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Ayodhya Ram Mandir: वाल्मीकि के राम ही समूचे राम साहित्य के मूल स्रोत हैं
Mon, 22 Jan 2024 07:33 PM IST
अमर शर्मा
देवांशु झा ‘पद्मनाभ’
देवांशु झा ‘पद्मनाभ’
Published by: अमर शर्मा
Updated Mon, 22 Jan 2024 07:33 PM IST
सार
वाल्मीकि के जन्म के संबंध में भ्रामक धारणाएं प्रचलित हैं। कई जगह उन्हें प्रचेता ऋषि का पुत्र कहा गया है, तो कहीं श्वपच और कहीं ब्राह्मण कुलोद्भव, जिसने दस्युवृत्ति अपना ली। उनका जन्म और कुल महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि महर्षि ने राम को भारतीय धर्म, संस्कृति और आचार-विचार के सबसे ऊंचे धरातल पर चित्रित किया। वाल्मीकि इस देश में रची गई सैकड़ों रामायणों और अनगिन रामकथाओं के मूल स्रोत हैं।
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- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
- देवांशु झा ‘पद्मनाभ’
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:
यत्क्रौंच मिथुनादेकमवधी: काम-मोहितम।
वाल्मीकि व्याध को शाप देकर ही निवृत्त नहीं हुए। उन्होंने उस क्षण में ही युगों, शताब्दियों और संभवत: इस संसार में मनुष्य की सत्ता रहने तक के लिए स्वयं को अमर कर लिया, क्योंकि उन्होंने राम को रचा। वह क्रौंच पक्षी का वध देखकर कुछ अन्यतम रचना चाहते थे। परंतु उनके समक्ष ऐसा कोई पात्र नहीं था। तब ब्रह्मा ने उन्हें रघुकुल शिरोमणि राम का नाम सुझाया और वाल्मीकि आदिकवि हुए।
लोक में वाल्मीकि के राम की प्रचारित छवि ऐसी है कि वे हमारे जीवन में एक आयु तक केवल राजा राम के रूप में ही प्रतिष्ठित रहे। एक अरसे तक हम सुनते रहे कि वाल्मीकि के राम तो इस लोक के राजा राम थे। ऐसे राम, जो प्रश्नों के घेरे में रहे। ऐसे राम, जो इस लोक और लोकोत्तर संसार में अपनी ईश्वरीय उपस्थिति से हमें मोहित नहीं करते। वे तो तुलसी के राम थे, जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए!
यह कितना बड़ा झूठ है! तुलसी से लेकर कंब और कृतिवास, कुवेंपु और निराला अपने-अपने राम को रचते हुए स्रोत कहां से पाते हैं? वे वाल्मीकि नहीं, तो और कौन है? वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड के एक छोटे से अंश को पढ़ते हुए ही मैं आश्वस्त हो गया कि वाल्मीकि ही तो पुरुषोत्तम राम को प्रतिष्ठित करने वाले प्रथम महाकवि हैं।
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वाल्मीकि के राम 16 वर्ष की आयु तक एक तरह से मौन धारण किए चलते हैं। वे पिता को सुनते हैं। गुरु को सुनते हैं। भाइयों को सुनते हैं। बोलते उतना ही हैं, जितना संवाद के लिए आवश्यक है। राम के पुरुषार्थ का पहला परिचय कब मिलता है? ताड़का और मारीच को दंडित करते हुए भी नहीं मिलता। वे तो उन्हें धर्माचरण करते हुए दंडित करते हैं। राम के पुरुषार्थ का पहला परिचय तब मिलता है, जब वे खेल-खेल में ही शिव धनुष को भंग कर डालते हैं।
यह प्रत्यक्ष रूप से उनके पौरुष का प्रमाण है। राम हंसते हुए उस महाधनुष को खंडित कर डालते हैं, जिस पर देव, गंधर्व, असुर, राक्षस और किन्नर कोई प्रत्यंचा तक न चढ़ा सका। यह राम के पुरुषोत्तम रूप में समाहित महागुण का ही दर्शन है। उनका अद्वितीय पुरुषार्थ और उस पुरुषार्थ को इस संसार में प्रतिष्ठित करने वाले प्रथम कवि वाल्मीकि हैं।
वाल्मीकि के राम को क्रोध पहली बार कब आता है? जब परशुराम उन्हें चुनौती देते हैं। पिता के सामने राम संयमित हैं। लेकिन सीमा तोड़ रहे परशुराम को देखकर वे कह उठते हैं-
वीर्यहीनमिवाशक्तं क्षत्रधर्मेण भार्गव।
अवजानासि मे तेज: पश्य मेद्य पराक्रमम्।।
(ब्राह्मण होने के कारण मैं आपका सम्मान करता हूं, किंतु आपको मुझे चुनौती देने का अधिकार नहीं है। मुझे अपना धनुष दीजिए और देखिए मेरा पराक्रम!)
