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Ayodhya Ram Mandir: रामनामी समुदाय की देह पर अंकित हैं श्री राम के हस्ताक्षर

Mon, 15 Jan 2024 09:23 PM IST
अमर शर्मा ललित शर्मा
ललित शर्मा Published by: अमर शर्मा Updated Mon, 15 Jan 2024 09:23 PM IST
सार

इस पंथ के लोग अपने समाज के किसी भी समस्या का निवारण बिना कोर्ट-कचहरी का सहारा लिए अपनी पंचायत में करना पसंद करते हैं। पंचायत सर्वमान्य संस्था होती है। रामनामी पंथ के दो प्रमुख आयोजन होते हैं–  रामनवमी के उपलक्ष्य में संतों का समागम और त्रयोदशी तक चलने वाला तीन दिवसीय मेला। मेले के प्रथम दिन मेला स्थल पर निर्मित जयस्तंभ के ऊपर कलश चढ़ाया जाता है और रामचरित मानस की प्रति रख दी जाती है। दूसरे दिन रामायण पाठ एवं रामनाम के भजन का आयोजन होता है तथा तीसरे दिन सामूहिक विवाह, भंडारा स्वरूप सामूहिक भोजन का आयोजन होता है।

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Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Signature of Shri Ram is inscribed on body of Ramnami community
Ramlala - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

- ललित शर्मा
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छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) प्राचीन काल से ही राम नाम से सराबोर रहा है। राजिम स्थित जीवनदायनी पुराणों में वर्णित नदी चित्रोत्पला के संगम को छत्तीसगढ़ का प्रयागराज कहा जाता है। महानदी के किनारे स्थित सिहावा, राजिम, सिरपुर, खरौद, शिवरीनारायण, तुरतुरिया आदि स्थलों का संबंध रामायण काल के कथानकों से रहा है। इसी कारण इन स्थलों को सांस्कृतिक तीर्थ की संज्ञा दी जाती है। महानदी के किनारे स्थित गिरौदपुरी धाम में बाबा घासीदास ने जन्म लेकर सत्य का मार्ग दिखाया और सतनाम पंथ की स्थापना की। उनके अनुयायी सतनामी कहलाए। इसी प्रकार महानदी के तट पर स्थित ‘उड़काकन‘ राम नाम को समर्पित रामनामियों का पवित्र तीर्थ हुआ। इनको रामरमिहा या रमनमिहा भी कहा जाता है।

छत्तीसगढ़ में रामनामी पंथ की उत्पत्ति के संबंध में कहा जाता है कि ये लोग हरियाणा के नारनौल से यहां आए थे। उस काल के शासकों के दमनात्मक रवैये से परेशान होकर वे छत्तीसगढ़ जैसे शांत प्रांत की ओर पलायन कर वहीं बस गए। आज उनके 20वीं पीढ़ी के लोग वहां जीवन व्यतीत कर रहे हैं। तत्कालीन समाज ने गुरु घासीदास बाबा के मार्गों का अनुसरण किया था, परंतु कालांतर में वह वर्ग रामनामी, सतनामी, सूर्यवंशी इत्यादि पंथों में बंट गया। पूर्व काल में रामनामी लोग सतनाम पंथ को मानने वाले लोग थे।
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रामनामी लोग राम के सगुण रूप को नकार कर उनके निर्गुण रूप के उपासक होते हैं। जांजगीर-चांपा जिले के मालखरौद विकासखंड के अंतर्गत ग्राम चारपारा के परसराम भारद्वाज को रामनामी पंथ का प्रवर्तक माना जाता है। 1904 में उन्होंने निराकार ब्रम्ह के प्रतीक के रूप में राम को मान कर जन आंदोलन की शुरूआत की थी। सर्व प्रथम परशुराम भारद्वाज ने अपने माथे पर राम का नाम अंकित कराया। शरीर पर रामनाम लिखवाना रामनामी पंथ की प्रमुख पहचान है। 
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रामनामी संप्रदाय की उत्पत्ति के संबंध में आस्था मूलक एवं विद्रोह मूलक, दोनों कारणों का भास होता है। रामनामी पंथ के अनुसार उनके पंथ के प्रथम पुरुष परशुराम के शरीर में कुष्ठ रोग हो गया था, जो कि राम की कृपा से स्वतः ही ठीक हो गया था और उनके वक्ष स्थल पर राम का नाम अंकित हो गया था।

रामनामी पंथ के लोग अपने बच्चों के जन्म के छठवें दिन उसके माथे पर राम-राम नाम के चार अक्षर अंकित कराते हैं। बच्चा जब पांच वर्ष का होता है, तब और उसके विवाह के समय भी उसके शरीर पर लिखाई कराई जाती है। शरीर पर कितना और किस अंग पर लिखना है, यह स्वयं लिखने वाला या बच्चे का अभिभावक तय करता है। शरीर के किसी भी अंग पर राम राम लिखने वाले को रामनामी, माथे पर राम राम लिखने वाले को शिरोमणि, पूरे माथे पर राम नाम लिखने वाले को सर्वांग रामनामी तथा पूरे शरीर में सिर से लेकर नख तक राम नाम लिखवाने वाले को नखशिख रामनामी कहा जाता है। नखशिख रामनामी अपने जननांगों, पलकों एवं जीभ पर भी राम नाम लिखवा लेते हैं।

