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Ram Mandir: तब अयोध्या के घटनाक्रम को लेकर परेशान हो गए थे नेहरू, मूर्तियों पर पीएम और डीएम के बीच ठन गई थी

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 16 Jan 2024 08:46 PM IST
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सार
राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद अस्सी या नब्बे के दशक में सामने नहीं आया था, बल्कि आजादी मिलने के तीन साल बाद ही यह मसला उठ गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, केंद्रीय गृहमंत्री सरदार पटेल और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री इस मुद्दे को अपने हाथ में न लेते, तो आजादी के बाद ही बाबरी मस्जिद ढह चुकी होती...
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Ram Mandir: a tussle was happened between jawahar lal Nehru and DM KK nayar over the statues in babri masjid
Ram mandir - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार

अयोध्या में 22 जनवरी को राम के प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तैयारियां जोरशोर से जारी हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर का भव्य निर्माण किया जा रहा है। जिस परिसर में मंदिर का निर्माण हो रहा है, उसे लेकर आजादी के तीन साल बाद ही एक विवाद हो गया था। वह विवाद इतना गहराया गया था कि देश के पहले प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को यह कहना पड़ा कि मैं 'अयोध्या' के घटनाक्रम को लेकर परेशान हूं।  

उस वक्त फैजाबाद के डीएम से जवाहर लाल नेहरू नाराज हो गए थे। वजह, मूर्तियों को लेकर तत्कालीन डीएम, सरकार की बात को दरकिनार कर रहे थे। नायर ने भी राज्य सरकार के जरिए प्रधानमंत्री के निर्देश पर काम नहीं करने की बात कह दी। नायर ने कह दिया, मुझे वहां से हटा दिया जाए। किसी दूसरे डीएम को वहां लगा दें।

नेहरू, पटेल और शास्त्री ने संभाला था मोर्चा

राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद अस्सी या नब्बे के दशक में सामने नहीं आया था, बल्कि आजादी मिलने के तीन साल बाद ही यह मसला उठ गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, केंद्रीय गृहमंत्री सरदार पटेल और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री इस मुद्दे को अपने हाथ में न लेते, तो आजादी के बाद ही बाबरी मस्जिद ढह चुकी होती। अनुभवी गांधीवादी दार्शनिक केजी मशरुवाला ने 1949 में साप्ताहिक पत्र 'हरिजन' में इस बात का जिक्र किया है। दुर्गादास द्वारा संपादित वॉल्यूम 9 में सरदार पटेल द्वारा किए गए पत्राचार के बारे में बताया गया है। पटेल इस मामले का सौहार्दपूर्ण तरीके से हल चाहते थे। वे आपसी सहनशीलता और भाईचारे के पक्ष में थे। कहीं कोई अप्रिय घटना न हो, इसके लिए प्रधानमंत्री नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जीबी पंत को एक टेलीग्राम भेजा था। लाल बहादुर शास्त्री ने अक्षय ब्रह्मचारी को लिखा, यदि कुछ गलत होता है तो हम उसे ठीक करेंगे। सभी की मदद और सहयोग से अयोध्या में कुछ खराब नहीं होने देंगे। हालांकि नेहरू और फैजाबाद के डीएम के बीच हुए विवाद में इस मामले का दूसरा रूप देखने को मिला।

क्या कहा था अक्षय ब्रह्मचारी ने?

दिसंबर 1949 और 1950 के शुरू में बाबरी मस्जिद को लेकर विवाद हो गया था। केजी मशरुवाला ने 19 अगस्त 1950 के अंक 'मुस्लिम ऑफ अयोध्या' में लिखा है, विवादित जगह के मध्य में कनाती मस्जिद जैसा कुछ है। इसके बाद अक्षय ब्रह्मचारी, जो उस वक्त फैजाबाद जिला कांग्रेस कमेटी के सचिव थे, उन्होंने कहा वह खुद 13 नवंबर 1949 को स्थल पर गए थे। वहां मकबरे के एक हिस्से को नुकसान पहुंचाया गया था। इलाके के मुस्लिम सिटी मजिस्ट्रेट से मिले। उनके बाद ब्रह्मचारी भी उनसे मिलने चले गए। नतीजा, 15 नवंबर 1949 को ब्रह्मचारी के घर पर रात को हमला हो गया। वहां पर नौ दिन के लिए रामायण का पाठ किया गया। बाबरी मस्जिद के सामने लोग बुलाए जाने लगे। कुछ मूर्तियां रखवा दी गईं। वक्ताओं ने माइक में बोलना शुरू कर दिया। यह खबर फैल गई कि मस्जिद को राम मंदिर में बदला जा रहा है। धारा 144 लगा दी गई। 23 दिसंबर को मजिस्ट्रेट ने बताया कि स्थल पर मूर्ति स्थापित हो चुकी है।

मुस्लिम समुदाय की सहमति से निपटे मामला

उससे अगले दिन लोगों को दर्शनों के लिए बुलावा दिया जाने लगा। वहां लोगों द्वारा जो नारेबाजी की जा रही थी, उसमें गांधी, नेहरू और कांग्रेस को निशाने पर लिया जा रहा था। पटेल चाहते थे कि मुस्लिम समुदाय की सहमति से मामला निपटे। जब स्थिति बिगड़ने लगी तो नेहरू ने उत्तर प्रदेश के सीएम जीबी पंत को टेलीग्राम भेजा। पटेल ने कहा, मौजूदा समय ऐसी घटनाओं के लिए ठीक नहीं है। देश ने अभी एक बंटवारा देखा है। उसके घाव अभी तक भरे नहीं हैं। मेरा मानना है कि किसी भी सूरत में यह मामला बिगड़ना नहीं चाहिए। जहां तक हो सके, इसे मुस्लिम समुदाय की सहमति से निपटाना चाहिए। किसी पक्ष के खिलाफ कोई दुष्प्रचार न हो। इसके बाद 22 अगस्त 1950 को अक्षय ब्रह्मचारी उपवास पर बैठ गए। 32 दिन बाद उनके पास लाल बहादुर शास्त्री का संदेश आया। शास्त्री ने लिखा था, सरकार ने अयोध्या में अपने सभी प्रयास किए हैं। हम शांति बनाए रखेंगे। यदि कुछ खराब होता है, तो हम उसे ठीक करेंगे। इसमें सभी लोगों को आगे आना होगा और उन्हें अपना सहयोग भी देना पड़ेगा। मूर्तियों को लेकर अयोध्या में तनाव हो गया था। जवाहरलाल नेहरू अयोध्या जाना चाहते थे, लेकिन वे जा नहीं सके। उन्होंने यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से अपनी यात्रा को लेकर कुछ खास बातचीत की थी। बाद में किन्हीं कारणों से वे वहां नहीं जा सके।

जब डीएम से नाराज हो गए थे नेहरू

तत्कालीन जिला फैजाबाद के डीएम केके नायर की कार्यशैली से जवाहरलाल नेहरू नाराज थे। डीएम, सरकार की बात को दरकिनार कर रहे हैं। नायर से कहा गया था कि वे मूर्तियों को कथित तौर पर मस्जिद से बाहर लाकर कहीं दूसरी जगह स्थापित कर दें। इस बाबत नायर ने कहा था कि इससे दंगे फैल सकते हैं। अगर सरकार यह काम कराना चाहती है, तो उनकी जगह किसी दूसरे अधिकारी को यहां तैनात कर दिया जाए। 26 दिसंबर को पंडित नेहरू ने अयोध्या विवाद पर जीबी पंत को एक टेलीग्राम भेजा। नेहरू ने लिखा, मैं अयोध्या के घटनाक्रम को लेकर परेशान हूं। उम्मीद है कि आप इस मामले का हल रुचि लेकर करेंगे। 5 मार्च, 1950 को फैजाबाद जिला प्रशासन को भेजे एक पत्र में नेहरू ने कहा कि डीएम अपनी ड्यूटी ठीक तरह से नहीं कर रहे हैं। एक डीएम ने गलत व्यवहार किया और राज्य सरकार ने इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

पहले मुझे वहां से हटा दिया जाए

नायर ने राज्य सरकार के जरिए प्रधानमंत्री के निर्देश पर काम नहीं करने की बात कह दी। तत्कालीन यूपी के मुख्य सचिव को भेजे एक पत्र में नायर ने लिखा, अगर सरकार ने किसी भी कीमत पर मूर्तियों को हटाने का फैसला किया है, तो मेरा अनुरोध है कि उससे पहले मुझे वहां से हटा दिया जाए। किसी दूसरे डीएम को वहां लगा दिया जाए। नायर ने यह भी दावा किया कि विवादित स्थल से मूर्तियों को हटाने से जनता को व्यापक पीड़ा होगी, जिसके परिणामस्वरूप कई लोगों की जानें जा सकती हैं। खास बात है कि नेहरू के पत्र के फौरन बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने डीएम को नहीं हटाया।

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