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Hindi News ›   Ram Mandir ›   Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Ram temple in Ayodhya is connected with India's identity

Ayodhya Ram Mandir: अयोध्या में राम मंदिर भारत की अस्मिता से जुड़ा है

Mon, 08 Jan 2024 10:40 AM IST
अमर शर्मा डॉ. प्रवेश कुमार
डॉ. प्रवेश कुमार Published by: अमर शर्मा Updated Mon, 08 Jan 2024 10:40 AM IST
सार

जिस हिंदू समाज ने केरल में खुद इस्लामिक व्यापारियों को उनकी पूजा के लिए जमीनें दान कर दीं, मस्जिद का निर्माण करा दिया, उसी हिंदू समाज को एक मंदिर के टूटने पर इतना कैसे आंदोलित होना पड़ा कि राम मंदिर के निर्माण के लिए चार लाख से ज्यादा हिंदुओं को बलिदान देना पड़ा? यह सोचने की बात है और हमें समझ लेना होगा कि संघर्ष केवल मंदिर निर्माण का प्रश्न नहीं है, बल्कि भारत की अस्मिता के साथ जुड़ा हुआ है।  

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Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Ram temple in Ayodhya is connected with India's identity
Ramlala - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

- डॉ. प्रवेश कुमार
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अयोध्या में राम लला के मंदिर के लिए देश भर में विश्व का सबसे बड़ा निधि समर्पण अभियान चलाया गया। इसने देश में उस जन अभियान का स्मरण कराया, जब विश्व हिंदू परिषद के एक आवाहन पर देश भर से 2.75 लाख गांवों से राम मंदिर निर्माण हेतु शिलाएं अयोध्या पहुंचने लगीं। इतना बड़ा जनजागरण अभियान इससे पहले भारत और विश्व के किसी अन्य देश में नहीं चला होगा।

राम के प्रति देश का मानस क्या सोचता है, यह इसी से ज्ञात होता है कि उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम संपूर्ण भारत और दुनिया के अन्य देशों में प्रभु राम के चरित्र का मंचन होता है। यह केवल राम के व्यक्तित्व का ही मंचन नहीं है, बल्कि भारत के समाज जीवन के आदर्श का भी चित्रण है। दुनिया में राम मंदिर जन्मभूमि आंदोलन सबसे अधिक समय तक चलने वाला आंदोलन है। श्री राम जन्मभूमि के लिए 76 बार संघर्ष हुआ, जिसमें चार लाख से ज़्यादा हिंदुओं ने बलिदान दिया। इसीलिए अयोध्या में राम मंदिर मात्र मंदिर निर्माण नहीं, अपितु भारत की उस विस्मृत ज्ञान परंपरा, त्याग, सत्य, करुणा, समता, सामाजिक समरसता, इन सभी तत्वों को समाज से परिचित कराना है।
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विदेशी अक्रांताओं ने हमारे धर्म और संस्कृति को नष्ट करना चाहा, वहीं हमसे बहुत कुछ छीनने का प्रयास किया। लेकिन राम, कृष्ण ही थे, हमारी अध्यात्म शक्ति, हिंदुत्व चिंतन धारा ही थी, जिसने हमें आपस में जोड़े रखा। राम मनोहर लोहिया कहते हैं कि त्रेता के राम हिंदुस्तान की उत्तर-दक्षिण एकता के देव हैं, वहीं द्वापर के कृष्ण देश के पूर्व-पश्चिम एकता के देव हैं। इसी अध्यात्म एकत्व भाव के आधार पर आंबेडकर ने भारत को आध्यात्मिक रूप से एक राष्ट्र माना। कोई भी राष्ट्र अपने पुरातन इतिहास से जुड़ कर प्रेरणा लेता है और इसी इतिहास में संस्कृति के तत्व भी निहित होते हैं। ये सांस्कृतिक तत्व ही राष्ट्र की पहचान भी बनते हैं। 
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विदेशी अक्रांताओं ने जहां देश की धन-संपदा लूटी, वहीं हमारी आस्था के केंद्रों को भी नष्ट किया। आस्था के केंद्र ये मंदिर, ये राम, कृष्ण, ये शिव की मूर्तियां किसी के लिए मात्र माटी-पत्थर की बनी कुछ आकृतियां हो सकती हैं, लेकिन कंकर में भी शंकर को देखने की वृति भी हमारी संस्कृति की ही रही है। अगर हम दुनिया के इतिहास पर थोड़ी नजर डालें, तो स्पष्ट दिख जाएगा कि जहां भी अक्रांता गए, वहां उन्होंने प्रशासनिक अधीनता ही नहीं की, बल्कि उन राष्ट्रों की संस्कृति पर ही सबसे पहले आक्रमण किया।

