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Ayodhya Ram Mandir: छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में रची-बसी है राम कथा की सुवास
Sat, 20 Jan 2024 11:33 PM IST
अमर शर्मा
डॉ. पीसी लाल यादव
डॉ. पीसी लाल यादव
Published by: अमर शर्मा
Updated Sat, 20 Jan 2024 11:33 PM IST
सार
छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक रामायण मंडलियां हैं, जो छत्तीसगढ़ी गीतों व भजनों के साथ श्री रामचरित मानस का गान करती हैं। इसलिए छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में भी रामकथा की परिव्याप्ति है। छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की गीत विधा सोहर जन्म संस्कार गीत, विवाह संस्कार गीत, सुवा गीत, नाचा गीत, लोक भजनों में इसका पूरा प्रभाव दिखाई पड़ता है।
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Ramlala
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
- डॉ. पीसी लाल यादव
छत्तीसगढ़ की धरती वन और खनिज संपदाओं से जितनी परिपूर्ण है, उससे कहीं अधिक यह लोक साहित्य, लोक कला व लोक संस्कृति से परिपूर्ण है। वहां का लोकजीवन सीधा-सादा व सरल है। वहां के लोगों में राम के प्रति बड़ी आस्था है। सरगुजा राम की कर्मभूमि रही है। सरगुजिहा लोकगीतों में इसका उल्लेख मिलता है-
चउदस बछर विपत्ति ला बितावें
रामगढ़ पर्वत में घर ला बनावें
बनवासे अरण बनै राम चले।
एक अन्य लोकगीत में सीताहरण का उल्लेख इस प्रकार हुआ है-
कहां के मिरगा कहां चले आए
सीता ला रावन हरि लैल।
लंका के मिरगा रामगढ़ चलि आए
सीता ला रावन हरि लैल।
पिरभु मोर मिरगा के चरम लानि देते
सीता ला रावन हरि लैल
हाथे धनुष बान पिरभु, मिरगा मार गए
धाय मिरगा ओइल्हें चले
धाय मिरगा पइल्हे चले
मिरगा धाय रइले लुकाई
सीता ला रावन हरि लैल
(कहां का मृग कहां चला आया? सीता को रावण हर कर ले गया। लंका का मृग रामगढ़ चला आया। सीता ने प्रभु से मृग का चमड़ा लाने का निवेदन किया। हाथ में धनुष बाण लेकर प्रभु मृग की ओर दौड़े। मृग भागकर छिप गया फिर प्रकट हुआ । इस तरह सीता को हर कर रावण ले गया।)
छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक रामायण मंडलियां हैं, जो छत्तीसगढ़ी गीतों व भजनों के साथ श्री रामचरित मानस का गान करती हैं। इसलिए छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में भी रामकथा की परिव्याप्ति है। छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की गीत विधा सोहर जन्म संस्कार गीत, विवाह संस्कार गीत, सुवा गीत, नाचा गीत, लोक भजनों में इसका पूरा प्रभाव दिखाई पड़ता है।
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छत्तीसगढ़ में आज भी नवजात शिशु के जन्म पर मनाए जाने वाले छठी कार्यक्रम में सोहर गीतों के माध्यम से गरीब घर जन्म लेने वाला बालक भी श्रीराम की संज्ञा पाता है, और माता-पिता को कौशल्या व दशरथ कहकर मान दिया जाता है। लोक बड़ा उदार होता है। इसलिए गरीब की झोपड़ी भी राजमहल कहलाती है।
छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में संतानोत्पत्ति के अवसर पर सोहर गीत गाने की परंपरा है। रामायण मंडली द्वारा श्रीराम चरित मानस के राम जन्म प्रसंग का सस्वर पाठ किया जाता है। महिलाओं के द्वारा सोहर गीत गाए जाते हैं। उछाह- मंगल मनाया जाता है-
कोन घड़ी भए सिरी राम, कोन घड़ी लछमन हो
ललना कोन घड़ी भरत भुवाल हो, सोहर पद गावंव हो
सुभ घड़ी भए सिरी राम, सुभ घड़ी लक्षमन हो
ललना सुभ घड़ी भरत भुवाल, सोहर पद गावँव हो
काखर भए सिरी राम, काखर भए लक्षमन हो
ललना काखर भरत भुवाल, सोहर पद गावंव हो
कौशल्या के भए सिरी राम, सुमित्रा के भए लक्ष्मन हो
ललना केकई भरत भुवाल, सोहर पद गावंव हो।
(शुभ घड़ी में श्रीराम पैदा हुए। शुभ घड़ी में लक्ष्मण जी और शुभ घड़ी में ही भरत भुवाल पैदा हुए। किस से श्रीराम ने जन्म लिया, किस से लक्ष्मण पैदा हुए और किस से भरत भुवाल पैदा हुए? कौशल्या से श्रीराम ने जन्म लिया। सुमित्रा से लक्ष्मण पैदा हुए और कैकयी से भरत भुवाल पैदा हुए)।
वन में राक्षस, मुनियों के यज्ञ-पूजा आदि में विघ्न डालते हैं। अतः यज्ञ की रक्षा के लिए विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को राजा दशरथ से अनुनय पूर्वक मांगते हैं। गुरु वशिष्ठ की सलाह पर श्रीराम और लक्ष्मण वन को जाते हैं। यज्ञ की रक्षा कर राक्षसों को मारते हैं। जनकपुर जाते समय पाषण हुई अहिल्या का उद्धार करते हैं। जनक श्रीराम और लक्ष्मण के रूप सौंदर्य पर मोहित होकर उनका परिचय पूछते हैं। यह प्रसंग नाचा गीत से इस तरह उद्धृत हुआ है-
मुनि संगे में बालक दूनों कहां के दाई ओ
मुनि संगे में बालक दूनों कहां के?
रतनारे नैना बांके दाई ओ
मुनि संगे में बालक दूनों कहां के?
राजा बोले सुनो मुनि जी, ये दोनों बालक कहां के ?
कोन नगर में जनम लिए हें, का हे नाम पिता के?
रतनारे नैना बांके दाई ओ
मुनि बोले सुनो राजा जी, ये दोनो बालक अवध के
राम - लखन नाम है इनके, दसरथ नाम पिता के।
रतनारे नैना बांके दाई ओ।
(मुनि के साथ जो दो बालक हैं, वे कहां के हैं ? जिनकी आंखों में लाली है, जिनकी छवि निराली है, वे कौन हैं? राजा जनक विश्वामित्र जी से पूछते हैं- ये दोनो बालक कहां के हैं? ये किस नगर के हैं और इनके पिता का नाम क्या है? ये दोनों बालक बड़े सुंदर हैं। मुनि विश्वामित्र राजा जनक को बताते हैं- ये दोनों बालक अयोध्या नगर के हैं। इनके नाम राम और लक्ष्मण हैं। इनके पिता का नाम दशरथ है।)
छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में विवाह गीत प्रमुख गीत है। लोक जीवन में विवाह गीतों की बहुलता है। जिनमें श्रीराम-सीता के विवाह का प्रसंग सन्निहित है-
कइसे के चिन्हंव मैं सिया जनुकिया
कइसे के चिन्हंव राजा रामे हो
कइसे के चिन्हंव राजा रामे हो
सोन रंग साड़ी, सिया जनुकिया
के मटुक चढ़े राजा रामे हो
के मटुक चढ़े राजा रामे हो
कइसे चिन्हंव तुलसी के बिरवा
के कइसे चिन्हंव आमा डारे हो
के कइसे चिन्हंव आमा डारे हो
अंगना मा चिन्हंव तुलसी के बिरवा
के मऊरत चिन्हंव आमा डारे हो
के मऊरत चिन्हंव आमा डारे हो।
(मैं जनक नंदनी सीता जी की पहचान कैसे करूं? सीता जी सोने के रंग की साड़ी पहने हैं और श्रीरामचंद्र जी ने माथे पर मुकुट पहना है। यही उनकी पहचान है। तुलसी के पौधे को मैं कैसे पहचानूं और आम की डाली को कैसे पहचानूं? आंगन के चबूतरे पर तुलसी का पौधा सुशोभित रहता है। आम की डाली की पहचान उसका बौर है।)
