआ, क्योंकि वह एक मेहनती और मेधावी छात्रा थी। उसकी आगे पढ़ने की लगन और मेहनत को देखते हुए मैं नहीं चाहती थी कि वह पढ़ाई को छोड़े। तब मैंने निश्चय किया कि मैं उसकी हर संभव सहायता करूंगी। मैंने उसकी ट्यूशन फीस भरी, ताकि उसकी पढ़ाई में कोई भी रुकावट न आए और वह सफलता के मुकाम पर पहुंच सके।

उस खास दिन को याद कर आज भी मेरी आंखें नम हो जाती हैं, जब उसके बोर्ड एग्जाम का रिजल्ट आया था। उसने अर्थशास्त्र में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। उस दिन मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेरा ही परीक्षा परिणाम घोषित हुआ हो। परिणाम देखकर उसकी आंखें भी नम थीं और मेरी भी। मैंने उसे गले लगा लिया और इस सफलता के लिए ईश्वर का धन्यवाद किया कि हमारी मेहनत रंग लाई।

इसका नतीजा यह हुआ कि उसका दाखिला दिल्ली विश्वविद्यालय में इकोनॉमिक्स ऑनर्स कोर्स के लिए हो गया। किसी कारणवश हम आज एक-दूसरे के संपर्क में नहीं हैं, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि वह आज भी सफलता की सीढ़ियां चढ़ रही होगी। मुझे जीवन में गर्व महसूस कराने वाली छात्रा के लिए मेरे हृदय से सदैव ही आशीर्वाद निकलता है और ईश्वर के लिए धन्यवाद कि मैं जीवन में यह नेक काम कर पाई। आज मैं जीवन में संतुष्टि का अनुभव करती हूं।

World Teachers Day 2023 Story Of Kind Female Teachers Who Help Students To Secure Their Future in Hindi
छात्र शिक्षक का रिश्ता - फोटो : Istock


दिलाई पढ़ने-लिखने की आजादी

चंदौली के सम्मान (इंटीग्रेटेड इंस्टीट्यूट फॉर डिसेबल्ड) की शिक्षिका पुष्पा कुशवाहा बताती हैं, मैं 10 वर्षों से एक विशेष शिक्षिका हूं। हमारी जिम्मेदारी होती है कि हम शिक्षा के साथ-साथ जीवन के अनुभव को बच्चों के साथ बांटे और नैतिक मूल्यों को समझाने के लिए विस्तार से चर्चा करें। क्या सही है और क्या गलत है, इसे भी बताएं। माता-पिता और बच्चों के साथ सामंजस्य स्थापित करें।
 

 

विशेष बच्चे की शिक्षिका होना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। हर बच्चे की अलग जरूरत और समझ होती है। उसी हिसाब से हमें बच्चे को पढ़ाना होता है। विशेष बच्चे प्रतिभा के भी धनी होते हैं और मैं उसी को ध्यान में रखते हुए उनका मार्गदर्शन करती हूं, ताकि वे इसे आगे ले जाकर सफल बनें।

 

कक्षा 10 में पढ़ने वाली एक छात्रा खुशी, जो श्रवण बाधित है, उसके माता-पिता उसे आगे पढ़ने-लिखने नहीं देना चाहते थे। इससे वह बहुत परेशान रहने लगी थी। एक दिन उसने मुझे वीडियो कॉल की और अपनी समस्या के बारे में विस्तार से बताया। मैंने उसके माता-पिता की काउंसलिंग की और उन्हें बताया कि आप खुशी को आगे पढ़ने दीजिए। काफी समझाने के बाद खुशी के माता-पिता उसे आगे पढ़ाने के लिए तैयार हो गए।

 

खुशी अब कक्षा 10 में पढ़ रही है और राज्य स्तरीय दौड़ में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। साथ ही मेहंदी प्रतियोगिता में पूरे स्कूल में प्रथम आई। आज भी वह कामयाबी की ओर अग्रसर है। मेरा मानना है कि विशेष बच्चों के माता-पिता को परामर्श एवं मार्गदर्शन अति आवश्यक होता है, क्योंकि ये बच्चे सामान्य बच्चों से भी मेधावी होते हैं। जागरूकता के  माध्यम से बच्चों को शिक्षित-प्रशिक्षित किया जाए, ताकि इन विशेष बच्चों को सफलता के अवसर मिल सकें।

 

एक मदद देश के नाम

 

बरेली के आर्य पुत्री इंटर कॉलेज की पूर्व प्रधानाचार्या डॉ. मिथिलेश भदौरिया बताती हैं गुरु नानक खालसा इंटर कॉलेज में एक बच्चा था, जो कक्षा 9 का छात्र था। उसके परिवार की स्थिति अच्छी नहीं थी। छोटी उम्र में ही उसके पिता ने उसकी मां को छोड़ दिया था। वह मां और भाई के साथ अपने मामा के घर पर रहता था। मामा की आर्थिक स्थिति भी कोई अच्छी नहीं थी, ऊपर से दो बच्चों की पढ़ाई का खर्च। पारिवारिक खर्चों को लेकर वह हमेशा परेशान रहता, जिस वजह से अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाता था। मामा भी उम्र के साथ बुजुर्ग होते जा रहे थे और जिस दुकान से परिवार के खर्चों की पूर्ति होती थी, वह भी कोई अच्छी नहीं चल रही थी।

 

एक दिन मुझे उस बच्चे की स्थिति के बारे में पता चला। मैंने उससे बात की। उसने अपनी स्थिति के बारे में मुझे सहज होकर बताया। मैंने उससे कहा कि तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। कहीं भी मुश्किल आए तो मुझसे बात करो। अपनी मां और मामा का ध्यान रखो और फीस की चिंता बिल्कुल भी मत करना। नवीं कक्षा उसने अच्छे नंबरों से पास की और जब उसका दसवीं का परिणाम आया तो वह मेरे पास आया। उसने 75 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे, जिसे देखकर मैं खुश थी।

 

उसने मुझसे कहा कि मैम, मैं अग्निवीर बनना चाहता हूं और माँ व मामा के साथ देश का भी सहारा बनना चाहता हूं। उसका यह संकल्प और आत्मविश्वास देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। मैंने इस प्रोफेशन को अपनी जिंदगी के 44 साल दिए, लेकिन इतना आत्मविश्वासी बच्चा मुझे कभी नहीं मिला। आज वह बच्चा बारहवीं कक्षा में है। अच्छी तरह पढ़ाई कर रहा है और भारतीय सेना में शामिल होने के लिए तैयारी भी कर रहा है।

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