Kamla Bhasin: नारीवादी कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ता कमला भसीन के बारे में जानें रोचक बातें
भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद तो हो गया लेकिन इस आजादी के बाद भी देश में गुलामी कायम रही। ये गुलामी जात-पात, महिला-पुरुष के बीच के भेद और गरीबी-अमीरी के अंतर की थी। भारतीय संविधान लागू हुआ, जिसमें दी गई धाराएं और अनुच्छेद गुलामी की जंजीरों में बंधे पिछड़े वर्ग की आजादी के लिए एक प्रयास था। इसका असर भी हुआ। देश काफी हद तक इन कुरीतियों से बाहर निकला लेकिन लिंग भेद या महिलाओं की स्थिति में उतना अंतर नहीं आया, जितना जरूरी था। संविधान, कानून, पुलिस और सरकार के प्रयास के बाद भी महिलाओं की दशा दयनीय ही रही। वजह महिलाओं को रीति रिवाजों, घर परिवार की जिम्मेदारियों में इस कदर बांधे रखना रहा, जिससे वह खुद निकलना नहीं चाहती थीं। लेकिन कई लेखक, दार्शनिक ऐसे भी आएं, जिन्होंने महिलाओं के साथ ही समाज की सोच में बदलाव लाया। इन्ही में से एक नारीवादी कार्यकर्ता थीं कमला भसीन। कमला भसीन एक लेखिका थीं, जिन्होंने अपनी आवाज महिलाओं को आजाद भारत में आजादी दिलाने के लिए बुलंद की थी। आज कमला भसीन की जयंती है। इस मौके पर जानते हैं नारीवादी कार्यकर्ता, कवयित्री, लेखिका कमला भसीन के जीवन से जुड़ी रोचक बातें।
कमला भसीन का जीवन परिचय
लेखिका कमला भसीन का जन्म 24 अप्रैल 1946 को पाकिस्तान के पंजाब सूबे में हुआ था। हालांकि उनका बचपन राजस्थान में गुजरा। उनके पिता एक डॉक्टर थे। कमला भसीन ने राजस्थान यूनिवर्सिटी से ही परास्नातक की डिग्री हासिल की। उसके बाद फेलोशिप के लिए कमला भसीन जर्मनी चली गईं, जहां म्यूएनस्टर विश्वविद्यालय से कमला ने विकास के समाजशास्त्र विषय पर आगे की पढ़ाई की।
कमला भसीन की शिक्षा और नौकरी
उन्होंने जर्मनी से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वहीं नौकरी भी की। जर्मन फाउंडेशन फॉर डेवलपिंग कंट्रीज के ओरिएंटेशन सेंटर में शिक्षिका की नौकरी करने लगी। लेकिन देश से दूर रहने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि भारत में करने के लिए बहुत कुछ है, फिर वह परदेश में क्यों रहें। इसी सोच के साथ नौकरी छोड़कर कमला भसीन जर्मनी से वापस लौट आईं। भारत लौटने पर कमला भसीन ने खाद्य और कृषि संगठन के साथ काम करना शुरू किया। इस दौरान वह महिलाओं की दशा को लेकर गंभीर होने लगी थीं। वह दक्षिण एशिया की महिलाओं को जेंडर ट्रेनिंग देने के लिए थाईलैंड चली गईं। यहां से महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए कमला भसीन सामाजिक कार्यकर्ता के दौर पर काम करने लगी।
कमला भसीन का जीवन संघर्ष
एक दौर ऐसा आया जब कमला भसीन पूरी तरह से टूट गईं। कमला भसीन का एक बेटा था, जिसे सब छोटू कहते थे। उनके बेटे को बचपन में ही वैक्सीन के रिएक्शन के कारण स्वास्थ्य समस्याएं हो गईं थीं। उसे सेरेब्रल पाल्सी हो गया। पति बलजीत मलिक ने कमला को तलाक दे दिया था। इस दौरान उनकी 27 साल की बेटी नीतो ही उनका सहारा थी। जो बेटी कम, दोस्त ज्यादा थी। नीतो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में इतिहास की पढ़ाई कर रही थीं लेकिन घर के हालातों के कारण नीतो डिप्रेशन में चली गई थीं। क्लिनिकल डिप्रेशन से परेशान नीतो ने दवाई भी लेना बंद कर दिया था और अंत में साल 2006 में नीतो ने आत्महत्या कर ली। उसके बाद कमला का जीवन सिर्फ महिलाओं के लिए समर्पित हो गया।
कमला भसीन की रचनाएँ
कवयित्री कमला भसीन ने पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ और महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से कई रचनाएं लिखीं। पितृसत्ता क्या है, मर्दानगी की खोज, मितवा आदि उनकी रचनाओं में शामिल हैं। कमला भसीन की कविता ‘क्योंकि मैं लड़की हूं’ काफी मशहूर कविता है। वह जागो री, संगत, वन बिलियन राइजिंग जैसे औरतों के संगठनों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं। बाद में आजाद भारत की नारीवादी कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ता कमला भसीन का 25 सितम्बर को निधन हो गया।

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