राज्याभिषेक की तैयारियों में डूबी अयोध्या को निरख कर राम प्रमुदित हैं। अचानक दशरथ से बुलावा आता है। दशरथ कुछ बोल नहीं पाते। कैकेयी सारा वृत्तांत सुनाती हैं। चारों ओर छिटकी पूर्णिमा क्षण भर में अमा में ढल जाती है, लेकिन राम अविचलित हैं। अचंचल, स्थितप्रज्ञ योगियों की तरह कहते हैं:
एवमस्तु गमिष्यामि वनं वस्तुमहं त्वित:।
जटाचीरधरो राज्ञ: प्रतिज्ञामनुपालयन।।
यह वाल्मीकि के राम हैं। महावीर.. महाधीर.. प्रशांत.. स्थिरचित्त! वे कहते हैं- इसमें क्या संकट है..? मैं पिता की आज्ञा के लिए आज ही जटा और चीर धारण कर वन चला जाऊंगा!
आगे वे कैकेयी से कहते हैं कि भरत के लिए तो मैं अपना राज्य, अपनी प्रिया पत्नी और जीवन तीनों का त्याग कर सकता हूं।
इसके बाद का एक पूरा का पूरा प्रसंग ही उनके मर्यादा पुरुषोत्तम होने का प्रमाण है। वे पिता, माता, पत्नी, भाई से संवाद करते हैं और बारंबार अपनी धर्मदृष्टि से वनगमन को उचित ठहराते हैं। राम के वनगमन के बाद जब अयोध्या रिक्त हो जाती है और इन सब उत्थान-पतनाघातों से अनभिज्ञ भरत साकेत लौटते हैं। उन पर वज्रपात होता है। भरत अपनी तीन माताओं, गुरु वशिष्ठ, महर्षि जाबालि और पूरे लाव लश्कर के साथ चित्रकूट पहुंच चुके हैं।
लक्ष्मण जो कि आवेग में विवेक खोने के अभ्यस्त हैं, कहते हैं कि भरत की मति मारी गई है भैया! उसका वध कर दो..। तात, पूर्व के अपकारों का दंड पाप नहीं, पुण्य होता है। जोश में आकर वे कैकेयी समेत अन्य लोगों के वध करने की बात करते हैं। वाल्मीकि ने राम और भरत में अपार साधुता दिखलाई, तो लक्ष्मण में राम के लिए अद्वितीय एकनिष्ठता, त्याग का वर्णन भी किया। वाल्मीकि के लक्ष्मण उद्धत हैं। किंतु राम लक्ष्मण को शांत करते हैं।
पिता से सत्यपालन की प्रतिज्ञा कर भरत का वध करने और राज्य छीनने से संसार में क्या मिलेगा..? मैं उस राज्य का क्या करूंगा, किसे मुंह दिखाऊंगा..। इसके बाद राम कहते हैं-
धर्मं अर्थं च कामं चे पृथिवीं चापि लक्ष्मण।
इच्छामि भवतामर्थे एतत प्रतिश्रिणोति मे।।
(लक्ष्मण मैं तुम्हारे सामने शपथ लेकर कह सकता हूं कि अपने लिए राज्य की कोई कामना मैं कभी नहीं करता। धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वी के सभी भोगपदार्थ मैं तुम लोगों के लिए चाहता हूं।)
