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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Ayodhya Ram Mandir Read journey from struggle of Ayodhya to today s glory

Ram Mandir: 2500 क्विंटल फूलों से सजी अयोध्या, दीये और रंगोली से सजे घर-आंगन, कभी छावनी सी नजर आती थी रामनगरी

Mon, 22 Jan 2024 05:12 PM IST
आकाश दुबे अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या
अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या Published by: आकाश दुबे Updated Mon, 22 Jan 2024 05:12 PM IST
सार

सरयू घाट से लेकर गली-मुहल्ले और घर-घर रंगोली सजाई गई है। रंगबिरंगी लाइटों की चमक अलग ही छटा बिखेर रही है। रात्रि में पंक्तिबद्ध सजे दीये तारामंडल के तारों की तरह टिमटिमाते हुए नजर आ रहे हैं। एक समय ऐसा भी था जब रामलला टेंट-तिरपाल में पूजे जाते थे। आइए जानते हैं अयोध्या के संघर्ष से आज के वैभव तक की यात्रा।

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Ayodhya Ram Mandir Read journey from struggle of Ayodhya to today s glory
Ram Mandir Ayodhya - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मैं (अयोध्या) उत्साहित और आनंदित हूं। प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर 2500 क्विंटल फूलों से मैं सजी-संवरी। सरयू घाट से लेकर गली-मुहल्ले और घर-घर रंगोली सजा गई। रात्रि में पंक्तिबद्ध सजे दीये तारामंडल के तारों की तरह टिमटिमाते हुए नजर आ रहे हैं। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि मेरे प्रभु श्रीराम अपने जन्मस्थान पर बने दिव्य दरबार में वर्षों की प्रतीक्षा के बाद विराजमान हुए। आज यानी सोमवार को रामलला की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों प्राण प्रतिष्ठा हुई। इसी के साथ श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े पांच सदी पुराने विवाद और संघर्ष कहानी बनकर रह गए।

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खुशी इस बात की है कि मैंने महाराजा दशरथ के शासन को देखा। उनके काल की विरासत और संस्कृति मेरी धमनियों में आज भी बहती है। राजा दशरथ के चारों पुत्रों ने मेरी धरती पर पैर रखकर मुझे धन्य और पावन कर दिया। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के शासन को, लक्ष्मी स्वरूप मां सीता को धरती में विलीन होते भी देखा। आज प्रभु श्रीराम का एक बार फिर अयोध्या में पुर्नआगमन हो रहा तब इस आनंद के क्षण में भी मेरा दिल बीच-बीच में उदास हो जाता है। क्योंकि इतिहास में कई ऐसे मौके आए जब मेरी छाती को छलनी किया गया, कभी विदेशी आक्रांताओं ने तो कभी आपसी मतभेद में अयोध्यावासियों ने। आज मैं जितनी खुशहाल और विकसित नजर आती हूं, यह परिवर्तन कुछ वर्षों में ही हुआ है। एक समय ऐसा भी था जब रामलला टेंट-तिरपाल में पूजे जाते थे। आइए जानते हैं अयोध्या के संघर्ष से आज के वैभव तक की यात्रा।

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सज संवरकर अद्भुत-अलौकिक दिख रहा प्रभु राम का धाम
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह को भव्य बनाने के लिए हर स्तर की तैयारियां की गई थी। रात के समय मंदिर की स्वर्णिम आभा अलग ही छटा बिखेर रही है। गर्भगृह से लेकर पूरे राम मंदिर को फूलों और रोशनी से सजाया गया। राम मंदिर के लोकार्पण और रामलला के नवीन विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा के लिए अयोध्या को 2500 क्विंटल फूलों से संवारा गया। गर्भगृह को सजाने के लिए कर्नाटक से फूल मंगाए गए थे। इसके लिए दिल्ली व कोलकाता के साथ थाईलैंड और अर्जेंटीना से मनमोहक विदेशी फूलों की खेप मंगाई गई थी। राम मंदिर के रास्ते रंग-बिरंगे फूलों से सजाए जा गए। राम मंदिर का नवनिर्मित भवन और प्रवेश द्वार अलग ही छटा बिखेर रहा है। इसी के साथ राम मंदिर पर हेलीकॉप्टर से गुलाब की पंखुड़ियों की वर्षा की गई।

कभी छावनी बनी रहती थी अयोध्या, टेंट में पूजे जाते थे रामलला
रामलला को टेंट से निकालकर मंदिर में विराजमान करने तक अयोध्या और अयोध्यावासियों ने लंबा संघर्ष देखा है। अयोध्या लंबे समय तक संगीन के साये में रही, पुलिस और सुरक्षाकर्मियों के बूटों की आवाज से लोगों के हृदय कांप उठते थे।  रामलला को 1949 में गुंबद के भीतर स्थापित करने वाले महाराज अभिराम दास जी के शिष्य व रामलला के पुजारी सत्येंद्र दास ने 1992 का किस्सा साझा करते हुए बताया कि 6 दिसंबर, 1992 की तारीख थी। कारसेवकों का हुजूम था। विवादित ढांचा ढहाने की तैयारी चल रही थी। सत्येंद्र दास से कहा गया कि वह रामलला को भोग लगाकर पर्दा गिरा दें। सत्येंद्र दास कहते हैं, दिन में पूड़ी-सब्जी-दाल-चावल की जगह उस दिन रामलला को सिर्फ फल-दूध का भोग लगा। डर था कि विवादित ढांचा गिराते वक्त कहीं रामलला को कोई नुकसान न हो जाए, इसलिए सहायक पुजारियों व कुछ कारसेवकों की मदद से रामलला को सिंहासन समेत उठाकर पास के एक नीम के पेड़ के नीचे, सुरक्षित जगह पर ले आए। अब रामलला गुंबद के नीचे नहीं, टेंट-तिरपाल में पूजे जाने लगे। 

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तिरपाल बदलवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से लेनी होती थी इजाजत
पुजारी सत्येंद्र दास कहते हैं, कई बार जितना भोग-राग मांगा जाता था, प्रशासन उतना नहीं देता था। तब वे टीचर वाली अपनी तनख्वाह से ही भोग जुटाते थे। वह प्रशासन से हर साल दो बार रामलला के कपड़े सिलवाने की गुजारिश करते थे, पर डीएम बस रामनवमी पर नए कपड़े भिजवाते थे। आज रामलला हर दिन नए कपड़े पहनते हैं। 28 साल रामलला तिरपाल में रहे। सत्येंद्र दास कहते हैं, सबसे बुरा तो तब लगता था, जब बारिश में तिरपाल फट जाता था और फटे तिरपाल को बदलवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से इजाजत लेनी पड़ती थी। पानी भीतर घुस आता था और रामलला के कपड़े भीग जाते थे।

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