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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Ayodhya News ›   Ayodhya Ram Mandir: The boatmen of Ramnagari are also special

Ayodhya Ram Mandir : रामनगरी के केवट भी खास...तिलक-चंदन कर छूते हैं पैर, सोने की अंगूठी भी दे जाते हैं लोग

Fri, 12 Jan 2024 06:07 AM IST
दुष्यंत शर्मा उपमिता वाजपेयी, अयोध्या
उपमिता वाजपेयी, अयोध्या Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 12 Jan 2024 06:07 AM IST
सार

यानी, यह सुंदर मानस सरोवर की कन्या सरयू नदी बड़ी पवित्र है और कलियुग के पाप रूपी तिनकों और वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकने वाली है।

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Ayodhya Ram Mandir: The boatmen of Ramnagari are also special
पावन सरयू नदी... - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि॥

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यानी, यह सुंदर मानस सरोवर की कन्या सरयू नदी बड़ी पवित्र है और कलियुग के पाप रूपी तिनकों और वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकने वाली है।

बौद्ध ग्रंथों की सरभ। यूनान की सोलोमत्तिस। स्कंदपुराण की नेत्रदा। ऋग्वेद की सरयू। और अयोध्या वालों की सरजूजी। अगर दुनिया एक खूबसूरत पश्मीना शॉल है, तो अयोध्या के सिरहाने बहती सरयू उस पश्मीना पर हाथों से बुने गए संस्कार हैं। अवधी में कहावत है, सरयू में नित दूध बहत है, मूरख जाने पानी। मतलब इस नदी में दूध बहता है और मूरख ही इसे पानी कहेगा। 

पंडित सुशोभन मिश्रा 30 सालों से हर दिन गोस्वामी तुसलीदास घाट पर सरयू में स्नान को आते हैं। फिर कुछ देर यहीं बैठकर सरयू के सुकून को महसूस करते हैं। वो कहते हैं सरयू सत्य है। लोग इसकी मिट्टी तक साथ ले जाते हैं। और फिर अपने घरों की नींव, पौधों और परवरिश में उसे शामिल कर लेते हैं। देश की बाकी नदियों की तरह सरयू भी मां है।
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अयोध्या में रहनेवालों की मां। उन केवट-मांझी-निषाद की मां जो इसके बूते ही जीते हैं। बीरचंद्र माझी को 40 साल हुए सरयूजी में नाव चलाते। उन्होंने नावों को स्टीमर और मोटर बोट में बदलते देखा है। कहते हैं अब तो अयोध्या में क्रूज भी आ रहा है। अंग्रेजों के समय अयोध्या से कोलकाता तक नाव से कारोबार होता था। राजघाट पर रहनेवाले 82 साल के संयमलाल भी कोलकाता, अपनी बड़ी सी नाव पर चार ट्रक सामान लादकर ले जाते थे।
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अब सिर्फ 140 स्टीमर-मोटर बोट हैं अयोध्या में। जो तुलसीदास घाट, लक्ष्मण घाट, रामघाट, गुप्तारघाट और गोलाघाट से यात्रियों को घुमाती हैं। और इनके खिवैया कई बार एक दिन में 2-3 हजार कमा लेते हैं, फिर कई बार हफ्ता यूं ही सूखा निकल जाता है। वो कहते हैं, राम अब तक ठौर में नहीं थे, कोई अयोध्याजी पर ध्यान ही नहीं देता था। अब प्राणप्रतिष्ठा होगी तो वो भी बहुत खुश हैं। क्योंकि ज्यादा दर्शन करनेवाले आएंगे तो ज्यादा लोग उनकी नावों पर घूमने जाएंगे। 

नाव वाले वैसे तो सारे देश में हैं। लेकिन जो सम्मान आयोध्या के मांझी का है वो कहीं नहीं। अनिल मांझी थोड़ा शर्माते-संकुचाते, बड्डा सा टेडी-बियर बंधी अपनी लाल सीटों और गुलाबी तिरपाल वाली बोट पर बैठे-बैठे ही कहते हैं, ‘लोग हमें तिलक-चंदन करते हैं। गले लगा लेते हैं। पैर धोते हैं। पैर छूते भी हैं। और दान दक्षिणा दिए बिना नहीं जाते। पंजाबी और सरदार तो हमें सोने की अंगूठी तक दे जाते हैं। कुछ लोग पायजेब-बिछिया, कपड़ा-लत्ता, गेहूं-मकई, बर्तन-कुकर दान देते हैं। वो क्या है ना, हमें वो राम को सरयू पार करवानेवाले केवट का रूप मानते हैं।’


अयोध्या में सरजू के किनारे एक केवट कॉलोनी हैं। यहां से बहुत सुबह 3-4-5 बजे नाविक घाट पर अपनी ड्यूटी पर आ जाते हैं। इन्हीं घाटों पर अलग-अलग साइन वाले पंडो का भी बसेरा है। जिनके नाम दो बैलों की जोड़ी से लेकर दो गिलास पानी और गुब्बारों का झंड़ा तक है। घाट पर ही 4-5 गाय भी बंधी हैं। दिन भर में 20-25 लोग इन गायों को छूकर गोदान का धर्म कमा लेते हैं। कुछ हर दिन स्नान करने, कुछ धर्म-कर्म और पिण्डदान के लिए। तो कुछ रेहड़ी-खोमचो पर रोजी कमाने सरयू का रुख कर लेते हैं। सरयू मां जो है।

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