यह पुरुषोत्तम नहीं तो और कौन है..? यह तो निष्काम योगी सम्राट से ही संभव है जो भोगलिप्सा और तमाम वैभव से दूर है। जब भरत श्रीराम से मिलकर विलाप करते हैं, उन्हें बारंबार अयोध्या लौटने को कहते हैं। अपनी माता कैकेयी को कोसते हैं, तो राम शांत भाव से उत्तर देते हैं कि भरत, तुम मुझे कुलीन, सत्यनिष्ठ, गुण और आचारवान मानते हो, तो पिता की आज्ञा का उल्लंघन करने को कैसे कहते हो? मुझे तुम्हारे भीतर कोई दोष नहीं दिखता और माता की निंदा भी तुम्हें शोभा नहीं देती। भरत नहीं मानते। येन केन प्रकारेण राम को अयोध्या वापस ले चलने का प्रयास करते हैं, तो राम कहते हैं कि जीव ईश्वर के समान नहीं है। इसलिए अपनी इच्छा से न कुछ करता है, न ही कुछ कर सकता है। वह तो काल के साथ बहता है।
वे अपनी बात को आगे बढ़ाकर गीतात्मक उपदेश पर ले जाते हैं कि समस्त संग्रहों का अंत विछिन्न होना है। सभी उन्नतियों का अंत पतन है। सभी संयोगों का अंत वियोग है और सभी के जीवन की समाप्ति मृत्यु है। जैसे समुद्र में तैरते हुए दो काठ की लकड़ियां कभी मिल जाती हैं, फिर कुछ देर में अलग हो जाती हैं, उसी तरह से संसार में पत्नी, पुत्र और कुटुंब, धन भी मिलते-बिछुड़ते हैं। पुन: राम भरत को भुज बीच भरकर प्रेम से सींचते हुए कहते हैं कि इस शाश्वत सत्य के बाद तुम्हें दु:ख और शोक का त्याग कर स्वस्थ हो जाना चाहिए और अयोध्या का राज्य चलाना चाहिए। यह विमर्श चलता रहता है।
संपूर्ण वाल्मीकि रामायण ऐसे उदाहरणों से भरी हुई है। राम धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य के बीच कभी भ्रमित नहीं होते। वाल्मीकि के राम की धर्मदृष्टि धवल है। एकाधिक प्रसंगों में उन्हें ऊहापोह में देखा जा सकता है। वह ऊहापोह भी अनन्य प्रेम संबंधों के कारण है, जिसका निराकरण वे तत्क्षण कर डालते हैं। आचरण की शुद्धता पर कोई विभेद उनके मन में नहीं है ।
वे सुग्रीव पर हुए अन्याय के लिए बालि का वध करते हैं, तो बालि की भर्त्सना सुनकर धर्मप्रिय प्रतापी सम्राट की तरह उसे समझाते हैं कि अपने ही भाई की भार्या का हरण कर उसे भोगने वाला व्यक्ति महानीच है। उसका वध करना इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रियों और राम का धर्माचरण ही है।
सीता को अंतहीन कष्ट देने वाले रावण का वध धर्म का कार्य है। उसका वध करते हुए भी वे हर तरह के राग-द्वेष और क्रोध से दूर हैं। वे लक्ष्मण और विभीषण से भी यही कहते हैं कि मृत्यु के बाद घृणा का कोई अर्थ नहीं है। मृत्यु के बाद वैर भाव का भी अंत हो जाना चाहिए।
वाल्मीकि रामायण में कोई एक प्रसंग जो बार-बार हृदय को मथता है, वह राम का वनगमन है। कितने ही युग-वर्ष, मास, कल्प बीते। कितनी ही कथाएं, कितने ही चरित्र हमारी चेतना से उठकर चुपचाप चले गए। वाल्मीकि के राम त्रेतायुग में जैसे थे, वैसे ही ठहर गए। ऐसे ठहरे कि साक्षात अभी-अभी नीरनयन हम उन्हें वन जाते हुए देख आए हों।
