फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Ram Mandir ›   Ayodhya Ram Mandir Sardar Vallabhbhai Patel wanted statue of Ramlala to remain Nehru wanted to remove it

Ayodhya Ram Mandir: पटेल चाहते थे राम लला की मूर्ति रहे, नेहरू चाहते थे हटाना

Mon, 22 Jan 2024 04:50 PM IST
अमर शर्मा ललिता निझावन
ललिता निझावन Published by: अमर शर्मा Updated Mon, 22 Jan 2024 04:50 PM IST
सार

अगर पटेल न होतेए तो शायद राम मंदिर भी न होता या इस पूरे आंदोलन की दिशा और दशा ही अलग होती। याद रहे कि पटेल ही थेए जिन्होंने 12 नवंबर, 1947 को सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का विचार रखा और इस विषय पर बनी समिति के अध्यक्ष भी बने। नेहरू इस शिव मंदिर के जीर्णीद्धार के भी खिलाफ थे। दुर्भाग्य से पटेल मंदिर निर्माण कार्य पूरा होने से पूर्व ही चल बसे। जब मंदिर बन कर तैयार हो गया और इसके उद्घाटन के लिए राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद को आमंत्रित किया गयाए तो नेहरू ने उनके वहां जाने का भी विरोध किया। यह बात अलग है कि उन्होंने नेहरू की परवाह नहीं की।

विज्ञापन
Ayodhya Ram Mandir Sardar Vallabhbhai Patel wanted statue of Ramlala to remain Nehru wanted to remove it
Ramlala - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

- ललिता निझावन (उद्यमी, शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता।)
विज्ञापन

राम मंदिर और हिंदू हितों का समर्थन करने वालों को ‘सांप्रदायिक’ बताने और इससे मुसलमानों को डराने का इतिहास पुराना है। अंग्रेजों के प्रिय वामपंथी और मुस्लिम तुष्टीकरण के पैरोकार जवाहर लाल जवाहरलाल नेहरू और उनके वामपंथी चेलों ने यह नेरेटिव भारत विभाजन से पहले ही शुरू कर दिया था।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग की बंदरबांट के कारण हुए भारत के बंटवारे और भयंकर खून-खराबे के बाद जब दिसंबर 1949 में कुछ धर्मप्राण लोगों ने अयोध्या में हिंदू मंदिर तोड़ कर बने विवादित ढांचे में राम लला की मूर्ति स्थापित कर दी, तो बजाए हिंदुओं की भावनाएं समझने के नेहरू ने तबके मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत पर मूर्ति हटवाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। कहना न होगा इसके लिए बहाना इसी नेरेटिव को बनाया गया।
विज्ञापन


इस संबंध में नेहरू और पंत के पत्राचार के बारे में बात करने से पहले जान लेते हैं कि तब माहौल क्या था और हिंदुओं में गुस्सा क्यों था। तब मुसलमान कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी मानते थे। 1946 के प्रोविंशियल इलेक्शन में यूनाइटेड प्रोविंस (तब उत्तर प्रदेश का यही नाम था) के मुसलमानों ने मुस्लिम लीग को भरपूर समर्थन दिया और हर मुस्लिम बहुल इलाके से लीग को भर-भर कर वोट मिले। यूपी के मुसलमान पाकिस्तान बनवाने की कवायद में सबसे आगे थे और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी हिंदू विरोधियों की मक्का बना हुई थी। मुसलमानों के घरों में खुलेआम लीग के झंडे फहराए जाते थे और मुहम्मद अली जिन्नाह की तस्वीरें लगाई जाती थीं। जाहिर है ऐसे में हिंदुओं में विभाजनकारियों के प्रति गुस्सा पूरी तरह जायज था।
विज्ञापन
विज्ञापन


मुसलमान कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी मानते थे, लेकिन विभाजन के बाद नेहरू और उनके वामपंथी चेलों ने इसे मुस्लिम लीग से भी ज्यादा मुसलमानपरस्त बना दिया। इसी आलोक में देखें कि विवादित ढांचे में मूर्ति रखे जाने पर नेहरू ने पंत को क्या पत्र लिखा। उन्होंने लिखा, ”मुझे खुशी होगी यदि आप मुझे अयोध्या की स्थिति के बारे में जानकारी देते रहें। जैसा कि आपको पता है मैं इस विषय को अखिल भारतीय स्तर और विशेष कर कश्मीर पर इसके असर को विशेष महत्व देता हूं।”

एक अन्य पत्र में नेहरू लिखते हैं, ”मैं अयोध्या मसले से बहुत व्यथित हूं...फैजाबाद के जिला अधिकारी के. के. नायर ने किसी हद तक दुर्व्यवहार किया (विवादित ढांचे से मूर्ति हटाने से इनकार कर दिया)... मैं आश्वस्त हूं कि अगर हम अपनी ओर से सही व्यवहार करें तो हमारे लिए पाकिस्तान से निपटना आसान होगा। आज कई कांग्रेसी पाकिस्तान को लेकर सांप्रदायिक हो गए हैं और यह भारत में मुसलमानों के प्रति उनके व्यवहार में भी झलकता है।“ 

राम मंदिर मसले को कश्मीर और पाकिस्तान से जोड़ कर नेहरू साफ तौर पर मुसलमानों को भड़काने की साजिश कर रहे थे। उन्होंने क्या एक बार भी सोचा कि तब पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ क्या व्यवहार हो रहा था या उनके मंदिर कैसे तोड़े जा रहे थे?

