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Ayodhya Ram Mandir: दुनिया की हर समस्या का समाधान हैं श्रीराम, राजमहल में सहयोगियों से लेकर वनवासियों तक को...

Wed, 17 Jan 2024 10:18 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या
अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या Published by: शाहरुख खान Updated Wed, 17 Jan 2024 10:18 AM IST
सार

Ayodhya Ram Mandir: भगवान श्रीराम दुनिया की हर समस्या का समाधान हैं। इस दृढ़ विश्वास के विस्तार में अगर जाना हो तो श्री रामचरितमानस के कथासागर में उतरना होगा। त्रेता युग में धरती पर अवतार लेने से लेकर मां सरयू की गोद में अंतिम प्रवास तक श्रीराम ने अपने पूरे कालखंड में संपूर्ण समाज को एकसूत्र में पिरोने का काम किया है। 

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Ayodhya Ram Mandir Shri Ram is solution to every problem of world
अयोध्या-राम की मूर्ति।(फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सबके राम का अर्थ भावना अनुसार समझा जा सकता है, पर सार यही है कि राम सबके हैं। श्रीराम सनातन भारत भूमि के तो हैं ही, संपूर्ण विश्व और पावन वसुंधरा के हर प्राणी के हैं। विश्व की हर समस्या का समाधान भी हैं श्रीराम। 
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इस दृढ़ विश्वास के विस्तार में जाना हो तो आइए श्री रामचरितमानस के कथासागर में उतरें। दुनिया की जटिल समस्याओं के मूल में झांकेंगे, तो नस्लभेद, रंगभेद व वर्णभेद उन बड़े कारकों में जुड़ते हैं, जिनके कारण भी विश्व संघर्षरत दिखता है। 
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त्रेता युग में धरती पर अवतार लेने से लेकर मां सरयू की गोद में अंतिम प्रवास तक श्रीराम ने अपने पूरे कालखंड में संपूर्ण समाज को एकसूत्र में पिरोने का काम किया, इसी की आवश्यकता आज सनातन समाज सहित पूरे जगत को है।  
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गुरुकुल के सखा निषादराज
श्रीराम ने राजमहल में सहयोगियों से लेकर वनवासियों, ग्रामीण अंचल के हर वर्ग को सदा सम्मान दिया। किसी के सखा बने तो किसी के प्रभु या किसी को ‘तात’ कहकर श्रीराम ने आत्मीयता का जो संबंध बनाया, वो अटूट रहा। बाल्यकाल से आगे श्रीराम महर्षि वशिष्ठ के गुरुकुल में थे, तब उनके आत्मीय सखाओं में गुह भी थे, जो बाद में निषादराज हुए। निषादों के राजा गुह का स्थान आज भी प्रयागराज के पास पावन गंगा के तट पर है, जिसका नाम है शृंगवेरपुर।

शृंगवेरपुर धाम के श्रीराम

श्रीराम के वनगमन का पहला पड़ाव शृंगवेरपुर ही था। वनवास के नियमों के अनुसार उन्हें किसी नगर-ग्राम में जाना नहीं था। इसीलिए निषादराज गुह अपने सखा राम से मिलने साथियों सहित गंगा किनारे चले आए। निषादराज फल व कंदमूल इत्यादि भी लाए, श्री रामचरितमानस के अयोध्याकांड में कहा गया -      
यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।।
लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा।।

निषादराज गुह ने श्रीराम से भेंट करने के आनंद में परिजनों को बुलाया और अपार हर्ष के साथ फल, कंदमूल भरों में भरकर प्रभु से मिलने चले। अयोध्याकांड में दोनों सखाओं के संवाद की चर्चा है। लिखा है-
करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।।
सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।।


यानी निषादराज भेंट समर्पित करते हैं तो प्रभु स्नेहवश उन्हें साथ बैठाते हैं व कुशलक्षेम पूछते हैं। निषादराज उन्हें शृंगवेरपुर ले चलना चाहते हैं, पर प्रभु वनवास की मर्यादा बताते हुए प्रेमपूर्वक असमर्थता जताते हैं।

निषादराज की व्यवस्था के श्रीराम : प्रभु के विश्राम के लिए निषादराज कुश व कोमल पत्तों से आसन सजाते हैं और फिर प्रभु आराम से वहीं विश्राम करते हैं। श्रीराम के लिए निषादराज इस समय सिर्फ सखा हैं, परिजन हैं, तब श्रीराम के लिए सेवा और प्रेम ही सर्वोच्च गुण हो सकते हैं, नस्ल-रंग-वर्ण का वहां कोई अर्थ ही नहीं था, न ही रामराज्य में कभी इनका कोई स्थान रहा। वैसे निषाद समाज की चर्चा सामान्य दिनों में चुनावों के आसपास भिन्न कारणों से होती है, मगर सेवाभावी निषादराज तो त्रेता युग से रामायण का हिस्सा ही हैं, जो श्रीराम के अभिन्न सखा हैं, तो फिर श्रीराम का अनुसरण करने वालों के मन-मस्तिष्क में निषादों का स्थान सदा सखा का ही रहता होगा, ऐसा मानना चाहिए।
(लेखक राज चावला, वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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