वाल्मीकि के राम यानी विवेक! राम यानी परदु:ख कातरता! राम यानी स्वयं को क्लांत कर दूसरों को विश्रांति देना! तमसा नदी के तट पर वे भोरवेला में जागे। लक्ष्मण और सीता से चुपचाप नदी पार करने को कहा। वे चाहते थे कि उनके पीछे-पीछे चली आई अयोध्या की जनता के जागने से पहले ही तमसा का तट त्याग दिया जाए। अन्यथा अयोध्या के जनसमूह को भी व्यर्थ ही वृक्षों के नीचे और घाटों पर सोने का दुख भोगना होगा।
जो सुमंत्र अब तक राम के साथ थे, उन्हें राम बार-बार अयोध्या वापस लौटने को कह रहे थे। कितनी ही दुहाइयों के बाद सुमंत्र को लौटना पड़ा। राम का वनगमन सामूहिक विरह की सबसे घनीभूत भावना है। किसी एक मनुष्य के वनवास पर संसार कभी इतना विकल न हुआ। किसी एक मनुष्य को दंड दिए जाने से हजारों हजार हृदय इस तरह से विदीर्ण न हुए। राम का वनगमन विरह और दुखभाव पर लिखे हजारों पृष्ठों के शाश्वत साहित्य की प्रस्तावना भी है। प्रथम अध्याय भी और उपसंहार भी। उसे त्याग कर उस शाश्वत साहित्य का पारायण संभव नहीं है और उसे सर्वप्रथम रचने वाले महाकवि वाल्मीकि ही थे।
वाल्मीकि के जन्म के संबंध में भ्रामक धारणाएं प्रचलित हैं। कई जगह उन्हें प्रचेता ऋषि का पुत्र कहा गया है, तो कहीं श्वपच और कहीं ब्राह्मण कुलोद्भव, जिसने दस्युवृत्ति अपना ली। उनका जन्म और कुल महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि महर्षि ने राम को भारतीय धर्म, संस्कृति और आचार- विचार के सबसे ऊंचे धरातल पर चित्रित किया। वाल्मीकि इस देश में रची गई सैकड़ों रामायणों और अनगिन रामकथाओं के मूल स्रोत हैं।
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यत्क्रौंच मिथुनादेकमवधी: काम-मोहितम।
वाल्मीकि व्याध को शाप देकर ही निवृत्त नहीं हुए। उन्होंने उस क्षण में ही युगों, शताब्दियों और संभवत: इस संसार में मनुष्य की सत्ता रहने तक के लिए स्वयं को अमर कर लिया, क्योंकि उन्होंने राम को रचा। वह क्रौंच पक्षी का वध देखकर कुछ अन्यतम रचना चाहते थे। परंतु उनके समक्ष ऐसा कोई पात्र नहीं था। तब ब्रह्मा ने उन्हें रघुकुल शिरोमणि राम का नाम सुझाया और वाल्मीकि आदिकवि हुए।
लोक में वाल्मीकि के राम की प्रचारित छवि ऐसी है कि वे हमारे जीवन में एक आयु तक केवल राजा राम के रूप में ही प्रतिष्ठित रहे। एक अरसे तक हम सुनते रहे कि वाल्मीकि के राम तो इस लोक के राजा राम थे। ऐसे राम, जो प्रश्नों के घेरे में रहे। ऐसे राम, जो इस लोक और लोकोत्तर संसार में अपनी ईश्वरीय उपस्थिति से हमें मोहित नहीं करते। वे तो तुलसी के राम थे, जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए!