श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी। इसी बीच दासी मंथरा के उकसाने पर कैकेयी राजा दशरथ से दो वरदान मांगती हैं। भरत को राजगद्दी और श्रीराम को तापसी वेश में 14 वर्ष का वनवास। फलतः श्रीराम , लक्ष्मण व सीता वन को जाते हैं। श्रीराम के वियोग में दशरथ का प्राणांत हो जाता है-
मोर राम लखन ला, मोर राम लखन ला
काबर दिए बनवास, हो माता केकई
आगु-आगु राम चलत हे, पाछू में लक्ष्मण भाई
मांझ मंझोलन सिया जानकी, चित्रकोट बर जाई
चित्रकोट बरजाई, सुनो ग मोर भाई
मोर राम लखन ल
रिमझिम - रिमझिम महुला बरसे, पवन चले पुरवाही
कोन बिरिज में ठाढ़े होही, राम लखन दूनों भाई
राम लखन दूनों भाई, संग में सीता माई
तुलसीदास सिया रघुबर के, हरिचरन चितलाई
तोर चरन में ध्यान बसत हे, छोड़ चरन कहां जाई
छोड़ चरन कहां जाई, सुनो ग मोर भाई।
(मेरे राम और लक्ष्मण को तुमने वनवास क्यों दिया? माता कैकेयी तुम कितनी निष्ठुर हो। आगे- आगे राम चल रहे हैं, पीछे-पीछे लक्ष्मण जी और बीच मे सीता जी चल रही हैं। ये चित्रकोट की ओर जा रहे हैं। रिमझिम-रिमझिम वर्षा हो रही है। ठंडी पुरवाई चल रही है। पता नहीं ऐसे में राम और लक्ष्मण किस जगह ठहरे होंगे?)
राम-केवट संवाद कुछ इस तरह होता है-
नई उतारवं गंगा पार प्रभु जी, जब तक ना लेहूं पांव पखार
जानत हंव तोर चरन के मरम, जानत हंव तोर बेवहार।
नई उतारवं गंगा पार प्रभु जी, जब तक ना लेहूं पांव पखार
तोर चरन के धुर्रा म प्रभु जी, कइथें जादू हे बड़ भारी
पखरा म पांव परत , पखरा होगे सुंदर नारी
पखरा जब नारी होगे तब , कठवा के कोन चिन्हार ?
नई उतारवं गंगा पार प्रभु जी, जब तक ना लेहूं पांव पखार
मोर डोंगा कहूं साधु जोगी के, माई लोगिन बन जाही
तब तो मोर घर - परिवार, बिन मारे के मर जाही।
गारी बखाना दे दे के, पार ही लइका लोग गोहार।
नई उतारवं गंगा पार प्रभु जी, जब तक ना लेहूं पांव पखार
धन - धन जिंनगी तोर केवट, तैं राम के दरसन पाए
रिसी-मुनि देवी - देवता, भाग तोर संहिराए।
भवसागर के तारन हार ला , आज लगा देस पार
मैं उतारवं गंगा पार प्रभु जी, डोंगा में चघाके मैं उतारवं।
(केवट कहता है -“मैं जब तक आपके पांव नही पखार लूंगा, तब तक गंगा पार नही उतारूंगा। क्योंकि मैं आपके चरणों की महिमा और आपके व्यवहार को जानता हूं। लोग कहते हैं कि प्रभु जी आपके चरणों की धूल में बड़ा जादू है। पत्थर पर आपके चरण पड़ते ही वह पत्थर नारी बन गया। जब पत्थर नारी हो गया, तब तो मेरी नाव लकड़ी की है, इसकी क्या बिसात? मैं बिना पांव धोए आपको गंगा पार नही करूंगा। मेरी नाव यदि किसी साधु - योगी की पत्नी बन जाएगी, तब तो मेरा घर - परिवार बिना मारे मर जाएगा। मेरे घर वाले मुझे कोसेंगे। मेरे बाल-बच्चे भूखों मर जाएंगे। नहीं! मैं बिना पैर धोए आपको गंगा पार नही करूंगा।केवट तुम्हारा जीवन धन्य है। जो सारी दुनिया के खेवनहार हैं, उन्हें तुमने गंगा पार लगाया।“)
रावण-मारीच संवाद छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में कुछ इस तरह होता है-
तोर हाथ में मर के रावन का पाहूं रे?
