फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Ram Mandir ›   Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Sri Ram Katha and Tribal Reference

Ayodhya Ram Mandir: राम कथा को जनजातीय संदर्भों से जोड़कर ही होगा समाज कल्याण

Fri, 12 Jan 2024 11:26 PM IST
अमर शर्मा भारती सिंह आर्य
भारती सिंह आर्य Published by: अमर शर्मा Updated Fri, 12 Jan 2024 11:26 PM IST
सार

टोटेमिक (पशु गोत्र) और काव्यात्मक, दोनों पहचानों का विश्लेषण करें, तो वानर, ऋक्ष (रीक्ष, भालू), जटायु (गिद्ध) राजाओं का उल्लेख है। सभी का वर्णन आज के गोंड, भील, कोल और अन्य जनजातियों से मिलता है। वानर राज सुग्रीव की राजधानी गोदावरी के दक्षिण में पंपा नदी पर स्थित है। इस पर मतभेद है कि यह पंपा वर्तमान में केरल में बहने वाली पंपा नहीं, कोई अन्य नदी है। वानर जनजाति, गोंड (कोईतूर, खोंड, कोया) जनजाति से मेल खाती है। गोंड जनजातियां तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना, महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार और मध्य प्रदेश में आज भी वनों में निवास करती हैं।

विज्ञापन
Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Sri Ram Katha and Tribal Reference
Ramlala - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

- भारती सिंह आर्य
विज्ञापन


नाहं मन्ये सुवेदेति न वेदेति वेद च|
योनस्तव्देद तव्देद नो न वेदेति वेद च||
- केन उपनिषद

राम कथा भारत का प्राचीनतम साक्ष्य है, जो काव्यात्मक शैली में लिखा गया है, ताकि इसे कंठस्थ कर पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित किया जा सके। इस महाकाव्य के हजारों वर्षों के संचरण से कई बातें रचनाकारों की अभिव्यक्ति की शैली और उनकी बोधात्मक क्षमता के अनुसार संवर्धित और परिवर्तित होती गईं। कालांतर में लिखित महाकाव्य आए, जिसमें गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस प्रमुख है।

अलाउद्दीन खिलजी जब अवध का सूबेदार बना, तो उसने संस्कृत बोलने और सिखाने वाले सभी लोगों को संस्कृत की हस्तलिखित हजारों पुस्तकों के साथ जिंदा जला दिया। धार्मिक यात्राओं पर मृत्यु दंड मिलना आम बात थी। जब संस्कृत रामायण का तुलसीदास ने मानस रूप में वर्णन किया, तो जनजातीय क्षेत्रों की जानकारी के अभाव में अथवा भाव प्रधानता के कारण जनजातीय नायकों को उनके गोत्र चिन्ह यानी पशु के रूप में वर्णित किया। वे सभी उन पशु रूपों में ही कल्पनाओं में दृढ़ हो गए। फिर भी प्रभु श्रीराम और धर्म के पुनर्जागरण में रामचरित मानस का अप्रतिम योगदान अतुलनीय है।
विज्ञापन


वर्तमान में जब एक ईश्वर वादी संप्रदाय के लोग भारत की जनजातियों को मतांतरित और अभारतीय विचारों से भ्रमित कर रहे हैं, तब अरण्य संस्कृति के पुरोधा जनजातीय समाज के अस्मिता जागरण की बहुत आवश्यकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे|
भए समर सागर कहं बेरे||
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे|
भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे||
(रामचरित मानस)

हम जनजातीय दृष्टिकोण से प्रकाश डालें, तो श्री रामायण कथा के विभिन्न रूपों में कई जनजातीय समुदायों को आज की प्रचलित पहचान से भिन्न दर्शाया गया है। इस भ्रम को दूर करने की आवश्यकता है, ताकि समरस सहोदर भाव फिर से स्थापित हो सकें।

टोटेमिक (पशु गोत्र) और काव्यात्मक, दोनों पहचानों का विश्लेषण करें, तो वानर, ऋक्ष (रीक्ष, भालू), जटायु (गिद्ध) राजाओं का उल्लेख है। सभी का वर्णन आज के गोंड, भील, कोल और अन्य जनजातियों से मिलता है। वे आज भी वन क्षेत्रों के स्वतंत्र सांस्कृतिक क्षेत्रपति हैं। वानर राज सुग्रीव की राजधानी गोदावरी के दक्षिण में पंपा नदी पर स्थित है। इस पर मतभेद है कि यह पंपा वर्तमान में केरल में बहने वाली पंपा नहीं, बल्कि कोई अन्य नदी है। वानर जनजाति, गोंड (कोईतूर, खोंड, कोया) जनजाति से मेल खाती है। गोंड जनजातीय समुदाय तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना, महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार और मध्य प्रदेश में आज भी वनों में निवास करते हैं।

