फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Ram Mandir ›   Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Shri Ram is biggest symbol of dignity and bravery

Ayodhya Ram Mandir: मर्यादा और शौर्य के सबसे बड़े प्रतीक हैं श्रीराम

Sat, 13 Jan 2024 10:31 PM IST
अमर शर्मा गरिमा संजय
गरिमा संजय Published by: अमर शर्मा Updated Sat, 13 Jan 2024 10:31 PM IST
सार

शस्त्र और शास्त्रों के ज्ञान में पारंगत श्रीराम के अद्भुत युद्ध-कौशल की कीर्ति सुनकर महर्षि विश्वामित्र जैसे अस्त्र-शस्त्र में श्रेष्ठ ऋषि भी इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने भयंकर राक्षसों का संहार कर अपनी यज्ञशालाओं को सुरक्षित बनाने के लिए केवल तरुण श्रीराम को ही चुना। श्रीराम पर महर्षि विश्वामित्र का यह विश्वास निराधार नहीं था। ऋषि-मुनियों के लिए यज्ञ करना असंभव बनाने वाली विशालकाय, शक्तिशाली राक्षसी ताड़का का वध श्रीराम ने अद्भुत शक्ति का प्रदर्शन करते हुए किया।

विज्ञापन
Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Shri Ram is biggest symbol of dignity and bravery
Ramlala - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

- गरिमा संजय
विज्ञापन

श्रीराम का जीवन चरित एक ओर मर्यादा का प्रतीक है, तो दूसरी ओर अदम्य साहस एवं शौर्य का। उन्होंने नारायण के अवतार में परिवार एवं समाज के हर रिश्ते के आदर्श स्थापित किए। उनके नाम का जप-मात्र भारतीय जन-मानस को युगों-युगों से शीतलता देता है। उनका शौर्य निर्बल को सबल बनाता है! वे श्रीराम अयोध्यापुरी के सर्वाधिक प्रिय राजकुमार ही नहीं थे, बल्कि जहां भी गए, वहां प्रेम और सौहार्द्र की रसधार बहाते रहे। वे केवल अपने पिता राजा दशरथ के प्राणाधार ही नहीं थे, बल्कि तीनों माताओं की आंखों के तारे थे। अपने समस्त गुरुजनों के कुशाग्र, प्यारे शिष्य थे। उन्होंने हर रिश्ते में आदर्श दृष्टांत प्रस्तुत किया।  उन्होंने समाज के समक्ष भ्रातृप्रेम का अद्भुत उदाहरण रखा।

शास्त्रों के अनुसार श्रीराम नारायण के मानव-अवतार हैं, उन्हीं नारायण के शैय्या रूपी शेषनाग के अवतार लक्ष्मण, उनके दिव्य शंख के अवतार भरत एवं सुदर्शन चक्र के अवतार शत्रुघ्न हैं। अयोध्या-नगरी के राजा दशरथ देवासुर संग्राम में देवताओं की ओर से युद्ध करने जाते थे और कैकेयी जैसी साहसी, वीरांगना पति की सारथी बन युद्ध में भाग लेती थीं। ऐसे दिव्य राज्य में श्रीराम के जन्म से केवल उनके माता-पिता के हृदय में ही नहीं, संपूर्ण अयोध्या नगरी में सुख का उजियारा छा गया।
विज्ञापन


श्रीराम के जन्म के साथ ही संपूर्ण ब्रह्मांड में सुख का उजियारा छा गया। वे केवल अपनी मनमोहक छवि से ही प्राणियों के दुख नहीं हरते, बल्कि बाल्यकाल से ही उनके अदम्य साहस, अतुलनीय धैर्य और अप्रतिम वीरता के गुण भी प्रकट होने लगे थे। कहते हैं, वे जन्म-मृत्यु के दारुण भय से भी मुक्त कराने वाले, भव-सागर से पार कराने वाले हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