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वाल्मीकि के राम 16 वर्ष की आयु तक एक तरह से मौन धारण किए चलते हैं। वे पिता को सुनते हैं। गुरु को सुनते हैं। भाइयों को सुनते हैं। बोलते उतना ही हैं, जितना संवाद के लिए आवश्यक है। राम के पुरुषार्थ का पहला परिचय कब मिलता है? ताड़का और मारीच को दंडित करते हुए भी नहीं मिलता। वे तो उन्हें धर्माचरण करते हुए दंडित करते हैं। राम के पुरुषार्थ का पहला परिचय तब मिलता है, जब वे खेल-खेल में ही शिव धनुष को भंग कर डालते हैं।
यह प्रत्यक्ष रूप से उनके पौरुष का प्रमाण है। राम हंसते हुए उस महाधनुष को खंडित कर डालते हैं, जिस पर देव, गंधर्व, असुर, राक्षस और किन्नर कोई प्रत्यंचा तक न चढ़ा सका। यह राम के पुरुषोत्तम रूप में समाहित महागुण का ही दर्शन है। उनका अद्वितीय पुरुषार्थ और उस पुरुषार्थ को इस संसार में प्रतिष्ठित करने वाले प्रथम कवि वाल्मीकि हैं।
वाल्मीकि के राम को क्रोध पहली बार कब आता है? जब परशुराम उन्हें चुनौती देते हैं। पिता के सामने राम संयमित हैं। लेकिन सीमा तोड़ रहे परशुराम को देखकर वे कह उठते हैं-
वीर्यहीनमिवाशक्तं क्षत्रधर्मेण भार्गव।
अवजानासि मे तेज: पश्य मेद्य पराक्रमम्।।
(ब्राह्मण होने के कारण मैं आपका सम्मान करता हूं, किंतु आपको मुझे चुनौती देने का अधिकार नहीं है। मुझे अपना धनुष दीजिए और देखिए मेरा पराक्रम!)
राज्याभिषेक की तैयारियों में डूबी अयोध्या को निरख कर राम प्रमुदित हैं। अचानक दशरथ से बुलावा आता है। दशरथ कुछ बोल नहीं पाते। कैकेयी सारा वृत्तांत सुनाती हैं। चारों ओर छिटकी पूर्णिमा क्षण भर में अमा में ढल जाती है, लेकिन राम अविचलित हैं। अचंचल, स्थितप्रज्ञ योगियों की तरह कहते हैं:
एवमस्तु गमिष्यामि वनं वस्तुमहं त्वित:।
जटाचीरधरो राज्ञ: प्रतिज्ञामनुपालयन।।
यह वाल्मीकि के राम हैं। महावीर.. महाधीर.. प्रशांत.. स्थिरचित्त! वे कहते हैं- इसमें क्या संकट है..? मैं पिता की आज्ञा के लिए आज ही जटा और चीर धारण कर वन चला जाऊंगा!
आगे वे कैकेयी से कहते हैं कि भरत के लिए तो मैं अपना राज्य, अपनी प्रिया पत्नी और जीवन तीनों का त्याग कर सकता हूं।
इसके बाद का एक पूरा का पूरा प्रसंग ही उनके मर्यादा पुरुषोत्तम होने का प्रमाण है। वे पिता, माता, पत्नी, भाई से संवाद करते हैं और बारंबार अपनी धर्मदृष्टि से वनगमन को उचित ठहराते हैं। राम के वनगमन के बाद जब अयोध्या रिक्त हो जाती है और इन सब उत्थान-पतनाघातों से अनभिज्ञ भरत साकेत लौटते हैं। उन पर वज्रपात होता है। भरत अपनी तीन माताओं, गुरु वशिष्ठ, महर्षि जाबालि और पूरे लाव लश्कर के साथ चित्रकूट पहुंच चुके हैं।
लक्ष्मण जो कि आवेग में विवेक खोने के अभ्यस्त हैं, कहते हैं कि भरत की मति मारी गई है भैया! उसका वध कर दो..। तात, पूर्व के अपकारों का दंड पाप नहीं, पुण्य होता है। जोश में आकर वे कैकेयी समेत अन्य लोगों के वध करने की बात करते हैं। वाल्मीकि ने राम और भरत में अपार साधुता दिखलाई, तो लक्ष्मण में राम के लिए अद्वितीय एकनिष्ठता, त्याग का वर्णन भी किया। वाल्मीकि के लक्ष्मण उद्धत हैं। किंतु राम लक्ष्मण को शांत करते हैं।
पिता से सत्यपालन की प्रतिज्ञा कर भरत का वध करने और राज्य छीनने से संसार में क्या मिलेगा..? मैं उस राज्य का क्या करूंगा, किसे मुंह दिखाऊंगा..। इसके बाद राम कहते हैं-
धर्मं अर्थं च कामं चे पृथिवीं चापि लक्ष्मण।
इच्छामि भवतामर्थे एतत प्रतिश्रिणोति मे।।
(लक्ष्मण मैं तुम्हारे सामने शपथ लेकर कह सकता हूं कि अपने लिए राज्य की कोई कामना मैं कभी नहीं करता। धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वी के सभी भोगपदार्थ मैं तुम लोगों के लिए चाहता हूं।)
यह पुरुषोत्तम नहीं तो और कौन है..? यह तो निष्काम योगी सम्राट से ही संभव है जो भोगलिप्सा और तमाम वैभव से दूर है। जब भरत श्रीराम से मिलकर विलाप करते हैं, उन्हें बारंबार अयोध्या लौटने को कहते हैं। अपनी माता कैकेयी को कोसते हैं, तो राम शांत भाव से उत्तर देते हैं कि भरत, तुम मुझे कुलीन, सत्यनिष्ठ, गुण और आचारवान मानते हो, तो पिता की आज्ञा का उल्लंघन करने को कैसे कहते हो? मुझे तुम्हारे भीतर कोई दोष नहीं दिखता और माता की निंदा भी तुम्हें शोभा नहीं देती। भरत नहीं मानते। येन केन प्रकारेण राम को अयोध्या वापस ले चलने का प्रयास करते हैं, तो राम कहते हैं कि जीव ईश्वर के समान नहीं है। इसलिए अपनी इच्छा से न कुछ करता है, न ही कुछ कर सकता है। वह तो काल के साथ बहता है।
वे अपनी बात को आगे बढ़ाकर गीतात्मक उपदेश पर ले जाते हैं कि समस्त संग्रहों का अंत विछिन्न होना है। सभी उन्नतियों का अंत पतन है। सभी संयोगों का अंत वियोग है और सभी के जीवन की समाप्ति मृत्यु है। जैसे समुद्र में तैरते हुए दो काठ की लकड़ियां कभी मिल जाती हैं, फिर कुछ देर में अलग हो जाती हैं, उसी तरह से संसार में पत्नी, पुत्र और कुटुंब, धन भी मिलते-बिछुड़ते हैं। पुन: राम भरत को भुज बीच भरकर प्रेम से सींचते हुए कहते हैं कि इस शाश्वत सत्य के बाद तुम्हें दु:ख और शोक का त्याग कर स्वस्थ हो जाना चाहिए और अयोध्या का राज्य चलाना चाहिए। यह विमर्श चलता रहता है।
