मणिपुर की ट्रांसजेडर डॉक्टर, कोरोना काल में फ्रंटवॉरियर के तौर पर काम कर कमा रहीं नाम
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कोरोना काल में बहुत से लोग और डॉक्टर दिन रात मेहनत कर कोरोना संक्रमित लोगों की सेवा और इलाज कर रहे हैं। लेकिन इस बार हम बात कर रहे हैं पूर्वोत्तर भारत की पहली महिला ट्रांसजेडर डॉक्टर की, जो दिनरात मेहनत कर कोरोना संक्रमित मरीजों की सेवा कर रही है। दरअसल, ये बात इसलिए भी खास है क्योंकि हमारे समाज में अभी भी ट्रांसजेडर को बराबरी का हक नहीं मिला है। उन्हें पढ़ने लिखने से लेकर आम इंसानों जैसा काम करने में भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में ट्रांसजेडर डॉक्टर बेओंसी लेश्राम की कहानी एक मिसाल है।
27 साल की बेओंस लेश्राम इंफाल के एक निजी अस्पताल में मेडिकल ऑफिसर के तौर पर काम करती हैं। इसके साथ ही वो पूरे मणिपुर के साथ ही पूर्वोत्तर भारत की पहली महिला ट्रांसजे़डर डॉक्टर हैं। कोरोना काल में वो मरीजों की सेवा में दिन रात लगी हैं। इसके साथ ही वो अपने मेडिकल के क्षेत्र में आगे की पढ़ाई के लिए इंट्रेस एक्जाम की तैयारी में भी लगी हैं।
बेओंसी को घर वालों का सहारा नहीं मिला। जन्म से लड़का बेओंसी के पिता को जब पता चला कि वो ट्रांसजेडर हैं तो उन्होंने खुदकुशी की कोशिश की। जिसके बाद बेओंसी ने घर छोड़ दिया। बहुत ही मुश्किल हालातों में उन्होंने एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। कठिन मानसिक हालातों से गुजरने के बाद वो आज इस मुकाम पर पहुंची है। बेओंसी आज भी उस वक्त को याद कर बताती हैं कि उनके ट्रांसजेडर होने के कारण दोस्त उन्हें गाली देते थे। साथ ही उन्हें ताने सुनने को मिलते थे। मानसिक तनाव से गुजरते हुए वो कई बार खुद को कमरे में कैद कर लेती थी। लेकिन उन्होंने जीवन के संघर्षों का सामना किया। पांडिचेरी में सर्जरी के जरिए लड़की बन गईं।

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