Rani Lakshmibai Death Anniversary: कैसा था झांसी की रानी का आखिरी दिन? जानें वीरांगना लक्ष्मीबाई की वीर गाथा
18 जून को रानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि है, जो कि उनके बलिदान दिवस के रूप में याद की जाती है। अपने जीवन की आखिरी लड़ाई में वह आखिरी दिन वीरता की ऐसी अनोखी कहानी लिख गई, जो सदियों तक याद की जाएगी। आइए जानते हैं रानी लक्ष्मीबाई की वीर गाथा और उनके जीवन का आखिरी दिन कैसा था।
विस्तार
Rani Lakshmibai Death Anniversary 2024: भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने के लिए पहला स्वतंत्रता आंदोलन एक महिला ने लड़ा था। इस लड़ाई को अंग्रेज सिपाहियों के खिलाफ विद्रोह भी कहते हैं। इस आंदोलन की नेतृत्वकर्ता झांसी की रानी लक्ष्मीबाई थीं, जिन्होंने महज 16 साल की उम्र में अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। उनकी वीर गाथा इतिहास के पन्नों में दर्ज है, जो कहानी या किस्से के रूप में हर बच्चे को सुनाई जाती है ताकि वह साहसी और वीर बनें। महिला सशक्तिकरण का तो यह अतुलनीय उदाहरण है। 18 जून को रानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि है, जो कि उनके बलिदान दिवस के रूप में याद की जाती है। अपने जीवन की आखिरी लड़ाई में वह आखिरी दिन वीरता की ऐसी अनोखी कहानी लिख गई, जो सदियों तक याद की जाएगी। आइए जानते हैं रानी लक्ष्मीबाई की वीर गाथा और उनके जीवन का आखिरी दिन कैसा था।
रानी लक्ष्मीबाई का जीवन परिचय
19 नवंबर 1828 को रानी लक्ष्मीबाई का जन्म बनारस के एक मराठी परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था और प्यार से लोग उन्हें मनु बुलाते हैं। 1842 में उनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव नेवलेकर से कर दिया गया। शादी के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई पड़ा।
विवाह के बाद उनका पुत्र महज चार महीने का आयु में ही चल बसा। शादी के 11 साल बाद महाराजा का भी निधन हो गया। पति और बेटे के खोने से टूट चुकी रानी लक्ष्मीबाई नहीं अपने साम्राज्य को संभालने के लिए महाराजा गंगाधर के चचेरे भाई दामोदर को अपना दत्तक पुत्र बना लिया।
हालांकि अंग्रेजों ने दत्तक पुत्र दामोदर को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और लक्ष्मीबाई के खिलाफ हो गए। उन्होंने झांसी का किला अंग्रेजी हुकूमत के हवाले करने को कहा।
झांसी पर आक्रमण
अंग्रेजों ने 23 मार्च 1858 को सर ह्यूरोज के नेतृत्व में झांसी की घेराबंदी कर ली और अगले दिन हमला कर दिया। झांसी की सेना ने अंग्रेजी सेना को सबक सिखाया। वह किसी तरह किले की सुरक्षा करती रहीं लेकिन 2 अप्रैल को अंग्रेजों ने झांसी के किले पर हमला करने की योजना बनाते हुए भारी गोलाबारी कर दी। अंग्रेजी सेना घुसपैठ में सफल रही।
झांसी की रानी ने छोड़ा किला
रानी और दामोदर राव की जान बचाने के लिए उन्हें किला छोड़कर तात्या टोपे या नाना साहेब के पास जाना था। लक्ष्मीबाई ने दामोदर राव को पीठ पर बांधा और घोड़े पर सवार होकर किले से कूद गईं। इस दौरान उनका घोड़ा मर गया। लेकिन वह कालपी पहुंच गईं।
22 मई को अंग्रेजों ने कालपी पर हमला कर दिया और रानी ने अपने साथियों के साथ वहां से भी भागना पड़ा। रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और राव साहेब ग्वालियर पहुंचे।
ग्वालियर पर 17 जून को अंग्रेजों ने हमला कर दिया। रानी ने अंग्रेजों से सीधे लड़ाई की। इस दौरान रानी एक सैनिक की वेशभूषा में थीं। लड़ाई के दौरान रानी को गोली लग गई। उनका काफी खून बह रहा था, तभी एक तलवार से उनके सिर पर वार हुआ और वह शहीद हो गईं।

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