संपूर्ण वाल्मीकि रामायण ऐसे उदाहरणों से भरी हुई है। राम धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य के बीच कभी भ्रमित नहीं होते। वाल्मीकि के राम की धर्मदृष्टि धवल है। एकाधिक प्रसंगों में उन्हें ऊहापोह में देखा जा सकता है। वह ऊहापोह भी अनन्य प्रेम संबंधों के कारण है, जिसका निराकरण वे तत्क्षण कर डालते हैं। आचरण की शुद्धता पर कोई विभेद उनके मन में नहीं है ।
वे सुग्रीव पर हुए अन्याय के लिए बालि का वध करते हैं, तो बालि की भर्त्सना सुनकर धर्मप्रिय प्रतापी सम्राट की तरह उसे समझाते हैं कि अपने ही भाई की भार्या का हरण कर उसे भोगने वाला व्यक्ति महानीच है। उसका वध करना इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रियों और राम का धर्माचरण ही है।
सीता को अंतहीन कष्ट देने वाले रावण का वध धर्म का कार्य है। उसका वध करते हुए भी वे हर तरह के राग-द्वेष और क्रोध से दूर हैं। वे लक्ष्मण और विभीषण से भी यही कहते हैं कि मृत्यु के बाद घृणा का कोई अर्थ नहीं है। मृत्यु के बाद वैर भाव का भी अंत हो जाना चाहिए।
वाल्मीकि रामायण में कोई एक प्रसंग जो बार-बार हृदय को मथता है, वह राम का वनगमन है। कितने ही युग-वर्ष, मास, कल्प बीते। कितनी ही कथाएं, कितने ही चरित्र हमारी चेतना से उठकर चुपचाप चले गए। वाल्मीकि के राम त्रेतायुग में जैसे थे, वैसे ही ठहर गए। ऐसे ठहरे कि साक्षात अभी-अभी नीरनयन हम उन्हें वन जाते हुए देख आए हों।
वाल्मीकि के राम यानी विवेक! राम यानी परदु:ख कातरता! राम यानी स्वयं को क्लांत कर दूसरों को विश्रांति देना! तमसा नदी के तट पर वे भोरवेला में जागे। लक्ष्मण और सीता से चुपचाप नदी पार करने को कहा। वे चाहते थे कि उनके पीछे-पीछे चली आई अयोध्या की जनता के जागने से पहले ही तमसा का तट त्याग दिया जाए। अन्यथा अयोध्या के जनसमूह को भी व्यर्थ ही वृक्षों के नीचे और घाटों पर सोने का दुख भोगना होगा।
जो सुमंत्र अब तक राम के साथ थे, उन्हें राम बार-बार अयोध्या वापस लौटने को कह रहे थे। कितनी ही दुहाइयों के बाद सुमंत्र को लौटना पड़ा। राम का वनगमन सामूहिक विरह की सबसे घनीभूत भावना है। किसी एक मनुष्य के वनवास पर संसार कभी इतना विकल न हुआ। किसी एक मनुष्य को दंड दिए जाने से हजारों हजार हृदय इस तरह से विदीर्ण न हुए। राम का वनगमन विरह और दुखभाव पर लिखे हजारों पृष्ठों के शाश्वत साहित्य की प्रस्तावना भी है। प्रथम अध्याय भी और उपसंहार भी। उसे त्याग कर उस शाश्वत साहित्य का पारायण संभव नहीं है और उसे सर्वप्रथम रचने वाले महाकवि वाल्मीकि ही थे।
वाल्मीकि के जन्म के संबंध में भ्रामक धारणाएं प्रचलित हैं। कई जगह उन्हें प्रचेता ऋषि का पुत्र कहा गया है, तो कहीं श्वपच और कहीं ब्राह्मण कुलोद्भव, जिसने दस्युवृत्ति अपना ली। उनका जन्म और कुल महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि महर्षि ने राम को भारतीय धर्म, संस्कृति और आचार- विचार के सबसे ऊंचे धरातल पर चित्रित किया। वाल्मीकि इस देश में रची गई सैकड़ों रामायणों और अनगिन रामकथाओं के मूल स्रोत हैं।