आरिफा जान: कश्मीर की गायब होती दस्तकारी कला की विरासत को बढ़ा रहीं आगे
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कश्मीर का नाम आते ही चेहरे के सामने आतंकवाद और हिंसा का एक ऐसा चेहरा हमारे सामने आता है कि हम उसके आगे कुछ देखना ही नहीं चाहते। कभी कर्फ्यू कभी पत्थरबाजी उग्र लड़को की भीड़ जैसे कश्मीर की पहचान बनकर रह गई है। लेकिन इन लोगों के कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उम्मीद का दिया जलाते नजर आ जाते हैं। शायद इन्हीं जैसों की वजह से ही कश्मीर के युवाओं को एक नई दिशा मिलती है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसी महिला के बारे में जिसने कश्मीर की विलुप्त होती दस्तकारी की कला को बचाया। आरिफा जान, जिन्हें महिला दिवस के दिन नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया और प्रधानमंत्री के ट्विटर अकाउंट हैंडल करने का अवसर मिला। तब उन्होंने अपनी जुबानी अपनी कामयाबी की दास्तान सुनाई।
आरिफा जान, 33 वर्षीय कश्मीरी महिला हैं जिन्होंने कश्मीर की विलुप्त होती दस्तकारी कला 'नमदा' को जीवनदान दिया। इसके साथ ही इस कला में पारंगत लोगों को समाज में एक नई पहचान दिलाने की कोशिश की। अपने क्राफ्ट मैनेजमेंट कोर्स करने की कहानी बताते हुए कहा कि मैने ये कोर्स बड़े ही चोरी-छिपे शुरू किया था। कोर्स को पूरा करने के बाद मुझे इस दस्तकारी में नई जान फूंकने का मौका मिला। लेकिन इस काम के लिए मुझे कई सारी बाधाओं का सामना करना पड़ा।
उन्हें बताया कि अपने व्यवसाय से बेहिसाब फायदा तो नहीं हुआ, लेकिन यह बड़ी तेजी से बढ़ता गया। शुरुआत के तीन साल में उन्हें कुल 4 लाख की बचत हुई, लेकिन अब वे पूरे देश में प्रदर्शनी लगाती हैं। आस्ट्रेलिया, फिनलैंड और कतर में भी उनके कारीगरों के बनाए नमदा कालीन बिकते हैं। वे अमेरिका में हुए इंटरनेशल लीडरशिप प्रोग्राम के लिए भी नामित हुई थीं। यहां उन्होंने कश्मीरी कालीनों पर प्रजेंटेशन भी दिया था। राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होने पर उन्होंने अल्लाह को शुक्रिया अदा किया और कहा कि वो इन सम्मान के लिए शुक्रगुजार हैं।

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