देश की पहली महिला स्टोरीटेलर फौजिया दास्तानगो की कहानी, मोटरबाइक मैकेनिक पिता और मां से सीखी ये कला
बचपन में हमने अपनी दादी और नानी से कई कहानियां सुनी होंगी। मां-पिता और घर के बड़े बुजुर्ग भी बच्चों को कहानियां सुनाते हैं। दरअसल कहानियां सुनाने का यह प्रचलन यूं तो सदियों से रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह कला एक रोजगार का रूप ले चुकी है। यूं तो आज स्टोरीटेलरों की भरमार है। यूट्यब ने भी कई इस कला को नया मंच दिया है और अच्छी खासी संख्या में नई प्रतिभाओं को मौका मिल रहा है। आज हम आपको बता रहे हैं देश की पहली महिला स्टोरीटेलर की प्रेरणात्मक कहानी:
कई बच्चों की तरह दिल्ली की फौजिया का बचपन भी अपनी मां से कहानियां सुनकर बीता। उनके पिता मोटरबाइक मैकेनिक थे और वे घर पर जो भी किताबें लातें, फौजिया सारी कहानियां पढ़ डालती थीं। उनकी मां जब उन्हें उर्दू क्लासिक्स से कहानियां पढ़कर सुनाती थी तो फौजिया बहुत ध्यान से सुना करती थीं। किस्से-कहानियां सुनते हुए बड़ी हुईं फौजिया कहानी सुनाने की इस कला में माहिर हो गईं और आज उनका नाम देश की सबसे बेहतरीन उर्दू स्टोरीटेलर्स में शुमार है।
फौजिया के कहानी सुनाने का अंदाज जुदा है। उनकी कहानियों में रोमांच और एक तरह का जादू सा होता है। वे उन महिलाओं के समूह का हिस्सा हैं, जिन्होंने किस्से कहने की 13वीं सदी की कला को जीवंत रखा है। आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि अपने एक शो के लिए वह 6 महीने पहले से तैयारी करती थीं।
फौजिया को अपनी जिंदगी में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। दास्तानगोई के लिए उनकी कई बार निंदा की गई। शुरुआत में उनकी कहानियां सुनने लोग नहीं आते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानीं। दास्तानगोई के लिए अपने डेडिकेशन से वह धीरे-धीरे लोगों का दिल जीतने लगीं। उन्होंने शादी नहीं की और अपना पूरा समय अपनी दास्तानगोई की इस कला को देती हैं। उन्होंने पुरुषों को चुनौती देते हुए जिस तरह से इस क्षेत्र में नाम कमाया, आज के युवा और महिलाएं उनसे प्रेरणा ले सकती हैं।

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