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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Ayodhya News ›   Ram Mandir Ban on removal of idol permission given for worship story of struggle for liberation from Saryu

सबके राम: मूर्ति हटाने पर रोक, पूजा दर्शन की मिली इजाजत; सरयू से जानिए अयोध्या की मुक्ति के संघर्ष की दास्तां

Mon, 08 Jan 2024 12:22 PM IST
शाहरुख खान अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, अयोध्या
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, अयोध्या Published by: शाहरुख खान Updated Mon, 08 Jan 2024 12:22 PM IST
सार

प्रधानमंत्री नेहरू की नाराजगी के बावजूद मूर्ति हटाने पर रोक लग गई थी, हालांकि पूजा दर्शन की इजाजत मिल गई थी। रिसीवर नियुक्त कर पूजा-पाठ शुरू करा दी गई थी। सरयू से जानिये अयोध्या की मुक्ति के संघर्ष की दास्तां

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Ram Mandir Ban on removal of idol permission given for worship story of struggle for liberation from Saryu
Ram Mandir - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

रामलला प्रगट हुए या उन्हें 22-23 दिसंबर, 1949 की मध्यरात्रि मेरे जल में स्नान करने वाले साधुओं ने रखा...यह आपके विवेक पर छोड़ती हूं। मैं अपनी दृष्टि घटनाक्रम पर ही केंद्रित रखना चाहती हूं। प्रधानमंत्री नेहरू की नाराजगी के बावजूद मूर्ति नहीं हट पाई। प्रशासन ने पूरे परिसर को सील कर अटैच कर लिया। 
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रिसीवर नियुक्त कर पूजा-पाठ शुरू करा दी गई। रिसीवर नियुक्त होने के बाद अयोध्या के जहूरबख्श और अनीसुर्रहमान ने प्रशासन से संबंधित स्थल पर नमाज पढ़ने की सुविधा और सुरक्षा मांगी। 
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उसी बीच, गोपाल सिंह विशारद नाम के एक श्रद्धालु ने जनवरी, 1950 में फैजाबाद जिला न्यायालय में जहूरबख्श समेत अन्य तथा तत्कालीन जिला प्रशासन के खिलाफ केस कर श्रद्धालुओं को श्रीरामजन्मभूमि में विराजित रामलला के दर्शन-पूजन से रोकने का आरोप लगाया। 
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जहूरबख्श, प्रशासन तथा पुलिस के हस्तक्षेप को अधिकारों का हनन बताते हुए निर्बाध दर्शन-पूजन के अधिकार की मांग की। आशंका जताई कि दूसरे पक्ष के दबाव में प्रशासन रामलला की मूर्ति हटा सकता है।
 

विवादित स्थल को लेकर विशारद का केस आजाद भारत का पहला मुकदमा था। सिविल जज फैजाबाद ने 16 जनवरी, 1950 को जिला प्रशासन को आदेश दिया कि सुरक्षित दर्शन की व्यवस्था की जाए। न्यायालय ने मूर्ति हटाने पर भी रोक लगा दी। इसके खिलाफ जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील हुई। 

 

जिला जज ने भी सिविल जज का आदेश बरकरार रखा। हालांकि, तब तक संबंधित स्थान पर सरकार के निर्देश पर स्थानीय प्रशासन ने लोहे का सीकचा लगवाकर ताला डलवा दिया था। सीकचों के एक दरवाजे को खोलकर पुजारी अंदर जाकर रामलला की पूजा-अर्चना करने लगे। विशारद के मुकदमे में न्यायालय के आदेश से श्रद्धालुओं को दर्शन की इजाजत मिल गई। दोनों वक्त पूजा व भोग लगने लगा। नमाज पर रोक लग गई।

जन्मस्थान सौंपने का केस
विशारद के मुकदमे में जिला न्यायालय के आदेश के विरुद्ध अनीसुर्रहमान ने उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में अपील की। हाईकोर्ट ने 30 मई, 1950 को उसकी अपील खारिज कर जिला न्यायालय का आदेश बहाल रखा। उधर, श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के मुख्य किरदार रामचंद्र परमहंस ने 5 दिसंबर, 1950 को जिला न्यायालय में दूसरा केस दायर कर विवादित परिसर को श्रीरामजन्मभूमि स्थान बताते हुए हिंदुओं को सौंपने की गुहार लगाई।

कोर्ट ने इसे विशारद वाले केस के साथ जोड़कर सुनवाई शुरू की। 1955 तक ये केस जिला अदालत में अनिर्णीत पड़े रहे। एक अपील पर हाईकोर्ट ने 1955 में रामलला के पूजन के अधिकार पर मुहर लगाते हुए जिला न्यायालय को विशारद तथा परमहंस के मुकदमों के साथ आजादी के पहले दायर रघुबर दास और दूसरे पक्ष से दाखिल मुकदमों पर अंतिम निर्णय देने का निर्देश दिया।
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