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आंखन देखी अयोध्या : वो कहते थे रामजन्मभूमि वाली अयोध्या तो थाईलैंड में

Thu, 11 Jan 2024 05:46 AM IST
दुष्यंत शर्मा उपमिता वाजपेयी, अयोध्या
उपमिता वाजपेयी, अयोध्या Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 11 Jan 2024 05:46 AM IST
सार

बैरागी महंत और निर्वाणी अखाड़े का मंदिर है हनुमानगढ़ी। रावण से युद्ध कर जब राम अयोध्या लौटे, तो हनुमानजी यहीं रहने लगे थे। 8000 मठ-पीठ-मंदिरों वाली अयोध्याजी के इस मंदिर में रामलला विराजमान के बाद सबसे ज्यादा लोग दर्शन को आते हैं।

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Ayodhya Ram Mandir : They used to say that Ayodhya is Ramjanmabhoomi but it is in Thailand.
हनुमानगढ़ी मंदिर - फोटो : FAIZABAD

विस्तार

सब पर राम तपस्वी राजा। तिनके काज सकल तुम साजा।

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और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।।

तपस्वी राजा श्रीराम सर्वश्रेष्ठ हैं। उनके सब कार्यों को हनुमानजी ने सहज कर दिया। जिस पर हनुमानजी की कृपा हो वो कोई इच्छा करे, तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी सीमा नहीं होती।

1855 की बात है। अंग्रेजों का राज था। ब्रिटिश रेजिडेंट ने अवध नवाब को पत्र लिखा कि मौलवी गुलाम हुसैन रामजन्मभूमि पर हमले के लिए मस्जिदों से तकरीर कर लोगों को भड़का रहा है। उसका दावा था कि हनुमानगढ़ी के भीतर मस्जिद है। एक दिन हनुमानगढ़ी पर हमला हो गया। इधर हनुमानगढ़ी के बैरागी, उधर जेहादी। कई लोग मारे गए, जीत बैरागियों की हुई।
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बैरागी महंत और निर्वाणी अखाड़े का मंदिर है हनुमानगढ़ी। रावण से युद्ध कर जब राम अयोध्या लौटे, तो हनुमानजी यहीं रहने लगे थे। 8000 मठ-पीठ-मंदिरों वाली अयोध्याजी के इस मंदिर में रामलला विराजमान के बाद सबसे ज्यादा लोग दर्शन को आते हैं। 76 खड़ी सीढ़ियां चढ़कर आप 52 बीघा में फैली हनुमानगढ़ी के मुख्य मंदिर में होंगे। मंदिर में अंजनी पुत्र मां की गोद में विराजे हैं। पीछे से आवाज आ रही है… जय जय सीता राम जी के प्यारे हनुमान जी, प्यारे हनुमान जी, दुलारे हनुमान जी। यह हनुमानगढ़ी के राष्ट्रपति गद्दीनशीन श्री श्री 1008 प्रेमदास जी महाराज हैं। 7 साल के थे, जब यहां आए। पहले सेवक बने, फिर पुजारी और प्रमोशन पाकर गद्दीनशीन।
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उनके पीछे बंदूक लिए दो पुलिसवाले तैनात हैं। एक के हाथ में हनुमान चालीसा है, जिसे वह पढ़ रहे हैं। मंदिर दर्शन के बाद लोग प्रेमदास का आशीर्वाद लेने आ रहे हैं। वह एक हाथ से तुलसी दल दे रहे हैं। गद्दी पर इशारा कर कहते हैं, यह हनुमान जी महाराज का स्थान है। इन्हीं की कृपा से मंदिर बना है।

प्राणप्रतिष्ठा में जाने का उनका भी बड़ा मन है। लेकिन परंपरा... हनुमानगढ़ी के गद्दीनशीन इलाके से बाहर नहीं जाते। हां, अगर उस गद्दी के पंच फैसला करें, तो शायद जा सकते हैं। और जाएंगे तो बकायदा हनुमानजी की पताका, पीठाधेश्वर का निशान, बैंड, बरात लेकर। इस गद्दी के 600 पंच हैं, मुख्यमंत्री हैं, चार पट्टी के चार प्रधानमंत्री भी। प्रेमदास इन सबके गद्दीनशीन है, ताउम्र के लिए। वह जन्मभूमि की कहानी सुनाने लगे… ‘ वहां मस्जिद के चारों तरफ परिक्रमा बनी थी। स्वास्तिक, कलश और 10-12 कसौटी के खंभे भी। संत वहां धावा बोल दिए। पर वहां मंदिर न बन सका। 


जन्मभूमि के लिए राम दरबार तैयार करने बम्बई ऑर्डर भेजा था। अब वह रामदरबार हनुमानगढ़ी में है। वह शिष्यों का हाथ पकड़कर सीढ़ी उतरने लगते हैं। इससे आगे जाने की औरतों को मनाही है। नियम कायदे कानून दसियों हैं। 10 हजार शिष्य हैं, 12 साल में एक पट्टी के सेवादार का नंबर आता है। हर साल पुजारी का रिन्यूअल होता है। जब तक सेवा का नंबर न आए, कोई भी पुजारी गर्भगृह में प्रवेश नहीं कर सकता। दिनभर में कई बार हनुमानलला की सेवा, भोग और शृंगार होता है। पूड़ी, साग, पकौड़ी, हलवा, दही और पान चढ़ता है। सुबह 4.30 मंगला आरती से उठते हैं। फिर रात 12 बजे बाल हनुमान माता अंजनी की गोद में मच्छरदानी में सुला दिए जाते हैं। अगले दिन फिर अयोध्याजी को दर्शन देने के लिए…। 

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