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लोक जीवन की कथाएं रचने वाली गायनशैली 'बारहमासा'

मीनाक्षी प्रसाद, शोधकर्ता व गायिका Updated Sat, 11 Jan 2020 02:13 PM IST
विरह में प्रेयसी (सांकेतिक तस्वीर)
विरह में प्रेयसी (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Social Media
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बारहमासा मूलतः एक विरहप्रधान लोक संगीत है। वर्ष भर के बारहमास में नायक - नायिका की श्रृंगारिक विरह और मिलन की क्रियाओं के चित्रण को बारहमासा कहते हैं। इसके पद्य या गीत में बारहों महीने की प्राकृतिक विशेषताओं का वर्णन किसी विरही या विरहनी के मुख से कराया जाता है। इस गीत में वह अपनी दशा को हर महीने की खासियत के साथ पिरोकर रखती है। इस शैली में ज्यादातर किसी स्त्री का पति परदेस कमाने चला जाता है और वह दुखी मन से अपनी सखी को बताती है कि पति के बिना हर मौसम व्यर्थ है।

सैंय्या मोरा गइले विदेसबा सखीरी ।

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जिया नाहीं लागे ।।
चार महीना गर्मी के लागल ।
नाहीं भेजे कौनो संदेसवा सखीरी ।।
-पारंपरिक बारहमासा

मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य 'पदमावत' का एक प्रमुख हिस्सा 'जायसी का बारहमासा' है। ' जायसी ' हिन्दी साहित्य  के भक्ति धारा के कवि थे। ये उच्च कोटि के सूफी संत थे। 1467 ईसवीं -1552 ईसवीं तक इनका काल माना जाता है । चूंकि इनका जन्म उत्तर प्रदेश के अमेठी जिला के ' जायस ' ग्राम में हुआ था  इसीलिए यह जायसी कहलाते है। ये विशेषकर अवधी और फ़ारसी भाषा में लिखते थे। अखरावट , चित्ररेखा , मसला और पदमावत इनकी प्रमुख रचनाएं हैं।

'जायसी के बारहमासा' में रानी नागमती चित्तौड़ के राजा रतनसेन की विवाहिता पत्नी थीं। एक बार रतनसेन चित्तौड़ छोड़कर रानी पदमिनी (पदमावती) से ब्याह करने सिंघलद्वीप या श्रीलंका गए थे, लेकिन इस बारहमासा से ये प्रतीत होता है कि नागमती इस बात से अनभिज्ञ थीं। उन्हें राजा के श्रीलंका जाने का उद्देश्य मालूम ना था। नागमती अपने प्रियतम के वियोग में व्याकुल थीं। उन्हें ऐसा लगता है कि शायद राजा किसी अन्य स्त्री के प्रेम जाल में फंस गए हैं। पति के समीप रहने पर जो प्रकृति सुखदायी थी अब वही प्रकृति प्रियतम के दूर रहने से अति दुखदायी लगने लगी है। नागमती कहती हैं –
नागर काहु नारि बस परा।
तेहे मोर पिउ मोंसो हरा।।
इसका तात्पर्य है कि ऐसा प्रतीत होता है कि राजा रतनसेन को किसी चतुर नारी ने वशीभूत कर अपने ह्रदय में बसा लिया है और उस स्त्री ने मुझे राजा के हृदय से बाहर निकाल डाला है। तब नागमती की सखियां उसे ढाढस बंधाते हुए कहती हैं –
पार महादेई ! हिय ना हारु ।
समुझि जिउ , चित चेतु संभारु ।।
सखियां कहती हैं कि पटरानी आप हिम्मत नहीं हारें। अपने आप को संभालें। आपके प्रियतम जरूर वापस आएंगे। जिस प्रकार भौंरा कमल के पास जाता है, लेकिन उसे जैसे ही मालती के फूल की याद आती है वह पुनः मालती के पुष्प के पास वापस आ जाता है, उसी प्रकार महाराज भी वापस आ जाएंगे। यहां जायसी के बारहमासा के महत्त्वपूर्ण अंश का वर्णन अति आवश्यक है। पाठक अच्छी प्रकार बारहमासा का स्वरुप जान पाएंगे-
चढा आसाढ़ , गगन घन गाजा ।
साजा विरह दूंद दल बाजा ।।
सावन बरस मेह अति पानी ।
भरनि परी, हौं विरह झुरानी ।।
भा भादो दूभर अति भारी ।
कैसे भरौं रैन अधियारी ।।
लाग कुंवार , नीर जग घटा ।
अबहुं आउ कंत, तन लटा ।।
कातिक सरद चंद उजियारी ।
जग सीतल , हो विरहै जारी ।।
अगहन दिवस घटा निसि वाढी ।
दूभर रैनी, जाइ किमि गाढी ।।
पूस जाड़ थर - थर तन काँपा ।
सुरुज जाई लंका दिसी चाँपा ।।
लागेउ माघ परै अब पाला ।
बिरहा काल भऐउ जड़ काला ।।
फागुन पवन झकोरा वहा ।
चौगुन सीउ जाइ नहीं सहा ।।
चैत वसंता होई धमारी ।
मोहि लेखे संसार उजारी ।।
भा बैसाख तपनि अति लागी ।
चोआ चीर चंदन भा आगी ।।
जेठ जरै जग , चलै लुबारा ।
उठहिं बवंडर परहिं अंगारा ।।
विरह गाजी हनुमंत होई जागा ।
लंकादाह करै तन लागा ।।
आषाढ़ मास में बादल गरजने लगते हैं और ये मास सावन के आने का समाचार देने लगता है। सावन में नायिका का ह्रदय अपने प्रिय से मिलने के लिए व्यग्र हो रहा है। यही दशा भादो में भी है। परन्तु कुंवार (आश्विन ) के महीने में नायिका थोड़ी आशावान हो रही है कि अब बारिश कम हो रही है चारों ओर जल का प्रकोप कम हो रहा है, रास्ते सूख कर आवागमन के लायक हो रहे हैं तो अब उसके प्रियतम जरूर आएंगे। अपने प्रियतम से कहती है कि उसका शरीर वियोग से बीमार हो गया है। आश्विन मास के पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा भी कहते हैं । सावन मास की रिमझिम वर्षा की बाद शरद पूर्णिमा की चांदनी रास रचाने की लिए मशहूर है।

नागमती कहती है कि सारी दुनिया शीतल हो गई है परन्तु उसके अंदर विरह की अग्नि जारी है। अगहन के महीने में दिन छोटा हो जाता है और रात लंबी होने लगती है। यह दुख असहनीय होता जा रहा है। नायिका कौए और भौरें से आग्रह करती है कि वे राजा रतनसेन के पास जाकर ये संदेश दें कि उनकी पत्नी विरह की आग में जल रही है और उसके धुएं से हम दोनों काले हो गए हैं। यहां नागमती की निश्छलता शिखर पर दिखती है। पूस की रात में ठंड से शरीर थर - थर कांप रहा है। अपने प्रियतम के साथ ये मौसम उन्हें इतना ठंडा नहीं लगता था पर अब तो लगता है कि सूर्य भी उसके पति की साथ दक्षिणायन होकर लंका चला गया है। यह पंक्ति जायसी के भूगोल ज्ञान को भी दर्शाता है।
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