जब वे ‘सांप्रदायिक कांग्रेसियों’ के बारे में बात कर रहे थे तो स्पष्ट है कि उनका इशारा उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की ओर था। आइए अब देखते हैं सरदार पटेल ने इस संबंध में अपने पत्र में गोविंद वल्लभ पंत को क्या लिखा। उन्होंने कहा “...जहां तक मुसलमानों का सवाल है, वे अपनी नई निष्ठाओं के प्रति समझ विकसित कर रहे हैं...यह संभव नहीं कि बड़े पैमाने पर उनकी निष्ठा इतनी आसानी से बदल पाए...मैं समझता हूं कि इस कदम (मंदिर में मूर्ति रखने) के पीछे प्रबल भावनाएं हैं, अगर हम मुस्लिम समुदाय की सहमति ले सकें तो ऐसे विषय शांति से सुलझाए जा सकते हैं। ऐसे विषय बलपूर्वक सुलझाए जाने का तो सवाल ही नहीं उठता...।”

स्पष्ट है नेहरू की तरह पटेल मूर्ति हटाए जाने के पक्ष में नहीं थे। वे चाहते थे कि इस विषय को मुस्लिम समुदाय की सहमति से हल किया जाए। पटेल किसी भ्रम में नहीं थे, उन्हें मुस्लिम लीग, जिन्नाह और पाकिस्तान के प्रति मुसलमानों की भावनाओं का पूरा पता था, विभाजन के बाद देश में जो अभूतपूर्व दंगे हुए, गृह मंत्री होने के नाते उन्हें उनके हर पहलू की पूरी खबर थी, वे हिंदुओं की भावनाओं को बखूबी समझते थे, लेकिन संवेदनशील माहौल में आम सहमति से काम करना चाहते थे। नेहरू ने गोविंद वल्लभ पंत पर फैजाबाद के जिला अधिकारी के. के. नायर के खिलाफ कार्रवाई करने का बहुत दबाव बनाया, ये सरदार पटेल ही थे जिनके संबल के कारण नायर विवादित ढांचे से मूर्ति न हटाने पर अड़े रह सके।

जाहिर है अगर पटेल न होते तो शायद राम मंदिर भी न होता या इस पूरे आंदोलन की दिशा और दशा ही अलग होती। याद रहे कि पटेल ही थे जिन्होंने 12 नवंबर, 1947 को सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का विचार रखा और इस विषय पर बनी समिति के अध्यक्ष भी बने। नेहरू इस शिव मंदिर के जीर्णीद्धार के भी खिलाफ थे। दुर्भाग्य से पटेल मंदिर निर्माण कार्य पूरा होने से पूर्व ही चल बसे। जब मंदिर बन कर तैयार हो गया और इसके उद्घाटन के लिए राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद को आमंत्रित किया गया तो नेहरू ने उनके वहां जाने का भी विरोध किया। यह बात अलग है कि उन्होंने नेहरू की परवाह नहीं की।

नेहरू और उनके वामपंथी चेलों ने हिंदुओं के खिलाफ जो विष बीज बोए, इतिहास को जैसे तोड़ा-मरोड़ा उसका खामियाजा भारत आज भी भुगत रहा है। आगे चल कर कांग्रेस की सरपरस्ती में बनी बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और तथाकथित इतिहासकार इरफान हबीब ने राम मंदिर के खिलाफ जो भ्रम फैलायाए वह अभूतपूर्व है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सबने माना कि विवादित ढांचा मंदिर तोड़ कर बनाया गया, लेकिन उन्होंने सच को कभी स्वीकार नहीं किया। वे और उनके इस्लामिक सांप्रदायिक बंधु अब सच्चाई को स्वीकार करने की जगह सुप्रीम कोर्ट को ही अन्यायकर्ता बता कर बदनाम कर रहे हैं।

बहरहाल हर बाधा को पार कर भव्य राम मंदिर अस्तित्व ले चुका है। यह असत्य पर सत्य, भ्रम पर वास्तविकता, अन्याय पर न्याय, दुष्प्रचार पर सदाचार की विजय का प्रतीक है। यह प्रतीक है हिंदुओं की जिजीविषा का, जो सैकड़ों वर्षों तक मुस्लिम, ईसाई और वामपंथी आतंक के बावजूद पूरी आन-बान शान के मौजूद रही।


खुशी की बात है कि मंदिर को इतनी मजबूती से तैयार किया गया है कि वह आने वाले हजार वर्ष तक सीना तक कर खड़ा रह सकेगा। हम रहें या न रहें, मंदिर आने वाली पीढ़ियों को भारत में हिंदुओं के संघर्ष की याद दिलाता रहेगा।

- ललिता निझावन (उद्यमी, शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता।)
---------------------------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed