Krishnammal Jagannathan: गरीबों को जमीन का मालिकाना हक दिलाने वाली कृष्णम्माल जगन्नाथन के बारे में जानें
तमिलनाडु के कीलवेनमनी के एक छोटे से गांव में खेतों में काम करने वाले मजदूर किसानों ने अपने मेहनताने को बढ़ाने की मांग की तो 40 से ज्यादा किसान मजदूरों को जिंदा जला दिया गया था। इस निर्दयी घटना के बाद कृष्णम्माल तुरंत उस जगह पहुंची और पीड़ितों को मुआवजा दिलाने के लिए राज्य सरकार की मदद से जमींदारों से जमीन दिलाई।
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Krishnammal Jagannathan : गरीबों के लिए आवाज उठाने वाले बहुत कम ही लोग होते हैं। लेकिन भारत में ऐसे हीरो हुए जिन्होंने गरीबों के लिए न केवल आवाज उठाई, बल्कि उन्हे हक भी दिलाया। इस तरह की मिसाल एक महिला ने पेश की। तमिलनाडु की कृष्णम्माल जगन्नाथन ने हजारों गरीबों के लिए आंदोलन छेड़ा। गरीबों को जमीन का मालिकाना हक दिलाया। देश की आजादी के बाद भूदान आंदोलन का हिस्सा बनते हुए जमींदारों को मनाया और जमीन का कुछ हिस्सा भूमिहीन किसानों को दान स्वरूप दिलाया। इतना ही नहीं महिलाओं के नाम जमीन का पंजीकरण कराने के लिए भी आंदोलन चलाया। चलिए जानते हैं कृष्णम्माल जगन्नाथन के बारे में, जिन्होंने गरीब किसानों और महिलाओं के लिए आवाज उठाई।
कृष्णम्माल जगन्नाथन का जीवन परिचय
कृष्णम्माल जगन्नाथन का जन्म तमिलनाडु के दिंडुक्कल में हुआ था। वह विनोबा भावे की समर्थक थीं। कृष्णम्माल की मां ने भी गरीबी के खिलाफ आवाज उठाई थी। कृष्णम्माल अपनी मां से प्रभावित थीं। आगे चलकर गरीबों को भूमि दिलाने के लिए यह उनकी प्रेरणा बना।
उनका विवाह जगन्नाथन नाम के शख्स से हुआ था। आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी आचार्य विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन की शुरुआत की। ये आंदोलन भूमिहीन किसानों को जमीन दिलाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। साल 1950 में कृष्णम्माल विनोबा के भूदान आंदोलन का हिस्सा बनीं। अपने पति के साथ मिलकर उन्होंने कई जमींदारों से भूमिहीन लोगों को मुफ्त या कम दाम में जमीन दिलाने का आह्वान किया।
हालांकि कृष्णम्माल के लिए ये काम आसान नहीं था। कई जमींदारों का गुस्सा कृष्णम्माल पर फूटा। लेकिन उनका प्रयास और आंदोलन जारी रहा। वह पदयात्रा निकालतीं, शांतिपूर्ण बैठक करतीं और अमीरों को गरीब लोगों के मदद के लिए आह्वान करतीं।
जब किसानों को जिंदा जला दिया गया
तमिलनाडु के कीलवेनमनी के एक छोटे से गांव में खेतों में काम करने वाले मजदूर किसानों ने अपने मेहनताने को बढ़ाने की मांग की तो 40 से ज्यादा किसान मजदूरों को जिंदा जला दिया गया था। इस निर्दयी घटना के बाद कृष्णम्माल तुरंत उस जगह पहुंची और पीड़ितों को मुआवजा दिलाने के लिए राज्य सरकार की मदद से जमींदारों से जमीन दिलाई। बैंकों के बातचीत करके 15000 परिवारों को 15000 एकड़ जमीन मिल पाई। कृष्णम्माल ने महिलाओं ने नाम जमीनों का रजिस्ट्रेशन कराया। गरीब किसानों के बच्चों के लिए रात के स्कूल शुरू किए।
बोधगया आंदोलन
केवल दक्षिण भारत ही नहीं बिहार के मजदूर किसानों को भी जमीन दिलाने के लिए कृष्णम्माल और उनके पति जगन्नाथन बोधगया आंदोलन में शामिल हुए। तमिलनाडु से बिहार आना उनके लिए आसान नहीं था। नया राज्य, नई भाषा और कई चुनौतियों का सामना करते हुए बिहार के हजारों गरीब लोगों को जमीन का मालिकाना हक दिलाया। उन्होंने 1981 में लैंड फ़ॉर टिलर्स फ्रीडम नाम की संस्था का गठन किया, जो गरीबों को कम दाम में जमीन दिलवाने में मदद करती है।
उपलब्धि
कृष्णम्माल के प्रयासों और योगदान की सराहना पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी की थी। उन्होंने संसद में भूदान आंदोलन के तहत गरीबों को 30000 एकड़ जमीन देने की घोषणा की। कृष्णम्माल के योगदान के कारण ही पूर्वी तंजौर जिले में उन्हें 'अम्मा' के नाम से भी जाना जाता है। भूमि सुधार और आजीविका के अधिकार में योगदान के लिए कृष्णम्माल को पद्मश्री समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

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