शस्त्र और शास्त्रों के ज्ञान में पारंगत श्रीराम के अद्भुत युद्ध-कौशल की कीर्ति सुनकर महर्षि विश्वामित्र जैसे अस्त्र-शस्त्र में श्रेष्ठ ऋषि भी इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने भयंकर राक्षसों का संहार कर अपनी यज्ञशालाओं को सुरक्षित बनाने के लिए केवल तरुण श्रीराम को ही चुना। श्रीराम पर महर्षि विश्वामित्र का यह विश्वास निराधार नहीं था। ऋषि-मुनियों के लिए यज्ञ करना असंभव बनाने वाली विशालकाय, शक्तिशाली राक्षसी ताड़का का श्रीराम ने अद्भुत शक्ति का प्रदर्शन करते हुए एक ही बाण से वध कर दिया।

यही नहीं, अपने बाण के प्रहार से मायावी मारीच को सात योजन दूर सागर पार पहुंचाया और प्रलयंकारी दैत्य बाहु-सुबाहु को तो मानो बिना प्रयास ही मार गिराया। अद्वितीय शौर्य का प्रदर्शन करते हुए सभी दुष्ट राक्षसों को दंड दिया और ऋषि-मुनियों के यज्ञ का संरक्षण करते हुए जंगल को सुरक्षित बनाया। अतुलनीय शक्ति के स्वामी श्रीराम अप्रतिम योद्धा तो थे ही, साथ ही अपार करुणा के सागर भी थे। उनके पावन चरण के स्पर्श से देवी अहिल्या श्राप मुक्त हुईं और उन्हें फिर से जीवन दान मिला।

राम सामाजिक सौहार्द्र के भी प्रतीक हैं। उन्होंने बिना संकोच शबरी के जूठे बेर खाए। विचारणीय है कि सामान्य जन अपने प्रियजनों का जूठा खाने में भी संकोच करते हैं, वहीं श्रीराम भीलनी वृद्धा शबरी के हाथों से उनके जूठे बेर खाकर अतुलनीय सामाजिक प्रेम का दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं। निषाद-राज केवट को गले लगाने के दृष्टांत भी मानव-समाज के लिए अनुकरणीय है।

चिंतनीय है कि ईश्वर ने मनुष्यों में कोई भेदभाव नहीं किया। ऐसे में मानव ने स्वयं एक-दूसरे के बीच भेदभाव की विभाजन-रेखा क्यों खींच दी? आकर्षक व्यक्तित्व, सामाजिक सौहार्द्र, अपार करुणा के स्वामी, अद्वितीय योद्धा श्रीराम के बाहुबल का उदाहरण सीता स्वयंवर में भी मिलता है, जब उन्होंने भगवान शिव के दुसाध्य, विशाल पिनाक धनुष पर ऐसी प्रत्यंचा चढ़ाई कि वह दो खंडों में विभाजित हो गया! इस दिव्य धनुष की टंकार से पूरा ब्रह्मांड हिल गया, जिससे महान शिव-भक्त, भगवान परशुराम की तपस्या भंग हो गई। उनके प्रचंड क्रोध को भी अपने दिव्य रूप और मधुर शब्दों से शांत करने का सामर्थ्य रखते थे श्रीराम।

यहां विचारणीय है कि मां सीता भी साधारण युवती नहीं थीं। उनके पिता, राजा जनक ने उनके स्वयंवर की शर्त यूं ही नहीं रखी थी कि जो कोई भगवान शिव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उससे ही सीता का विवाह होगा। माना जाता है कि पूरे मिथिला में केवल सीता ही थीं, जो उस दिव्य धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का सामर्थ्य रखती थीं। या संभवतः पूरे ब्रह्मांड में राम से पहले, परशुराम के बाद केवल मां सीता ही उस दिव्य शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा सकी थीं?

जनकनंदिनी, प्रकृति-सदृशा, लक्ष्मी-रूपा सीता के साथ विवाह कर मनुष्य-रूप में पूर्ण हुए श्रीराम। सियावर रामचंद्र के दिव्य रूप को देख-देख कर ही जनकपुरी और अयोध्या के सभी निवासी हर्षित होते रहते हैं। वन गमन के समय श्रीराम चरित्र का एक और रूप सामने आता है। उनके लिए माता-पिता की आज्ञा का पालन ही परम-धर्म है, जिनके आदेश पर बिना एक पल गंवाए, पूरा साम्राज्य त्याग दिया। नव विवाहिता पत्नी और छाया सदृश भाई लक्ष्मण के साथ पिता के वचन का पालन करने के लिए निस्संकोच वनवास की ओर चल दिए।

