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प्राण प्रतिष्ठा उत्सव : बासंती चोले में रौनक ऐसी...अयोध्या नई चौपाइयां गढ़ रही, हर ओर उल्लास
Mon, 22 Jan 2024 05:42 AM IST
दुष्यंत शर्मा
उपमिता वाजपेयी, अयोध्या
उपमिता वाजपेयी, अयोध्या
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Mon, 22 Jan 2024 05:42 AM IST
सार
वह कैसे खुद को रोके रखेे उस ऐंठे हुए आकाश के पीछे, जो इतने दिन रामभक्ति की गर्माहट के बावजूद कड़कड़ाती ठंड से कंपकंपी बरसा रहा है। सर्दियों वाली धूप ने सुबह उस आंगन को रोशन किया, जहां रामलला आज से विराजमान होंगे।
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हर ओर उल्लास...
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बासंती चोला पहनी अयोध्या को एक झलक देखने इतवार को कई दिनों बाद आखिर सूरज को भी आंखें खोलनी पड़ीं। वह कैसे खुद को रोके रखेे उस ऐंठे हुए आकाश के पीछे, जो इतने दिन रामभक्ति की गर्माहट के बावजूद कड़कड़ाती ठंड से कंपकंपी बरसा रहा है। सर्दियों वाली धूप ने सुबह उस आंगन को रोशन किया, जहां रामलला आज से विराजमान होंगे।
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'...ये देखिए दोस्तों। मेरे पीछे आपको जो रास्ता नजर आ रहा है, ये रामपथ है। और वो दूर हनुमानगढ़ी।' यह कोई टीवी कमेंट्री नहीं है। अयोध्या का देश से स्प्रिचुअल के अलावा वर्चुअल कनेक्शन भी जुड़ गया है। यहां सड़कों पर जितने लोग हैं, सभी के हाथ में मोबाइल फोन है। और उस फोन का वीडियो मोड ऑन है। वे दुनिया को किसी तमगे सा दिखाना चाहते हैं, कि देखिए मैं अयोध्या में हूं। इनमें सिर्फ युवा यूट्यूबर नहीं। वो घरघुस्सी महिलाएं भी हैं, जो पड़ोसन के साथ चकाचौंध देखने महीनों बाद देहरी लांघकर निकली हैं। वो शादी के फूफा जैसे पुरुष भी जो मिन्नतों के बाद बेटी-भतीजी को मोहल्ले से बाहर वाली अयोध्या दिखाने लाए हैं। और वो संत भी जो चंदन कुमकुम से अपने ललाट को थोड़ा ज्यादा सलीके से सजाकर, मंदिर-मठों से बाहर सिर्फ अपने लल्ला के राज्योत्सव की रौनक देखने निकले हैं। अयोध्या हर जगह लाइव है। सड़कों पर। मोहल्लों, मठों, मंदिरों में। घरों में और दिलों में भी।
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राममंदिर के युवा पुजारियों के टीचर आचार्य मिथिलेशनन्दिनी शरण कहते हैं, पहले अयोध्या गूगल करने पर इंटरनेट वर्डिक्ट और गुंबद की तस्वीरें उगलने लगता था। अब 32 साल में इतिहास 360 डिग्री घूम चुका है। संतोष तिवारी 32 सालों से मंदिर के पुजारी हैं। फोन पर मंदिर के शिखर पर काम कर रहे मजदूरों की तस्वीर दिखाते हैं। फिर आंखों में चमक लिए पूछते हैं - बताइए क्या याद आ रहा है। इन मजदूरों को देखकर इतिहास बनाने की वो तस्वीर उन्हें याद आ गई जब ढांचे पर कारसेवक चढ़े थे। तोड़ने से जोड़ने तक की यह कहानी उनके लिए कोई कही-सुनी बात नहीं, आंखन देखी है। बिंदु सिंह वो कारसेवक हैं, जिनकी आंखों के सामने ढांचा ढह गया था। कहती हैं, तब पुलिसवाले उन्हें गलियों में ढूंढ़-ढूंढ़कर डंडे-लाठियों से पीट रहे थे। आज यही पुलिसवाले रामभक्तों को देखकर मुस्कुरा रहे हैं, मदद कर रहे हैं। साधु-संत दिख जाएं तो, जयसियाराम बाबा भी कहते हैं।
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चौघड़ियों की बिसात ही तो है यह। घरों की छतों पर भगवा ध्वज लहरा रहा है। दीपावली वाली मिरकुरी और रंगबिरंगी रोशनी की लड़ियां झाड़ पोछकर बाहर निकाली गई हैं। आंगन में चटक रंग वाले अरिपन बनाए जा रहे हैं। सड़कें बाकायदा धोई गई हैं। रंगाई-पुताई-लिपाई जैसे सब रिवाज पूरे किए गए हैं। कई टन फूल मंगाए गए हैं। जगमग लाइटें चौड़ी सड़कों के हिस्से सबसे ज्यादा आई है। शायद इतनी खूबसूरत अयोध्या भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद अब नजर आई है। तभी तो इसरो ने भी फलक से अयोध्या की तस्वीरें उतारी हैं।
रामपथ पर सड़क के साथ चलनेवाली दुकानें पहली बार फूली नहीं समां रहीं। खड़ाऊं से लेकर रामध्वज और रूद्राक्ष तक सारी वेरायटी है। पग-पग नया स्वाद है। कहीं दही जलेबी का भोग है, तो कहीं पकौड़ी, पराठे से लेकर पिज्जा भी परोसा जा रहा है। तमाम भंडारे जुटे हैं। ये दुकानंे जहां खत्म होती हैं, वह लता चौक संस्कार और संस्कृति की धुनों का सेंटर स्टेज बना हुआ है। यहां अपने-अपने राम दिखाने, सुनाने न जाने कितने कलाकार जुटे हैं। किसी महाकुंभ सा नजारा है। एक कोने में सूर्य स्तंभ लगे हैं। दूसरी ओर राम पैड़ी है। और तीसरे सिरहाने सरयूजी बह रही हैं।
सरयू किनारे, राम पैड़ी, हनुमानगढ़ी, लता चौक, रामभद्राचार्य की रामकथा, कारसेवकपुरम व रामजन्मभूमि...शहर की 7 ऐसी जगहंे हैं, जहां जुटान सर्वाधिक है। हाल ये है कि दो दिन से मंदिर में दर्शन बंद हैं, लेकिन लोग फिर भी यहां आ रहे हैं। वो कहां माननेवाले। तय कर चुके हैं, नए मंदिर में रामलला के दर्शन कर ही वापस लौटेंगे। फिलहाल वो उस सड़क के दर्शन कर आना चाहते हैं जो राममंदिर को जाती है। वो चौराहा। वो सड़क। वो रास्ता। सब उनके लिए राम है।
भीड़ ऐसी है कि 12 किमी वाले रामपथ पर गाड़ियों के लिए बमुश्किल बित्ताभर जगह बाकी है। लोग पैदल ही राममंदिर से सरयूघाट तक चले जा रहे हैं। वो थकते हैं तो थोड़ी ज्यादा तेज आवाज में जय श्री राम बोलने लगते हैं। भीड़ किलोमीटर में ही कहां गिनती है। लोग नहीं, अब तो शायद अयोध्या की हवा भी लूप में जयजयसियाराम जप रही है। उत्सव की रौनक ऐसी है कि आज अयोध्या अपनी नई चौपाइयां गढ़ रही है।