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Ayodhya Ram Mandir: हृदय में जब राम है, तभी आराम है
Tue, 16 Jan 2024 10:01 PM IST
अमर शर्मा
नवीन सिंह
नवीन सिंह
Published by: अमर शर्मा
Updated Tue, 16 Jan 2024 10:01 PM IST
सार
राम ने चौदह वर्ष के वनवास के दौरान जो सभी जातियों के बीच जो लोकप्रियता प्राप्त की उसका प्रभाव आज तक विधमान हैं। निषाद राज केवट, शबरी जैसे पात्र राम कथा के अभिन्न अंग है। हर युग में उन पर राम के अनुग्रह के प्रसंगों को लिखा जाता रहा है। रघुवंश तक में किरात और किरातियों के प्रसंगों की अनदेखी नहीं हुई हैं। यही कारण है कि राम और भारतीय जनमानस का संबंध अटूट रहा है। देखकर सीखने की सहजता के धनी जनजातिय समुदायों ने राम से बहुत कुछ सीखा। हमारे देश में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रामधर्म का बड़ा महत्व हैं।
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Ramlala
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
- नवीन सिंह
भारतीय जनमानस में श्रीराम और उनकी मर्यादाओं का महत्व युगों-युगों से यथावत है। श्रीराम जनमानस में उस आदर्श के रूप में स्मृत है, जिन्होंने लंबे समय तक जिस राज्य व्यव्स्था का संचालन किया वह सर्वकालिक रही। रघुकुल ने जन-जन के आचरण के योग्य जिस जीवन पद्धति को प्रवर्तित करते हुए जिन मर्यादाओं को नियमित किया वे आज राम स्मृति के रूप में स्मरणीय हैं। यह हमारे लिए राजधर्म है।
राम ने चौदह वर्ष के वनवास के दौरान जो सभी जातियों के बीच जो लोकप्रियता प्राप्त की उसका प्रभाव आज तक विधमान हैं। निषाद राज केवट, शबरी जैसे पात्र राम कथा के अभिन्न अंग है। हर युग में उन पर राम के अनुग्रह के प्रसंगों को लिखा जाता रहा है। रघुवंश तक में किरात और किरातियों के प्रसंगों की अनदेखी नहीं हुई हैं। यही कारण है कि राम और भारतीय जनमानस का संबंध अटूट रहा है। देखकर सीखने की सहजता के धनी जनजातिय समुदायों ने राम से बहुत कुछ सीखा। हमारे देश में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रामधर्म का बड़ा महत्व हैं। रामधर्म से आशय यह है कि वह व्यक्ति जो मूल्य निष्ठ जीवन जीता है, आचरण और व्यवहार में सर्वकालिक मूल्यों को महत्व देता है वही राम धर्मी है। इसके विपरीत आज भी जो व्यक्ति जीवन में उक्त मूल्यों को महत्व नहीं देता है, उसके लिए कहा जाता है कि वह धर्मी नहीं हैं। जनजातिय समुदाय में भी राम कभी अतीत नहीं हो सकते क्योंकि वे मूल्यगत होकर अपनी सार्वकालिक उपस्थिति रखते हैं। मर्यादा रूप में राम सदैव निर्देशन करते प्रतीत होते हैं।
इसलिए कहा जाता है:-
“राम रिया सबै आरांभ”
अर्थात् यदि “हृदय में राम है तो आराम है”
राम हमेशा सत्य वचन, सामुदायिक हित-चिंतन, आवश्यकता पड़ने पर सभी का सहयोग, सभी का आदर पुकार होने पर मदद के लिए प्रस्तुत रहना जैसे कई विचार है जिनका पालन करना रामधर्म का पालन कहा जाता है। रामधर्म में सत्य बोलना, मिलावटी सत्य नहीं बोलना कुछ सुनना भी हो तो सत्य सुनना तथा मिल-जुलकर रहना, अपना ही नहीं परहित का भी खयाल रखना चाहिए।
