अंडा बेचने वाले की बेटी ने नेशनल बास्केटबॉल चैंपियनशिप में जीता गोल्ड, जानिए अंकिता गुप्ता की कहानी
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success story: काबिलियत अच्छे बुरे दिन की मोहताज नहीं होती। काबिल इंसान विपरीत स्थितियों में भी सफलता की राह बना लेता है। क्योंकि वो कहते हैं न हौंसले बुलंद हो, तो उड़ान भरने से आपको कोई नहीं रोक सकता। ठीक ऐसी ही अंबिकापुर (छत्तीसगढ़) के गांधीनगर में रहने वाली अंकिता की कहानी है। अंकिता के हौसलों की कहानी ने न केवल उसके माता-पिता बल्कि प्रदेश का नाम रोशन कर दिखाया है। अंकिता के पिता नरेश गुप्ता अंडे बेचने का काम करते हैं। परिवार चलाने के लिए अंडे बेचना ही उनके गुजारे का साधन है। खास बात ये है कि, नरेश गुप्ता ने अपनी सबसे छोटी बेटी यानी अंकिता के नाम से अपनी खुद की अंडे की दुकान खोली है। ऐसे में अंकिता का 'नेशनल सब जूनियर बास्केटबॉल' प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल हासिल करना कामयाबी की सीढ़ी चढ़ने के समान है। हैरान कर देने वाली बात ये है कि, अंकिता महज 13 साल की है। इतनी कम उम्र में माता-पिता का नाम रोशन करने वाली अंकिता के बारे में आइए विस्तार से जानते हैं।
प्रदेश का नाम किया रोशन
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अंकिता की मेहनत और लगन को देखते हुए कोच राजेश प्रताप सिंह और राजेश्वर राव ने उनकी मदद की और उन्हें टैलेंट सर्च प्रोग्राम में शामिल किया है। इसके बाद अब अंकिता दिल्ली पब्लिक स्कूल राजनांदगांव में मुफ्त प्रशिक्षण के साथ पढ़ाई भी कर रही है। यह अंकिता की मेहनत का फल है, जो आज वह पूरे प्रदेश में सुर्खियां बटोर रही हैं। बात उनके मेडल की कहानी की करें तो, तमिलनाडु में राष्ट्रीय सब जूनियर बास्केटबॉल चैम्पियनशिप का आयोजन किया गया था।
वहां छत्तीसगढ़ की बालिका टीम ने शानदार प्रदर्शन किया है। इस चैम्पियनशिप में प्रदेश का प्रतिष्ठान अम्बिकापुर की खिलाड़ी अंकिता गुप्ता ने किया, जिन्होंने टीम का प्रतिनिधित्व किया। चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल करके। छत्तीसगढ़ प्रदेश का नाम रोशन कर दिया है। छत्तीसगढ़ की टीम ने मेजबान राज्य की टीम को दो प्वाइंट से मात देने में सफलता प्राप्त की है, जिससे वे गर्व महसूस कर रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, अंकिता गुप्ता ने बचपन से ही बास्केटबॉल को पसंद किया है और उनकी मेहनत ने उन्हें यह मुकाम हासिल करने में मदद की। अंकिता के पिता नरेश गुप्ता एक अंडा ठेला चलाते हैं, ऐसे में अपने पिता का नाम रोशन करके अंकिता ने समाज में एक बड़ी मिसाल कायम की है। आखिर हो भी क्यों न क्योंकि, जिनके सपनों में जान होती है, अक्सर उनके रास्तों में मंजिल की दिशा झलकती है।

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