शक्ति: लारा दत्ता ने दिए पैरेंटिग टिप्स, कहा "बच्चों को टीवी दिखाकर खाना खिलाने की आदत न डालें"
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बच्चों की परवरिश करना कोई आसान काम नहीं है। एक मां होने के नाते हर महिला की जिम्मेदारी होती है कि वो बच्चे को अच्छी आदतें सिखाएं। ताकि भविष्य में वो एक स्वस्थ इंसान के साथ ही अच्छा नागरिक बन सके। क्योंकि कहा गया है कि स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन बसता है। इस बारे में जब बॉलीवुड अदाकारा लारा दत्ता से बात की गई तो उन्होंने पैरेंटिग को लेकर कई सारे टिप्स दिए।
आज आप किसी के भी घर चले जाइए, किसी सामूहिक कार्यक्रम या आयोजन में चल जाइए लोग अपने बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स थमाकर दूसरों से बातें करते रहते हैं। लोगों को इस बात का गुमान भी होता है कि उनका बच्चा आईफोन या आईपैड चला लेता है।
तीन महीने के बच्चा आईपैड अनलॉक करना सीख चुका है। स्क्रीन पर ऐप्स आते ही उसे ये भी पता होता कि उसे कौन सा ऐप खोलकर क्या करना है? इन अभिभावकों को लगता है कि उनके बच्चे नई सदी के बच्चे हैं और पैदा ही स्मार्ट हुए हैं। लेकिन, इन्हें ये समझना जरूरी है कि आखिर बच्चे के हाथ में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स आए कैसे?
बच्चों को उनके माता-पिता अपने फोन या दूसरे गैजेट्स इसलिए थमा देते हैं कि वे व्यस्त रहे। दो साल के पहले तक की उम्र बच्चों के लिए बहुत अहम होती है। इस समय आप अपने बच्चे को कितनी देर तक किसी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट की स्क्रीन के सामने रहने देते हैं, इसका उनके ऊपर बहुत गहरा असर होता है।
आज के अभिभावकों के लिए बच्चों को व्यस्त रखने का ये सबसे आसान तरीका है। बच्चा स्क्रीन के सामने व्यस्त रहता है तो वे अपना दूसरा काम कर पाते हैं। उन्हें लगता है कि बच्चा अभी छोटा है तो खेलने देते हैं और जब वह बड़ा होगा तो हम उससे ये चीजें धीरे-धीरे दूर कर देंगे। लेकिन, ऐसा होता नहीं हैं। आप उसके बड़े होने पर ये नहीं कह सकते है कि बेटा, हमने आपको स्क्रीन के सामने इसलिए बिठाया ताकि आप ठीक से खा सको। अब आप बड़े हो गए हो तो अब ये सब आप नहीं देख सकते। आप ऐसा करेंगे, तो बच्चा जिद्दी होगा और खाना नहीं खाएगा।
मेरा ये भी मानना है कि बच्चों में खाने की अच्छी आदतें डालने के लिए आपको अपने बच्चों को शुरू से रसोईघर में साथ ले जाना चाहिए। हमारे घर में मेरी दोनों बहनों तक ये रिवाज रहा भी। लेकिन मैं जब किचन में जाती थी तो मुझे डांट पड़ती थी। इसका असर मुझ पर ये हुआ कि सही खाने को लेकर मेरी दिक्कतें बहुत दिनों तक बनी रहीं। मैं 16 साल की थी, जब मुंबई आ गई। और, जब सायरा हुई तो मुझे तमाम सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। ऐसा नहीं है कि घर पर जो हो रहा है, बच्चों पर सिर्फ उसी का असर होता है, स्कूल में, दोस्तों के घरों पर होने वाली बातों का भी बच्चों के मानसिक विकास पर सीधा असर होता है।
मेरा मानना है कि बच्चों को शुरू से खाना बनाने का प्रक्रिया में साथ रखना चाहिए। ये मैंने अपनी बेटी के साथ सीखा। तो जब मैं सायरा को भिंडी खिलाने की कोशिश करती हूं तो पहले उसे अपने साथ रसोईघर ले जाती हूं। हम साथ मिलकर भिंडिंयां धोते हैं, काटते हैं और साथ ही उसे पकाते हैं।
इस दौरान उसे ये भी समझाने की कोशिश करती हूं कि ये सब्जी कैसे बन रही है, क्या-क्या मसाले इसमें डाले जा रहे हैं। अब जब खाना तैयार होता है और वह खाने की टेबल पर आती है तो उसे इस बात की खुशी होती है कि उसने मां के साथ मिलकर जो बनाया, अब उसे खाने की बारी है। जाहिर है बच्चों में खाने को लेकर दिलचस्पी तभी पैदा होगी, जब आप उन्हें अपने साथ खाना बनाने देंगे।

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