राम वनवास की यह घटना केवल आज्ञा-पालन और त्याग का उदाहरण ही नहीं प्रस्तुत करती, यहां अयोध्यावासियों के हृदय में उनके लिए असीम प्रेम भी ज्ञात होता है। उनके वन गमन के साथ ही संपूर्ण अयोध्या नगरी शोक के गहरे सागर में डूब गई।

राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू॥
कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हरष बिषाद बिबस सुरलोकू॥
(राम के जाने से समस्त अयोध्यावासी गहरे विषाद में डूब गए। अयोध्या में शोक के बादल छा गए, वहीं लंका में बुरे शकुन होने लगे। देवलोक एक ओर अयोध्या वासियों के दुख से दुखी हो रहा था, वहीं इस बात का हर्ष भी था कि अब श्रीराम लंका पहुंचकर राक्षसों का नाश करेंगे।)

श्रीराम ही नहीं, लक्ष्मण और सीता भी ऐसे आश्चर्यजनक गुणों से युक्त थे, जिन्होंने वनवास के दुष्कर जीवन को भी सहर्ष स्वीकार किया। जो राजमहलों की सुख-सुविधाओं में पले थे, अब वन के कठिन जीवन में, पत्थरों की शैय्या पर भी सोते थे। किसी भी परिस्थिति में हार न मानने की, कर्तव्य-पथ से कभी न डगमगाने की अद्भुत शिक्षा है, श्रीराम का संपूर्ण जीवन चरित।

उन्होंने मानव जीवन के लिए अद्वितीय, अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए। कठिन समय का भी सदुपयोग किया, अपने पल-पल के अनुभव को जीवन का शिक्षक बनाया, जीवन का अनमोल आदर्श स्थापित किया, महर्षि भारद्वाज के सानिध्य में शास्त्र ज्ञान बढ़ाया और महर्षि अगस्त्य से ब्रह्मास्त्र जैसा दिव्य अस्त्र प्राप्त किया। समाज के हर वर्ग को अपना बनाते, सामाजिक समरसता स्थापित करते, भटकों को राह दिखाते, दुष्टों का संहार करते, पग-पग पर चुनौतियों का सामना करते, जंगल में सद्भाव की स्थापना करते, वीरों में वीर, करुणा के सागर जितेंद्रिय, महा-पराक्रमी, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हर युग में अनुकरणीय हैं।

रघुनायक श्रीराम के नाम के जाप से ही मन को शांति और आत्मा को मुक्ति मिलती है। वे साक्षात शक्ति के प्रतीक हैंष वे दृष्टांत हैं मानव के अदम्य साहस और वीरता के। उन्होंने भाई लक्ष्मण के साथ मिलकर भयंकर दंडकारण्य को मायावी राक्षसों से मुक्त किया। विराध और कबंध जैसे दैत्यों का नाश किया। जंगल में भी सुराज की स्थापना की। अहिरावण और कुंभकर्ण जैसे बलवान, मायावी राक्षसों का अंत कर धरती से पाताल तक दुष्टों का संहार किया और न्याय-व्यवस्था का सुशासन स्थापित किया। जिस रावण के आतंक से सारी धरती त्रस्त थी, जिसके अत्याचारों से नर-नारी बेहाल थे, जिसने माता-सीता पर कुदृष्टि डाल नारी-जाति का अपमान किया था, उसका सर्वनाश कर, व्यभिचारियों, अहंकारियों को चेतावनी देने वाले अद्वितीय शौर्य एवं साहस से भरपूर थे श्रीराम।


ऐसी अद्वितीय संगठन-शक्ति कि जंगल में ही सेना का गठन कर रावण के दंभ और दर्प का दमन किया। उसके अहंकार के सभी सिरों को ध्वस्त कर भीषण युद्ध में मायावी राक्षस को परास्त किया। श्रीराम ने सिद्ध किया कि मनुष्य अपने शौर्य और साहस से भयंकर दैत्य का भी सामना कर सकता है। विशालकाय राक्षस को भी पराजित कर सकता है। उनके दिव्य जीवन चरित के स्मरण मात्र से आज भी हर-मन, कण-कण, यह पूरा संसार जगमगा उठता है। अद्भुत शौर्य और धैर्य के, प्रेम और सौहार्द्र के प्रतीक हैं, जन-जन के नायक, आदर्श, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed