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राम अस्तित्व व सभ्यता की धुरी : ...अंतस में उतारिए, हर व्यक्ति के जीवन में अनुकरणीय हैं मर्यादा पुरुषोत्तम

Sun, 21 Jan 2024 06:16 AM IST
दुष्यंत शर्मा हेमंत शर्मा, अयोध्या
हेमंत शर्मा, अयोध्या Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 21 Jan 2024 06:16 AM IST
सार

वे ऐसे राजा हैं, जिनके पास राजमुकुट से पहले लोकमंगल है। राजा बनने से पहले विश्वामित्र के साथ जाकर लोकमंगल के लिए राक्षसों से जूझना पड़ा। राम केवल अयोध्या के राजा, सीता के पति, रावण के संहारक या केवट के तारक नहीं हैं। हर व्यक्ति के जीवन में अनुकरणीय है। उनकी स्थिति भगवान से आगे ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ की है। शिव और कृष्ण को भी यह विशेषण लभ्य नहीं हैं। ऐसे राम को अपने अंतस में उतारने का वक्त है। 

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Ram is the axis of existence and civilization: ...take it to the heart
राम ऐसे राजा हैं, जिनके पास राजमुकुट से पहले लोकमंगल है। - फोटो : lord ram

विस्तार

राम हमारे अस्तित्व और मानव सभ्यता की धुरी हैं। वे ऐसे राजा हैं, जिनके पास राजमुकुट से पहले लोकमंगल है। राजा बनने से पहले विश्वामित्र के साथ जाकर लोकमंगल के लिए राक्षसों से जूझना पड़ा। राम केवल अयोध्या के राजा, सीता के पति, रावण के संहारक या केवट के तारक नहीं हैं। हर व्यक्ति के जीवन में अनुकरणीय है। उनकी स्थिति भगवान से आगे ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ की है। शिव और कृष्ण को भी यह विशेषण लभ्य नहीं हैं। ऐसे राम को अपने अंतस में उतारने का वक्त है। 

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यह ऐतिहासिक घड़ी है, जब राम फिर अयोध्या लौट रहे हैं। अपने जन्मस्थान पर 500 वर्ष के संघर्ष के बाद। राममंदिर भारत के सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों का कीर्तिस्तंभ भी होगा। अयोध्या सिर्फ एक शहर नहीं, समदर्शी विचार है। अयोध्या का मंदिर वैचारिक लिहाज से अन्याय के खिलाफ सतत संघर्ष और विरोध को प्रतिबिंबित करता हुआ मर्यादा, आदर्श, विनय, संयम, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यवत्ता तथा पिछड़े, वनवासियों से युक्त समरस समाज का ऊर्जा केंद्र हो सकता है। 
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रामचरित जितनी भी भाषाओं में लिखा गया, उनमें राम दीन-दुखियों के पक्षधर
संस्कृत, अवधी, तमिल, तेलुगू, उड़िया, मलयालम, सिंघली, नेपाली, भूटानी या फारसी जैसी जिन भाषाओं में भी रामचरित लिखा गया, उस कथा में कुछ बदलाव हो सकता है, पर हर जगह राम दीन-दुखियों के पक्षधर हैं। वाल्मीकि रामायण और तुलसी की मानस में दो चरित्र खास हैं। एक निषादराज गुह्य और दूसरा शबरी। पूरी कथा में हर किसी को राम ने कुछ-न-कुछ दिया है, लेकिन निषादराज और शबरी ऐसे हैं, जिन्होंने राम से कुछ लिया नहीं, बल्कि उन्हें दिया। कंबन की रामायण में प्रभु राम निषादराज को अपना पांचवां भाई जैसा बताते हैं। शबरी भीलनी थीं, उनके जूठे बेर खाए। राम बलशाली के बजाय कमजोरों के साथ खड़े नजर आते हैं। बालि-सुग्रीव प्रसंग भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। राम की सेना एकता का सबूत थी। 
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गांधी दर्शन का आधार भी : आधुनिक भारत की बात गांधी के बिना पूरी नहीं होती। गांधी के दर्शन का आधार राम हैं। गांधी को समझने के सूत्र भी राम हैं। गांधी के अंतिम शब्द तक में राम ही समाहित हैं। राम के चरित के अनुरूप ही गांधी का चरित है। भारत अब विकसित होता देश है। इसके बीच भारतीय बने रहने की शर्त अगर कुछ है तो वह परिवार, समाज और संबंधों के प्रति मूल्य और नैतिकताबद्ध बने रहना है। राम इसके अग्रदूत हैं। राम सब कुछ नया करते हुए भी हर कदम पर परंपरा को बरतते और निभाते हुए नायक हैं। राम की दृष्टि कृष्ण से भी व्यापक है। राम त्याग पर चलते हैं और कृष्ण कर्म पर। राम के पास कर्म की रिक्तता नहीं है, लेकिन वे त्याग और संतुलन के परिमार्जन से अपने कर्म को कसौटी पर कसते हैं। राम दरअसल प्रतिरोध के भी नायक हैं। अधिकार की लड़ाई हो तो विभीषण, न्याय की लड़ाई हो तो सुग्रीव, नैतिकता की लड़ाई हो तो वनवास और नीति की लड़ाई हो तो सीता को वनगमन। हाशिए पर खड़ा समाज राम को अपने बहुत करीब देखता है। 

युग बदल रहा है। तकनीक ने मनुष्य को चुनौती दी है। एआई जैसे प्रयोग व्यक्ति की प्रयोजनमूलकता पर प्रश्न पैदा कर रहे हैं। श्रम, कर्म और अनुशासन को तकनीक नियोजित कर रही है। ऐसे में मानवीयता के लिए सबसे जरूरी पक्ष है संस्कृति का। संस्कृति ही हमारी परंपरा की संरक्षक है। राम भारतीय संस्कृति की ऊर्जा का अक्षुण्ण स्रोत हैं और रामकथा हमारे समय का सबसे बेहतर ‘सांस्कृतिक डिटॉक्स’। मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से इसका विस्तार होगा। इस क्षण को गले लगाइए। राम को अंतस में उतारिए।

राम की नीति विस्तारवाद के बजाय, वसुधैव कुटुंबकम की
रावण जैसे शत्रु के प्रति भी आपका रवैया कैसा हो? इसका उत्तर भी राम के आचरण से है। विभीषण अपने भाई रावण के आचरण पर लज्जित होकर उसका अंतिम संस्कार करने में संकोच करते हैं, तब राम कहते हैं- मरणान्तानि वैराणि निवृत्तं न: प्रयोजनम। क्रीयतामस्य संस्कारो ममापेष्य यथा तव॥ 


यानी बैर जीवन काल तक ही रहता है। युद्ध में मानवता और मर्यादा की रक्षा के लिए तमाम अंतरराष्ट्रीय संधियां 20वीं शताब्दी में हुईं, जिनका उल्लंघन आज भी हो रहा है। वहीं, राम अपराधी को दंडित तो करते हैं, लेकिन पराजित के प्रति उनका आचरण मर्यादित रहता है। राज्यों को जीतने के बावजूद वे विस्तारवादी होने के बजाय ‘वसुधैव कुटुंबकमं’ वाली नीति पर चलते हैं। आज के युद्धों में ऐसे मूल्यों का पालन होता तो संसार की तस्वीर ही कुछ और होती। 

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