भारत में भी वही कुछ हुआ। अयोध्या में प्रभु राम के जन्म स्थान पर बने मंदिर को नष्ट कर वहां मस्जिद जबरन बना दी गई। लेकिन क्या हिंदू समाज ने इस जबरन सांस्कृतिक अपहरण को स्वीकार कर लिया? ऐसा नहीं हुआ, बल्कि इस सांस्कृतिक अतिक्रमण के विरुद्ध वर्षों तक संघर्ष और बलिदान किया। जिस हिंदू समाज ने केरल में खुद इस्लामिक व्यापारियों को उनकी पूजा के लिए जमीनें दान कर दीं, मस्जिद का निर्माण करा दिया, उसी हिंदू समाज को एक मंदिर के टूटने पर इतना कैसे आंदोलित होना पड़ा कि राम मंदिर के निर्माण के लिए चार लाख से ज्यादा हिंदुओं को बलिदान देना पड़ा? यह सोचने की बात है और हमें समझ लेना होगा कि संघर्ष केवल मंदिर निर्माण का प्रश्न नहीं है, बल्कि भारत की अस्मिता के साथ जुड़ा हुआ है। राम मंदिर हमारे प्रभु राम के जन्म स्थान से जुडा है। राम अपने जीवन के एक-एक कार्य से समाज में आदर्श स्थापित करते हैं। दुनिया में भारत की पहचान करने के लिए यदि कोई ऐतिहासिक पहचान तलाशी जाए और वह इतनी सरल हो, जिसके नाम मात्र के स्मरण से व्यक्ति को हिंदुस्तान समझ में आ जाए, वो पहचान ही हैं प्रभु राम। 

राम का स्मरण होते ही उनके उस काल का स्मरण हो जाता है, जब राजा और प्रजा में कोई भेद नहीं था। निषाद और राम साथ-साथ गुरुकुल में पढ़ रहे हैं, सामाजिक अस्पृश्यता का कही नाम भी नहीं है। राजा धर्म का पालन करता है। उसका अपना सुख जन सुख में ही निहित है। राम ने पूरे जीवन में अपना आचरण इसी बिंदु पर केंद्रित रखा कि समाज समरस भाव से चले। राम वनवासी हो गए। माता सीता को रावण उठा ले जाता है। सीता को जबरन ले जाना स्त्री अस्मिता, सम्मान के साथ जुड़ा है। आहिल्या के साथ किए व्यवहार की आलोचना राम जी ने की। उन्होंने समाज में यह आदर्श स्थापित किया कि स्त्री का सम्मान समाज में सर्वोच्च स्थान रखता है। 

आप देखिए राम किस प्रकार सीता जी के सम्मान के लिए इतना बड़ा युद्ध करते हैं। अपने वन गमन में केवट के साथ उनका संवाद और शबरी के झूठे बेर खाना, ये सब राम को जनप्रिय बनाते हैं। लंका विजय के लिए राम राजाओं की सेना नहीं बुलाते, बल्कि समाज के भीतर से ही लोगों को तैयार करते हैं। जंगलों में रहने वालों को संगठित करते हैं, उनको संदेश देते हैं, उनको साथ लेकर लंका विजय करते हैं। जिन गिरिजनों, दमितों को आज निम्न माना जाता है, राम ने उन्हीं को संगठित किया, उनको साथ लिया और रावण जैसे पराक्रमी को हराया।


राम ने संदेश दिया कि संपूर्ण समाज के साथ चलने से ही किसी ध्येय को प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण था कि राम मंदिर के निर्माण की पहला शिला पूजन उसी समाज के व्यक्ति कामेश्वर चौपाल से कराया गया, जिसे आज हम अस्पृश्य मानते हैं। राम मंदिर निर्माण का अभियान समाज जन-जागरण का अभियान है, इसलिए मंदिर निर्माण में समाज का ही आर्थिक सहयोग लिया गया।
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