इन सभी क्षेत्रों में निवासरत गोंड समुदाय स्वयं को कोयतूर (पहाड़ी योद्धा) के नाम से चिन्हित करता है। उन्होंने रामायण और महाभारत, दोनों काल के युद्धों में योगदान दिया। हाल ही में तमिलनाडु के कोयंबटूर शहर का नाम कोयम पुथुर करने का प्रस्ताव पारित हुआ, जिसका अर्थ कोयाओं का नगर है। एक और जनजाति है, जिसे निषाद राज नाम से चिन्हित किया गया है। वे भीलों के समतुल्य हैं, जिनका विस्तार मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, सिंधु, बलूचिस्तान तक रहा है। महाभारत काल में भील समुदाय का विशेष योगदान रहा है।

कई आधुनिक शोधार्थी रामायण में उल्लिखित भौगोलिक क्षेत्रों को स्वीकार नहीं करते। इसका कारण कई स्थानीय नामों की पुनरावृत्ति है, जो स्वाभाविक है। कई स्थानों और नदियों के नाम हिंदू राजाओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में दिए। इस कारण की भ्रम की स्थिति है। जैसे अयोध्या नाम भारत, नेपाल और थाइलैंड तक मिलते हैं। बेतवा नदी के तट पर भिलसा शहर को खिलजी ने लूटा था। यह शहर परमारों से पहले भीलों के अधीन था। भिलसा के नजदीक मातंग आश्रम होना स्वाभाविक है, क्योंकि खजुराहो का प्राचीनतम मातेंगेश्वर शिव मंदिर मातंग ऋषि ने प्राण प्रतिष्ठित किया है। शबरी माता शबर अथवा भील थीं, जो इसी मातंग आश्रम में रहतीं थीं।

राजा सुग्रीव ने राजधानी किष्किंधा से सभी दिशाओं में गुप्तचर भेजे। उन सभी स्थानों का अवलोकन करें, तो किष्किंधा नगरी सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं पर थी एवं रिश्मुख पर्वत पंचमढ़ी में रहा होगा, जिस पर नहीं जाने का श्राप बालि पर था। कर्नाटक में किष्किंधा होना तथ्यात्मक सिद्ध नहीं लगता, क्योंकि वह क्षेत्र तब यक्षों के आधीन था, न कि वानरों के। जैसा कई विद्वान सोचते हैं, ऐसा हिंदू राजाओं के रामायण कालीन नामों के दक्षिण में पुनर्नामांकन के कारण हुआ होगा।

कई संदर्भ आज भी जनजातीय बहुल स्थानों से जुड़े हैं। मान्यता है कि जब राजा दशरथ की मृत्यु हुई, तब भरत ने चित्रकूट के पास राम को वापस अयोध्या आने के लिए आमंत्रित किया। जबलपुर के जाबालि ऋषि का प्रसंग वाल्मीकि रामायण में आता है। आज भी जनजातीय समुदाय अपने वचन और सत्य का अनुसरण करता है। जबलपुर की जाबालि शिला (बेलेंसिंग रॉक) को लेकर मान्यता थी कि अभी तक किसी जनजाति ने राम के समान वचन नहीं तोड़ा है, इसलिए जाबालि शिला टिकी हुई है।

सीता ने अपने स्वर्णाभूषण लंका के रास्ते में छोड़ दिए थे। वानर गोत्र राजा सुग्रीव और लक्ष्मण के संवाद में उन सभी स्थानों का वर्णन है, जहां से आभूषण एकत्र किए गए थे। वाल्मीकि रामायण में भारत के बड़े भू-भाग का उल्लेख है। यह कार्य सुग्रीव की सेना ने अर्ध ऋतु अथवा दो माह में किया था। इससे सिद्ध होता है कि सुग्रीव के पास विशाल सेना थी। आज भी जनजातीय परंपरा है कि मुसीबत में स्वर्णाभूषण विपत्ति को आकर्षित कर देते हैं। आज भी गोंड महिलाएं सोने की अपेक्षा चांदी के आभूषण पहनती हैं। गुदना (टैटू) करवाती हैं, जो विपत्ति में भी, अल्पता में भी उनका साथ नहीं छोड़ते।

रामायण में जामवंत को रिक्षराज कहा गया है यानी भालू गोत्र। इनका निकटतम संबंध अफ्रीका मूल की इरुला और सिद्धी जनजातियों से है। इनका विस्तार कर्नाटक और तमिलनाडु में है। जामवंत इरुला जनजाति की पुत्री जामवती से कृष्ण ने विवाह किया था, ऐसी मान्यता है। अन्य ग्रंथों में कई बार जामवंत अथवा रिक्षराज (इरुला) जनजातियों का वर्णन है। जटायु और संपाती राजा दशरज के मित्र थे। इनका वर्णन कोंडा जनजाति से मिलता है। आंध्र प्रदेश के लेपाक्षी यानी उठो पक्षी ग्राम में राम ने जटायु का अंतिम संस्कार किया था। केरल के  जटायुमंगलम में भी जटायु-रावण युद्ध प्रचलित है। कुरूंबा और अन्य जनजातियां जटायु को पूजनीय मानती हैं।

