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Ram Mandir: हर प्राणी से संबंध, समर्पितों के प्रति समर्पित प्रभु; जटायु का श्रीराम ने खुद किया अंतिम संस्कार
Sat, 20 Jan 2024 09:12 AM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या
अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या
Published by: शाहरुख खान
Updated Sat, 20 Jan 2024 09:12 AM IST
सार
Ayodhya Ram Mandir: हर प्राणी से संबंध, समर्पितों के प्रति समर्पित प्रभु श्रीराम ने जटायु का खुद अंतिम संस्कार किया था। आइए, कथासागर में उतरें।
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Ram Mandir
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राम सबके हैं, हर वर्ग-हर सम्प्रदाय के हैं, यह बात समझने के लिए श्रीरामायण का पूरा सार ही संक्षिप्त में जान लेना पर्याप्त है। श्रीराम अयोध्या से बाहर निकले, तो जहां भी पड़ाव बनता गया, राम वहां के होते गए। पंचवटी में कुटी बनाई तो संतों-सन्यासियों के रक्षक हुए।
माता सीता के अपहरण के बाद खोज में निकले तो हनुमान से लेकर अंगद और सुग्रीव के भी हो गए। वनवास में प्रकृति से भी वार्ता करते चलते, हर जीव-प्राणी मात्र से भी संबंध बनता गया। उदाहरण स्वरूप-गिद्धराज जटायु से उनका नाता कैसा था, यदि इस पर ही ध्यान देंगे तो समझ पाएंगे-सबके राम।
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श्रीरामायण के प्रथम बलिदानी जटायु : मांस खाने वाले गिद्धराज समाज के अग्रज जटायु को श्रीराम ने तात के स्थान पर रखा। माता सीता की खोज में मदद कर जटायु सहयोगी की भूमिका में भी थे और अंत में उनकी रक्षा में प्राण देने वाले जटायु रामायण के प्रथम बलिदानी बनकर सदा के लिए अमर हो गए।
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माता सीता के अपहरण के बाद खोज में निकले तो हनुमान से लेकर अंगद और सुग्रीव के भी हो गए। वनवास में प्रकृति से भी वार्ता करते चलते, हर जीव-प्राणी मात्र से भी संबंध बनता गया। उदाहरण स्वरूप-गिद्धराज जटायु से उनका नाता कैसा था, यदि इस पर ही ध्यान देंगे तो समझ पाएंगे-सबके राम।
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श्रीरामायण के प्रथम बलिदानी जटायु : मांस खाने वाले गिद्धराज समाज के अग्रज जटायु को श्रीराम ने तात के स्थान पर रखा। माता सीता की खोज में मदद कर जटायु सहयोगी की भूमिका में भी थे और अंत में उनकी रक्षा में प्राण देने वाले जटायु रामायण के प्रथम बलिदानी बनकर सदा के लिए अमर हो गए।
तब श्रीराम गिद्धराज जटायु या उनके समान समाज में स्थिति रखने वालों को प्रभु श्रीराम किस रूप में देखते हैं, इसे समझा जा सकता है। माता सीता की खोज में निकले श्रीराम को जब कराहते हुए जटायु दिखते हैं, तो उनके सिर पर हाथ रखते हैं, तो वह शांत होते हैं। इस पर श्रीरामचरितमानस के अरण्य काण्ड में कहा गया-
तब कह गीध बचन धरि धीरा, सुनहु राम भंजन भव भीरा। नाथ दसानन यह गति कीन्ही, तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही।
यानी, धीरज धरकर गिद्ध ने कहा-हे भव के भय का नाश करने वाले श्री रामजी! रावण ने मेरी यह दशा की है। उसी दुष्ट ने जानकीजी को हर लिया है। जटायु आगे कहते हैं-
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाईं, बिलपति अति कुररी की नाईं।
दरस लाग प्रभु राखेउँ प्राना, चलन चहत अब कृपानिधाना।
हे गोसाईं! वह उन्हें लेकर दक्षिण दिशा को गया है। सीताजी कुररी (कुर्ज) की तरह अत्यंत विलाप कर रही थीं। हे प्रभो! आपके दर्शनों के लिए ही प्राण रोक रखे थे। हे कृपानिधान! अब ये चलना ही चाहते हैं।
श्रीराम के तात जटायु : श्रीरामचरितमानस के अनुसार अब प्रभु श्रीराम पहली बार संबोधन में उन्हें तात कहते हैं। चौपाई में लिखा है-
राम कहा तनु राखहु ताता, मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता।
जाकर नाम मरत मुख आवा, अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा।
सो मम लोचन गोचर आगें, राखौं देह नाथ केहि खांगे
जल भरि नयन कहहिं रघुराई, तात कर्म निज तें गति पाई।
श्रीराम ने कहा-हे तात! शरीर को बनाए रखिए
तब कह गीध बचन धरि धीरा, सुनहु राम भंजन भव भीरा। नाथ दसानन यह गति कीन्ही, तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही।
यानी, धीरज धरकर गिद्ध ने कहा-हे भव के भय का नाश करने वाले श्री रामजी! रावण ने मेरी यह दशा की है। उसी दुष्ट ने जानकीजी को हर लिया है। जटायु आगे कहते हैं-
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाईं, बिलपति अति कुररी की नाईं।
दरस लाग प्रभु राखेउँ प्राना, चलन चहत अब कृपानिधाना।
हे गोसाईं! वह उन्हें लेकर दक्षिण दिशा को गया है। सीताजी कुररी (कुर्ज) की तरह अत्यंत विलाप कर रही थीं। हे प्रभो! आपके दर्शनों के लिए ही प्राण रोक रखे थे। हे कृपानिधान! अब ये चलना ही चाहते हैं।
श्रीराम के तात जटायु : श्रीरामचरितमानस के अनुसार अब प्रभु श्रीराम पहली बार संबोधन में उन्हें तात कहते हैं। चौपाई में लिखा है-
राम कहा तनु राखहु ताता, मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता।
जाकर नाम मरत मुख आवा, अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा।
सो मम लोचन गोचर आगें, राखौं देह नाथ केहि खांगे
जल भरि नयन कहहिं रघुराई, तात कर्म निज तें गति पाई।
श्रीराम ने कहा-हे तात! शरीर को बनाए रखिए
तब जटायु मुस्कुराते हुए कहते हैं- मरते समय जिनका नाम आने से अधम मुक्त हो जाता है, वही मेरे नेत्रों के सामने हैं। अब मैं किस कमी के लिए देह रखूं? नेत्रों में जल भरकर रघुनाथजी कहते हैं- हे तात! आपने अपने श्रेष्ठ कर्मों से दुर्लभ गति पाई है।
श्रीराम ने स्वयं किया जटायु का अंतिम संस्कार : अंत में जटायु गिद्ध की देह त्यागते हैं, तो भगवान श्रीराम पक्षीराज की अंत्येष्टि अपने हाथों से संपन्न करते हैं। यानी लौकिक मनुष्यों के जितने श्रीराम हैं, उतने ही इस लोक के वन्य प्राणियो के भी हैं। जटायु और सम्पाति का सेवा भाव व परमभक्त हनुमान का समर्पण, ऐसे कितने ही उदाहरण हो सकते हैं- जिनका अध्ययन गहराई से करेंगे तो पाएंगे-सबके राम।
(राज चावला, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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(राज चावला, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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