शकुंतला चौधरी का जीवन परिचय: 102 साल की समाजसेविका को मिला पद्मश्री, जानिए महात्मा गांधी और विनोबा भावे से नाता
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गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या को साल 2022 के पद्म पुरस्कारों की घोषणा की गई। इसमें 17 हस्तियों का नाम पद्मभूषण के लिए हुआ। वहीं 107 लोगों को पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया है। पद्म पुरस्कार पाने वाली हस्तियों में कई महिलाएं शामिल हैं। इन महिलाओं ने देश की सेवा और सम्मान के लिए अपना जीवन लगा दिया। किसी महिला ने जंगल जंगल भटक कर पेड़ों और नदियों को बचाने का काम किया था, तो किसी ने गांधीवादी समाज सेवा से आम लोगों को उचित राह पर चलने की प्रेरणा दी। पद्म पुरस्कार से सम्मानित होने वाली इन्हीं नायिकाओं में एक नाम है शकुंतला चौधरी का। पद्म पुरस्कार से सम्मानित होने वाली नॉर्थ ईस्ट की चार महिलाओं में एक नाम शकुंतला चौधरी का भी है। शकुंतला चौधरी असम की रहने वाली हैं। 102 साल की शकुंतला चौधरी गांधीवादी समाज सेविका है। इलाके के लोग उन्हें 'शकुंतला बाई देव' के नाम से जानते हैं। यहां पढ़िए शकुंतला चौधरी का जीवन परिचय, किस काम के लिए मिला उन्हें पद्म पुरस्कार?
पद्मश्री शकुंतला चौधरी कौन हैं?
102 साल की शकुंतला चौधरी असम की रहने वाली हैं। वह गुवाहाटी के उलूबारी में कस्तूरबा आश्रम में पर्यवेक्षक हैं और असम की प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं। शकुंतला चौधरी हांडीक गर्ल्स कॉलेज के पहले बैच की छात्रा रह चुकी हैं। शकुंतला चौधरी ने अपना 100वां जन्मदिन कालेज की छात्रा के साथ कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट की असम शाखा में मनाया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक शकुंतला चौधरी असम की अकेली महिला और वरिष्ठ नागरिक हैं, जिन्होंने 100 साल पार किए हैं।
शकुंतला चौधरी और महात्मा गांधी
समाजसेविका शकुंतला देवी महात्मा गांधी के विचारों और सिद्धांतों को आगे बढ़ा रही हैं। उनकी गांधीवादी छवि पूरे राज्य में प्रसिद्ध है। शकुंतला देवी कस्तूरबा आश्रम से जुड़ी हुई हैं। वहीं महात्मा गांधी चौथी और आखिरी बार 1946 में असम दौरे पर आए थे, जब उन्होंने कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट की असम शाखा और गांधीवादी संस्था ग्राम सेविका विद्यालय का उद्घाटन किया था। जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी शकुंतला चौधरी 1947 से ही सेविका विद्यालय और कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट की असम शाखा में सबसे प्रमुख लोगों में से हैं।
शकुंतला चौधरी और विनोबा भावे
समाजसेविका शकुंतला चौधरी विनोबा भावे की करीबी सहयोगी थी। भूदान आंदोलन के अंतिम चरण में उन्होंने असम में डेढ़ साल की पदयात्रा में सक्रिय तौर पर भाग लिया था। इस पदयात्रा के दौरान शकुंतला चौधरी विनोबा भावे के दल का हिस्सा थीं और उनके उनके संदेशों को असम के लोगों के सामने अनुवादित किया था। चौधरी को फिर से विनोबा भावे ने असम में 'पदयात्रा' आयोजित करने का काम सौंपा गया, जो 1973 में गांधीवादी द्वारा दिए गए एक आह्वान के जवाब में आयोजित राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम का एक हिस्सा था।
असमिया विश्व नागरी पत्रिका
कहा जाता है कि शकुंतला चौधरी को विनोबा भावे ने ही देवनागरी लिपि में एक मासिक पत्रिका शुरू करने की सलाह दी थी, जिसका नाम पड़ा 'असमिया विश्व नागरी'। शकुंतला चौधरी ने कुछ साल पहले ही इस पत्रिका का संपादित करना शुरू किया था। यह पत्रिका आज भी गांधीवादी आदर्शों, विचारों और आध्यात्मिकता पर प्रकाश डालती है। विनोबा भावे ने 1978 में गाय वध प्रतिबंध सत्याग्रह की शुरुआत की थी, इस आंदोलन में भी शकुंतला चौधरी सबसे आगे थीं।

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