रामनामी अपने शरीर पर राम नाम गोदना पद्धति से ही लिखवाते हैं, पर वे राम नाम का लिखने को गोदना नहीं कहते। उनका मानना है कि गोदना में चित्र बनाया जाता है, न कि राम का नाम लिखा जाता है। जब राम नाम शरीर पर लिखावाया जाता है, तो लिखने वाला एवं लिखवाने वाला, दोनों व्यक्ति राम के भजन का गायन करते हैं। इस पंथ के लोग जब गृहस्थ जीवन छोड़ कर संन्यास लेते हैं, तब उन्हें त्यागी कहा जाने लगता है। पति-पत्नी साथ में त्यागी बन सकते हैं। त्यागी पुरुष को सर, भौंहों एवं दाढ़ी के बाल मुंडवाने पड़ते हैं। स्त्री त्यागी को सारे श्रृंगार और सुहाग चिन्हों का त्याग करना होता है।

रामनामी पंथ में मोर के पंखों का बना मुकुट वही लोग धारण करते हैं, जो निष्काम अवस्था को प्राप्त करते हैं अर्थात वे वासना का परित्याग कर देते हैं। सामान्य रामनामी इसे सामूहिक भजन के सुअवसर पर धारण करते हैं, जबकि त्यागी रामनामी मोर मुकुट हमेशा धारण किए होते हैं। सोते समय ही मुकुट हटाते हैं। मुकुट को रखने के लिए घर में एक विशेष स्थान होता है। उसे सफेद कपड़े में लपेट कर सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है। युवाओं को मोर मुकुट धारण करना निषिद्ध होता है।

रामनामी वस्त्र और ओढ़नी रामनामी पंथ के संतों एवं लोगों की विशेष पहचान है। रामनामी ओढ़नी को स्त्री एवं पुरुष, दोनों धारण करते हैं। सफेद सूती वस्त्र से निर्मित सवा दो मीटर लंबी दो चादरें रामनामी संतों एवं पुरुषों की परंपरागत पोशाक है। रामनामी संप्रदाय के प्रथम पुरुष परशुराम भारद्वाज सतनामी समाज के ही थे, जब उनके द्वारा राम राम प्रकाशित किया या तब उन्होंने सबसे पहले जैतखंब प्रतीक अपनाया।

लेकिन बाद में इसमें भिन्नता आ गई। सतनामियों का जैतखंब चबूतरे पर स्थापित लकड़ी अथवा सीमेंट से निर्मित स्तंभ होता है, जो कि सफेद रंग से पुता होता है। उस पर सफेद रंग की ध्वजा लगी रहती है। रामनामी जैतखंब पर स्तंभ एवं ध्वजा पर काले रंग से अनेक राम नाम का अंकन होता है। इसे जय स्तंभ भी कहा जाता है। चबूतरे पर अनेक खंभों पर काले अक्षर से राम नाम लिखा होता है। रामनामी पंथ में बड़े भजन मेले का प्रारंभ ऐसे ही जैतखंब पर कलश एवं ध्वजा चढ़ा कर किया जाता है। इस जैतखंब चबूतरे पर बैठकर रामनामी संत भजन करते हैं, बैठक करते हैं, सामुदायिक विवाह सम्पन्न कराते हैं।

सतनामी पंथ में घुंघरू का विशेष महत्व होता है। इस पंथ के लोग भजन गायन में वाद्य यंत्रों का प्रयोग न कर, घुंघरुओं का प्रयोग करते हैं। रामनामियों के द्वारा प्रयुक्त किये जाने वाले घूंघरू विशेष प्रकार के होते हैं। उन्हें विशेष प्रकार के कांसे से ढालकर बनाया जाता है। रामनामी पंथ के लोग इन्हें अपने पैरों में बांधकर विशेष लय पर झूमते हुए और घूमते हुए भजन गाते हैं।
इस पंथ के लोग अपने समाज के किसी भी समस्या का निवारण बिना कोर्ट-कचहरी का सहारा लिए अपनी पंचायत में करना पसंद करते हैं। पंचायत सर्वमान्य संस्था होती है। रामनामी पंथ के दो प्रमुख आयोजन होते हैं–  रामनवमी के उपलक्ष्य में संतों का समागम और त्रयोदशी तक चलने वाला तीन दिवसीय मेला। मेले के प्रथम दिन मेला स्थल पर निर्मित जयस्तंभ के ऊपर कलश चढ़ाया जाता है और रामचरित मानस की प्रति रख दी जाती है। दूसरे दिन रामायण पाठ एवं रामनाम के भजन का आयोजन होता है तथा तीसरे दिन सामूहिक विवाह, भंडारा स्वरूप सामूहिक भोजन का आयोजन होता है।


रामनामी पंथ के मेले की सबसे बड़ी विशेषता पारस्परिक सहयोग एवं एकता के साथ ही सद्भाव एवं भक्ति होती है। इस मेले में विवाह संस्कार का भी बहुत महत्व है। इनके मेले के दौरान लड़के एवं लड़की पक्ष वाले जैतखंभ के समक्ष एकत्र हो जाते हैं और उनके दाम्पत्य जीवन में प्रवेश करने हेतु वर-वधु के मस्तक पर गोदना कराया जाता है। जयस्तंभ के चारों ओर वर-वधु सात फेरे लेते हैं। पंथ के वरिष्ठ गुरुजन सिर पर रामांकित बोंगा धारण कर मयूर पंख से सुसज्जित कर आशीर्वाद देते हैं। विधवा से पुर्नविवाह की परंपरा भी है। इस प्रकार रामनामी पंथ के लोग राम नाम के प्रति आस्थावान होते हुए किसी भी तरह के व्यसन से मुक्त होते हैं। ये विशुद्ध शाकाहारी होते हैं। शरीर पर रामनाम लिखवाने के पीछे उनकी ऐसी धारणा होती है कि मृत्यु उपरांत स्वर्ग में ईश्वर इनकी पहचान कर लेंगे। उनके अनुसार शरीर पर अंकित राम नाम उनके शरीर पर राम जी का हस्ताक्षर है।
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