रामायण काव्य का उद्देश्य धर्म, सिंद्धातों को आचरण द्वारा प्रचारित करना था। न कि इतिहास व लेखकों को महत्व देना। इसलिए वर्तमान रामायण के कई रूप भारत के कई भागों में प्रचलित हैं। जनजातियों में विशेषकर मध्य भारत में रामायण व महाभारत को रामायणी और छ्त्तीसगढ़ी पड़वानी के रूप में लोक काव्य के रूप में मंचित किया जाता रहा है| इनमें राम का वर्णन आदर्श राजा के मानवीय रूप में होता है। उन्हें अपने ही समाज के अंग के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

बुद्धिमान मधुराभाषी पूर्वभाषी प्रियंवद:।
वीर्यवान न च वीर्येण महता स्वेन विस्मित:।।
सत्यवादी महेष्वासो वृद्धसेवी जितेंद्रिय:।
स्मितपूर्वाभिभाषी च धर्मं सर्वात्मनाश्रित:।
(वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड)

राम के प्रति जनजातियों का प्रेम और वात्सल्य इतना प्रगाढ़ है कि उन्होंने उन्हें अपने से अलग देवता रूप में स्वीकार ही नहीं किया। जनजातियों और राम, दोनों के आराध्य देव शिव, महादेव हैं, यह भी उनकी राम के प्रति आस्था को स्थापित करता है। कहते हैं राम ने लंका में प्रवेश नहीं किया था, क्योंकि उनके वनवास को 14 वर्ष पूर्ण नहीं हुए थे। उन्होंने लक्ष्मण को विभीषण के राज्याभिषेक के लिए भेजा। परंतु वे सपत्नीक नहीं थे, इसलिए राज्याभिषेक नहीं कर सकते थे। राम ने गंगा के दक्षिण का सारा राज्य किष्किंधा नरेश सुग्रीव को सौंप दिया। इसलिए विभीषण का राज्याभिषेक सुग्रीव ने किया। रावण के बाद विंध्याचल और दक्षिण के राजा सुग्रीव हुए। आज भी कई दक्षिणपंथी अनुष्ठानों में राजन स्वरूप में जनजातीय वर्ग की उपस्थिति आवश्यक है। भरत ने सुग्रीव को अपने पांचवें भाई के रूप में मान्यता दी। जनजातीय समाज का राम कथा में समान सहोदर स्थान है।

मौलिक तमिल रामायण और तेलुगु रामायण राम द्वारा सीता के परित्याग की बात का समर्थन नहीं करती। यह प्रसंग उत्तर कांड में जोड़ा गया है, वह मूल रामायण का हिस्सा नहीं हैं। उत्तर कांड को कालांतर में उत्तर मीमांसा कहा गया, जो पौराणिक काल में संलग्न किया गया। साथ ही शंभूक प्रसंग संभवत: बाद में जोड़ा गया, जो प्रभु राम के मर्यादा पुरुषोत्तम रूप से बिलकुल मेल नहीं खाता। वाल्मीकि रामायण में वाल्मीकि कृत केवल छह कांड हैं। सातवां कांड उत्तर कांड, कालांतर में वाल्मीकि ऋषि परंपरा के शिष्यों ने जोड़ा है। राम के अयोध्या आगमन के बाद वाल्मीकि रामायण समाप्त हो जाती है। प्रथम तमिल रामायण, कंबार रामायण 900 ईस्वी में लिखी गई। उसमें भी केवल छह खंड हैं। 1300 ईस्वी में प्रथम तेलगू रामायण राजा गोना बुद्धा रेड्डी ने लिखी। उसमें भी छह कांड हैं।

आधुनिक रामायण में उत्तर कांड का विशेष महत्व है, जिसे जनजातीय समाज प्रभु राम के अनुरूप नहीं मानते। प्रत्येक जनजातीय वर्ग में गर्भवती पत्नी का विशेष मान है। राम द्वारा सत्य व राजधर्म अनुसार गर्भवती सीता का परित्याग नहीं किया, ऐसी मान्यता समस्त जनजातियों की है। गोंडी रामायण में भी सीता के परित्याग का प्रसंग नहीं मिलता। छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश में मान्यता है कि लंका विजय के समय वनवास के 14 वर्ष पूर्ण नहीं हुए थे, इसलिए राम ने जनजातियों के साथ 10 दिन तक लंका विजय का उत्सव मनाया।


आज विदेशी मिशन धर्म परिवर्तन के माध्यम से झारखंड में जनजातियों को हिंदुओं से अलग धर्म कोड के लिए षड्यंत्र रच रहे हैं। वे इस बात से भी आशंकित हैं कि अयोध्या में बन रहा राम मंदिर कहीं मतांतरित जनजातियों को घर वापसी की राह पर न ले जाए। मिशन संस्थाओं का यह षड्यंत्र इसलिए अब तक संभव हो पा रहा है, क्योंकि हमारे महाकाव्यों, ग्रंथों में हम जनजातियों के गौरवशाली संदर्भों को उचित स्थान नहीं दे पाए हैं। 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed