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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Ayodhya News ›   Ram Mandir movement was not just for Hindus but for the entire country

आइए, कथासागर में उतरें: सिर्फ हिंदुओं नहीं, पूरे देश का था राममंदिर आंदोलन, परंपराओं से जुड़ा है सरोकार

Mon, 22 Jan 2024 04:39 AM IST
विजय पुंडीर राज चावला, अमर उजाला, अयोध्या
राज चावला, अमर उजाला, अयोध्या Published by: विजय पुंडीर Updated Mon, 22 Jan 2024 04:39 AM IST
सार

श्रीराम जन्मभूमि के लिए पहली एफआईआर सिखों के विरुद्ध हुई। यह बताता है कि आंदोलन सिर्फ हिंदुओं का नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष का था। निहंग सिखों की कहानी गुरु गोविंद सिंह और उनके पुत्रों के बलिदान तक जुड़ती है।

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Ram Mandir movement was not just for Hindus but for the entire country
अयोध्या में राम मंदिर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अवध के थानेदार ने 30 नवंबर 1858 को एक एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें लिखा कि 25 सिख रामजन्मभूमि में घुस आए और हवन किया। इन सिखों ने वहां दीवारों पर ‘राम-राम’ लिखा, कई धार्मिक प्रक्रियाएं पूरी कीं। बड़ा तथ्य यह है कि श्रीराम जन्मभूमि के लिए पहली एफआईआर सिखों के विरुद्ध हुई। यह बताता है कि आंदोलन सिर्फ हिंदुओं का नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष का था। निहंग सिखों की कहानी गुरु गोविंद सिंह और उनके पुत्रों के बलिदान तक जुड़ती है। अयोध्या और रामजन्मभूमि का सिख परंपरा से सीधा सरोकार है।

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गुरु नानक देव ने तो इस्लाम के केंद्र स्थल मदीना में कहा था कि मैं रघुवंशी हूं...
सूरज कुल ते रघु भया, रघवंस होआ राम। 
राम चंद को दोई सुत, लवी कुसू तिह नाम।
एह हमाते बड़े हैं, जुगह जुगह अवतार।
इन्हीं के घर उपजू नानक कल अवतार।।

देशाटन करते हुए गुरु नानक जब मक्का के बाद मदीना पहुंचे तो वहां पीर बहाव दीन को गुरु नानक ने कहा-सूर्य कुल में रघु नाम के राजा हुए, रघु के वंश में हुए राम, रामचंद्र जी के दो पुत्र थे कुश और लव। वे राम हमारे ऐसे पूर्वज हैं, जो युग-युग में अवतार धारण करते रहे हैं, इन्हीं के वंश में मैं नानक कलिकाल में अवतरित हुआ हूं। यह बात पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी के डॉ. कुलवंत सिंह की संपादित मक्के मदीने की गोशटि में पृष्ठ संख्या 253 पर लिखित है। पवित्र दशम ग्रंथे के एक दोहे में भी यह बात आई है। श्री गुरु नानक के अनुयायी मानते हैं कि गुरु नानक ने स्वयं को रघुकुल का वंशज कहा। इसीलिए तो तीर्थाटन करते हुए श्री गुरु नानक देव अयोध्या में पूर्वजों का स्थान भी देखने पहुंचे। 

गुरु नानक के अयोध्या प्रवास का कालखंड वर्ष 1510-1511 के बीच का है। यही बात चार वर्ष पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का आधार भी बनी, जिसमें श्रीरामलला की जन्मभूमि को ही सर्वोच्च माना गया। गुरु नानक के छोटे पुत्र श्री लक्ष्मी चंद के आठवें वंशधार बाबा सुखवासी राम बेदी ने अपनी रचना ‘गुरु नानक वंश प्रकाश’ (1000-1001) में गुरुनानक देव के अयोध्या जाने की बात लिखी है। गुरु नानक देव जीवनपर्यंत रामनाम की ज्योति जगाने में लगे रहे। वे कहते हैं कि मनुष्य यज्ञ-होम, दान-पुण्य, तप पूजा इत्यादि कर्म जितने कर ले, उसकी देह कष्ट ही पाती है। वह नित्य दुख सहता है। रामनाम के बिना कोई भी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता।

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अयोध्या में गुरुओं की निशानी व निहंगों के शस्त्र
अयोध्या में दो ऐतिहासिक गुरुद्वारे स्पष्ट करते हैं कि श्रीराम जन्मभूमि के संबंध में गुरुओं की क्या दृष्टि रही। इन गुरुद्वारों के दर्शन करने वाले बताते हैं कि यहां गुरुओं की निशानियों के साथ निहंगों के शस्त्र आज भी देखे जा सकते हैं। ‘गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड’ पावन सरयू के उस प्राचीन तट पर स्थित है, जहां प्रथम गुरु नानकदेव, नवम गुरु तेगबहादुर एवं दशम गुरु गोविंद सिंह समय-समय पर आए। दूसरा ऐतिहासिक गुरुद्वारा हनुमानगढ़ी मंदिर के समीप नजर बाग में है। 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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