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श्रीराम तो भाव के भूखे हैं, व्यक्ति से प्रसन्न होते हैं। राम के प्रति सहज रहना चाहिए। वे कभी कुछ मांगते नहीं। मनुहार पर राम ने (शबरी के) कच्चे और जूठे बेर तक खाए। राम के चरणों में केवट की तरह तत्परता दिखाना चाहिए। केवट ने राम जी को नदी को पार उतारा लेकिन सेवा का फल उसे राम ने ऐसा दिया कि जीते जी भवसागर से पार लगा दिया। इस लिए देश की समूची जनमानस रामधर्म के आचरण को स्वीकार किया है। राम के आदर्शो पर चलकर ही मनुष्य सुख को पा सकता है और परमगति को प्राप्त कर सकता है। राम के आचरण को अपने जीवन में नहीं उतारने वाले को अंततः पछतावा ही होता है। क्योंकि राम को छोड़कर अन्य किसी को आप हृदय में रखते हैं तो वो नाम अंत में हृदय को कष्ट ही देगा। इसलिए जीवन के प्रत्येक व्यवहार में राम द्वारा प्रवर्तित मर्यादाओं का ही पालन करना चाहिए। इन मर्यादाओ में सबसे ज्यादा बल सदाचार पर होना चाहिए। सदाचार से ही धर्म और धन दोनों फलते हैं।
भारतीय जनमानस के स्त्रियों को भी सीता जैसे जीवन शैली और उनकी चारित्रिक विशेषाताओं को लोकआदर्श के रूप में अपनाना चाहिए। नारी जीवन को तो जीवन भर सावधानियाँ बरतनी ही चाहिए। मगर अंत काल में जरूर ही नारी अगर सीता जैसा अपना जीवन दर्शन बनाती है तो वही बैकुण्ठ जाती है। और उनको लंबी आयु प्राप्त होती है। तथा इनके इच्छित वंश को भी बढ़ाता है। महिलाओं को सीता जैसा आचरण करने पर अभीष्ट धन की प्राप्ति होती है। और अनिष्टता से निजात मिलता है।
जब आपके हृदय में राम विराजमान होंगे तब आपको भविषय की भी जानकारी का आभास मिलता रहेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे देश में विभिन्न धर्मों को मानने वालो के बीच चाहे जो राम हो मगर लेकिन उसको अपना बेहतर आचरण बनाने की सीख लेनी है तो उनको राम से ही लेनी चाहिए। आज राम का जो पारिवारिक आदर्श है उनका ये आदर्श जन साधारण में रचाने बसाने की जरूरत है। अगर राम जैसा चरित्र पूरे जनमानस में स्वीकार हो जाए तो सारी समस्या छू मंतर हो सकती है। राम इतने महान थे कि वे घोर अरण्य में रहने वालों का उद्धार कर सकते हैं तो आपका भी कर सकते हैं।
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भारतीय जनमानस में श्रीराम और उनकी मर्यादाओं का महत्व युगों-युगों से यथावत है। श्रीराम जनमानस में उस आदर्श के रूप में स्मृत है, जिन्होंने लंबे समय तक जिस राज्य व्यव्स्था का संचालन किया वह सर्वकालिक रही। रघुकुल ने जन-जन के आचरण के योग्य जिस जीवन पद्धति को प्रवर्तित करते हुए जिन मर्यादाओं को नियमित किया वे आज राम स्मृति के रूप में स्मरणीय हैं। यह हमारे लिए राजधर्म है।
राम ने चौदह वर्ष के वनवास के दौरान जो सभी जातियों के बीच जो लोकप्रियता प्राप्त की उसका प्रभाव आज तक विधमान हैं। निषाद राज केवट, शबरी जैसे पात्र राम कथा के अभिन्न अंग है। हर युग में उन पर राम के अनुग्रह के प्रसंगों को लिखा जाता रहा है। रघुवंश तक में किरात और किरातियों के प्रसंगों की अनदेखी नहीं हुई हैं। यही कारण है कि राम और भारतीय जनमानस का संबंध अटूट रहा है। देखकर सीखने की सहजता के धनी जनजातिय समुदायों ने राम से बहुत कुछ सीखा। हमारे देश में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रामधर्म का बड़ा महत्व हैं। रामधर्म से आशय यह है कि वह व्यक्ति जो मूल्य निष्ठ जीवन जीता है, आचरण और व्यवहार में सर्वकालिक मूल्यों को महत्व देता है वही राम धर्मी है। इसके विपरीत आज भी जो व्यक्ति जीवन में उक्त मूल्यों को महत्व नहीं देता है, उसके लिए कहा जाता है कि वह धर्मी नहीं हैं। जनजातिय समुदाय में भी राम कभी अतीत नहीं हो सकते क्योंकि वे मूल्यगत होकर अपनी सार्वकालिक उपस्थिति रखते हैं। मर्यादा रूप में राम सदैव निर्देशन करते प्रतीत होते हैं।
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इसलिए कहा जाता है:-
“राम रिया सबै आरांभ”
अर्थात् यदि “हृदय में राम है तो आराम है”
राम हमेशा सत्य वचन, सामुदायिक हित-चिंतन, आवश्यकता पड़ने पर सभी का सहयोग, सभी का आदर पुकार होने पर मदद के लिए प्रस्तुत रहना जैसे कई विचार है जिनका पालन करना रामधर्म का पालन कहा जाता है। रामधर्म में सत्य बोलना, मिलावटी सत्य नहीं बोलना कुछ सुनना भी हो तो सत्य सुनना तथा मिल-जुलकर रहना, अपना ही नहीं परहित का भी खयाल रखना चाहिए।
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श्रीराम तो भाव के भूखे हैं, व्यक्ति से प्रसन्न होते हैं। राम के प्रति सहज रहना चाहिए। वे कभी कुछ मांगते नहीं। मनुहार पर राम ने (शबरी के) कच्चे और जूठे बेर तक खाए। राम के चरणों में केवट की तरह तत्परता दिखाना चाहिए। केवट ने राम जी को नदी को पार उतारा लेकिन सेवा का फल उसे राम ने ऐसा दिया कि जीते जी भवसागर से पार लगा दिया। इस लिए देश की समूची जनमानस रामधर्म के आचरण को स्वीकार किया है। राम के आदर्शो पर चलकर ही मनुष्य सुख को पा सकता है और परमगति को प्राप्त कर सकता है। राम के आचरण को अपने जीवन में नहीं उतारने वाले को अंततः पछतावा ही होता है। क्योंकि राम को छोड़कर अन्य किसी को आप हृदय में रखते हैं तो वो नाम अंत में हृदय को कष्ट ही देगा। इसलिए जीवन के प्रत्येक व्यवहार में राम द्वारा प्रवर्तित मर्यादाओं का ही पालन करना चाहिए। इन मर्यादाओ में सबसे ज्यादा बल सदाचार पर होना चाहिए। सदाचार से ही धर्म और धन दोनों फलते हैं।
भारतीय जनमानस के स्त्रियों को भी सीता जैसे जीवन शैली और उनकी चारित्रिक विशेषाताओं को लोकआदर्श के रूप में अपनाना चाहिए। नारी जीवन को तो जीवन भर सावधानियाँ बरतनी ही चाहिए। मगर अंत काल में जरूर ही नारी अगर सीता जैसा अपना जीवन दर्शन बनाती है तो वही बैकुण्ठ जाती है। और उनको लंबी आयु प्राप्त होती है। तथा इनके इच्छित वंश को भी बढ़ाता है। महिलाओं को सीता जैसा आचरण करने पर अभीष्ट धन की प्राप्ति होती है। और अनिष्टता से निजात मिलता है।
जब आपके हृदय में राम विराजमान होंगे तब आपको भविषय की भी जानकारी का आभास मिलता रहेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे देश में विभिन्न धर्मों को मानने वालो के बीच चाहे जो राम हो मगर लेकिन उसको अपना बेहतर आचरण बनाने की सीख लेनी है तो उनको राम से ही लेनी चाहिए। आज राम का जो पारिवारिक आदर्श है उनका ये आदर्श जन साधारण में रचाने बसाने की जरूरत है। अगर राम जैसा चरित्र पूरे जनमानस में स्वीकार हो जाए तो सारी समस्या छू मंतर हो सकती है। राम इतने महान थे कि वे घोर अरण्य में रहने वालों का उद्धार कर सकते हैं तो आपका भी कर सकते हैं।