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Pride Of India: बुजुर्गों को पढ़ाने के लिए इस महिला ने शुरू किया बेबे-बापू स्कूल, जानिए राजविंदर कौर की कहानी

Fri, 22 Nov 2024 05:31 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवानी अवस्थी Updated Fri, 22 Nov 2024 05:31 PM IST
सार

इस महिला का नाम राजविंदर कौर है, जिन्होंने गांव के वरिष्ठ नागरिकों के लिए ज्ञान का मार्ग खोला और  स्कूल की स्थापना की। आइए जानते हैं बुजुर्गों के स्कूल के बारे में और इसे शुरू करने वाली राजविंदर कौर के बारे में।
 

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Pride Of India Rajwinder Kaur Founder Of Bebe Bapu School Educating Elders in Punjab Bhatinda
राजविंदर कौर - फोटो : instagram

विस्तार

Rajwinder Kaur Founder Of Bebe Bapu School : किसी भी देश के विकास में वहां की साक्षरता दर का विशेष योगदान है। भारत विकास की ओर लगातार अग्रसर है लेकिन देश का एक बड़ा ग्रामीण वर्ग शिक्षा से दूर है। गांवों में कई लोग, खासकर बड़े बुजुर्ग अशिक्षित हैं। वह हस्ताक्षर की जगह आज भी अंगूठा लगाते हैं। उन्हें पढ़ना लिखना नहीं आता है। हालांकि पंजाब के बठिंडा जिले के एक छोटे से गांव की कहानी हर उन लोगों के लिए प्रेरणा बन सकती है जहां शिक्षित वर्ग के लोग कम है। इस गांव में एक छोटा सा साधारण स्कूल है, जहां बुजुर्ग व्यक्तियों का एक समूह शिक्षा ग्रहण करता है।

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यही बात इस स्कूल को खास बनाती है। ये वृद्धजन शिक्षा हासिल करने के अपने सपने को पूरा करने के लिए उम्र और सामाजिक मानदंडों को चुनौती दे रहे हैं। इन बुजुर्गों को प्रोत्साहित करने और इनके लिए स्कूल की पहल करने वाली एक महिला हैं। इस महिला का नाम राजविंदर कौर है, जिन्होंने गांव के वरिष्ठ नागरिकों के लिए ज्ञान का मार्ग खोला और  स्कूल की स्थापना की। आइए जानते हैं बुजुर्गों के स्कूल के बारे में और इसे शुरू करने वाली राजविंदर कौर के बारे में।
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राजविंदर कौर ने शुरू किया बुजुर्गों के लिए स्कूल

28 साल की राजविंदर कौन की पहल से बलोह गांव में एक अनूठा कार्य किया जा रहा है। राजविंदर कौर ने गांव के सभी बुजुर्गों को शिक्षित करने के लिए एक स्कूल की शुरुआत की। बुजुर्गों के इस स्कूल का नाम "बेबे बापू स्कूल" है। यहां बुजुर्ग महिलाएं और पुरुष पढ़ने के लिए आते हैं जो गरीबी और सामाजिक बाधाओं के कारण युवावस्था में शिक्षा से वंचित रह गए। राजविंदर इस स्कूल में शिक्षिका के रूप  में कार्यरत हैं। स्कूल में करीब 100 छात्र-छात्राएं पढ़ती हैं, जिस में से अधिकतर 50 वर्ष से अधिक आयु के हैं। हालांकि सीखने के लिए इच्छुक हर वर्ग का स्कूल स्वागत करता है।
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क्यों पढ़ना लिखना चाहते हैं बुजुर्ग

राजविंदर के मुताबिक, अक्सर बुजुर्गों को दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के बजाय अंगूठे का निशान लगाते वक्त शर्म महसूस होती है। वहीं कई बुजुर्ग तो इसलिए शिक्षित  होना चाहते हैं क्योंकि विदेश में रह रहे अपने बच्चों के पास जा सके और वह उनके सामने अशिक्षित नहीं दिखना चाहते हैं।


बुजुर्गों को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार 

ऐसे बुजुर्गों ने साक्षरता को अपना लक्ष्य बना लिया। स्कूल में ऐसे बुजुर्गों को पढ़ने लिखने के सरल तरीके बताए जाते हैं ताकि वो अशिक्षित न रहें। बुजुर्गों को लिखना पढ़ना सिखाने के साथ ही गणित और अंग्रेजी भी सिखाई जाती है।बुजुर्गों को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार भी दिए जाते हैं। जैसे अगर कोई बुजुर्ग हस्ताक्षर करना सीख जाएं तो राजविंदर उन्हें पुरस्कार में 100 रुपये देती हैं। 

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