Independence Day 2024: स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा थी ये विदेशी महिला, ऐशो-आराम छोड़ आजादी के लिए किया आंदोलन
देश को आजादी दिलाने में एक विदेशी महिला का जिक्र भी किया जाना चाहिए, जो अपना देश और परिवार छोड़ भारत में आकर बस गई। स्वतंत्रता आंदोलनों का हिस्सा बनी।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
Independence Day 2024: भारत को आजादी दिलाने में देश के वीर सपूतों से साथ ही महिलाओं का भी विशेष योगदान था। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सबसे पहले विद्रोह किया। दुर्गा भाभी, जिन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों का हर पग पर साथ दिया और अंग्रेजों को खदेड़ने में साहसिक कदम उठाया। सरोजनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, भीकाजी कामा, सावित्री बाई फुले जैसी महिलाओं का नाम भी शामिल है। इन महिलाओं ने गांधी जी के आंदोलन में हिस्सा लिया और अंग्रेजी हुकूमत को वापस लौटने के लिए विवश कर दिया। हालांकि स्वतंत्रता संग्राम में शामिल ये सभी आंदोलनकारी और क्रांतिकारी महिलाएं भारतीय हैं। लेकिन देश को आजादी दिलाने में एक विदेशी महिला का जिक्र भी किया जाना चाहिए, जो अपना देश और परिवार छोड़ भारत में आकर बस गई। स्वतंत्रता आंदोलनों का हिस्सा बनी। विदेशी होने के बावजूद उसने देश की एक आदर्श नागरिक की तरह ही भारत माता से प्रेम किया। आइए जानते हैं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शामिल इस विदेशी महिला के बारे में।
स्वतंत्रता संग्राम में शामिल विदेशी महिला
हमें ब्रिटिश मूल की महिला मेडेलीन स्लेड का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में योगदान नहीं भूलना चाहिए। मेडेलीन स्लेड का जन्म इंग्लैंड में 22 नवंबर 1892 को हुआ था। मेडेलीन मुंबई के नौसेना के ईस्ट इंडीज स्क्वाड्रन में कमांडर इन चीफ के पद पर तैनात सर एडमंड स्लेड की बेटी थीं। उन्हें प्रकृति से काफी प्रेम था। मेडेलीन ने अलग -अलग भाषाएं सीखी थीं, जिसमें हिंदी भी शामिल थी।
मेडेलीन का भारत से नाता महात्मा गांधी के कारण जुड़ा। दरअसल मेडेलीन ने गांधी जी पर लिखे साहित्य को पढ़ा तो उनसे काफी प्रभावित हुईं। 1925 में मेडेलीन भारत आई और गांधी जी से मुलाकात की। मेडेलीन स्लेड ने अपनी आत्मकथा लिखी थी, जिसका नाम 'द स्पिरिट्स पिलग्रिमेज' था। उन्होंने इस किताब में अपनी और गाधी जी की पहली मुलाकात का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि पहली ही मुलाकात में महात्मा गांधी ने उनसे कहा था कि तुम मेरी बेटी बनकर रहोगी।
महात्मा गांधी ने विदेशी महिला को बनाया बेटी
बापू के मेडेलीन को बेटी मानने के बाद उनका जीवन बदल गया। मेडेलीन विदेश में अपनी ऐशो आराम की जिंदगी छोड़कर भारत आकर बस गईं और अपना जीवन स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित कर दिया। महात्मा गांधी ने उन्हें एक भारतीय नाम दिया। मेडेलीन स्लेड का मीराबेन कहा जाने लगा। मीरानबेन ने भारत को ही अपना घर मान लिया और गांधी जी के बताए मार्ग पर चलने लगीं। नाम के साथ उनका रूप भी भारतीय हो गया। विदेश की एक संभ्रांत परिवार की बेटी सादी धोती पहनने लगी और जमीन पर सोने लगी।
मीरा बेन का योगदान
गांधी जी की समर्थक मीराबेन हमेशा उनके साथ रहती थीं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधी जी के साथ उनके आंदोलनों का हिस्सा बनतीं। महात्मा गांधी के साथ मीराबेन जेल भी गईं। उत्तर प्रदेश के मुलदास पुर में किसान आश्रम की स्थापना में भी मीराबेन का ही योगदान रहा।
मीरा बेन को मिला सम्मान
देश के लिए अपना जीवन छोड़कर भारत में आकर संघर्ष करने वाली मीराबेन के योगदान को याद रखते हुए आजादी के बाद उन्हें सम्मान भी मिला। साल 1982 में देश की ओर से पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। हालांकि मीरा बेन तब तक देश छोड़कर जा चुकी थीं और वियना के एक गांव में बस गई थी। इसलिए ये उपाधि लेने भारत नहीं आ सकीं। भारतीय राजदूत खुद वियना में उनके पास गए और उन्हें ये सम्मान देकर आए। इसके अलावा मीरा बेन के नाम पर एक डाक टिकट भी जारी किया जा चुका है। 20 जुलाई 1982 में मीरा बेन की मृत्यु हो गई।

कमेंट
कमेंट X