ओखर हाथ मे मर के मैं तर जाहूं रे।
(मारीच रावण से कहता है कि रावण तेरे हाथ से मर कर मुझे कुछ नही मिलेगा, जब मरना ही
है, तो अच्छा होगा कि मैं प्रभु श्रीराम के हाथों मरूं। उनके हाथों मरने से मुझे मुक्ति मिल जाएगी।)
सुवा गीत छत्तीसगढ़ की लोकप्रिय गीत - नृत्य विधा है। सीता हरण पर यह नारी मन की सहज अभिव्यक्ति है-
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
मोर सीता ल लेगत हे लंका के रावन ओ
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
जोगी के रूप धरे निसाचर, दे भिक्षा मोही माई
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
लेकर भिक्षा आंगन बीच ठाढ़े, रथ में लिए बैठाई
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
काखर हो तुम धिया-पतोहिया, काखर हो भौजाई
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
काखर हो तुम प्रेम-सुंदरी , कौन हरे ले जाई?
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
दसरथ के तुम धिया-पतोहिया, लछमन के भौजाई
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
रामचंद्र के प्रेम-सुंदरी, रावन हर ले जाई
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
( मैं क्या जानूं, मैं क्या करूं? मेरा राम नहीं है। सीता को रावण हर कर ले जा रहा है। राक्षस रावण जोगी (साधु) का रूप धारण कर आया और कहा- “मुझे भिक्षा दो।“ जब सीता आंगन में भिक्षा लेकर आईं, तो रावण ने उन्हें रथ पर बैठा लिया। तुम किसकी बहू हो? किसकी भौजाई हो? किसकी प्रेम सुंदरी हो और कौन हर कर ले जा रहा है? राजा दशरथ की तुम बहू हो, लक्ष्मण की तुम भौजाई हो, तुम रामचंद्र की प्रेम सुंदरी हो और तुम्हे रावण हर कर ले जा रहा है।)
सीता हरण के बाद राम कुछ इस तरह से विलाप करते हैं-
हर ले गय, हर ले गय, हर ले गय रे
लंका के राजा रावन, जोगी के रूप धरके
सिया ल हर ले गय न।
जंगल-जंगल, पतबत-परबत, राम बइहा बन गिंजरय
आँसू पोंछइया के आंखी ले, झर-झर आंसू झरय
सिया ल हर ले गय न।
चिरई-चिरगुन, फांफा-मिरगा, रूखराई ल पूछय
सिया बिना राम के हिरदे, आगी-अंगरा कस धधके
सिया ल हर ले गय न।
मनि बिन मनिहार सांप, बिन पानी जस मछरी
जानकी बिना राम होगे, बिन पानी के बदरी
सिया ल हर ले गय न।
(लंका का राजा रावण साधु का रूप धारण कर सीता को हर ले गया। जंगल-जंगल, पर्वत-पर्वत, राम पागल की भांति भटक रहे हैं। दूसरों के आंसू पौंछने वाले श्रीराम की आंखों से झर-झर आंसू झर रहे हैं। ये कैसी विडंबना है। राम पशु-पक्षियों से, वृक्षों-लताओं से पूछते हैं कि उनकी सीता कहां है? सीता के वियोग में राम का हृदय अंगारे की तरह दहक रहा है। जैसे मणि के बिना मनिहार सर्प और पानी के बिना मछली जीवित नहीं रह सकते, ठीक उसी तरह राम की स्थिति है। जैसे बिना पानी का बादल हो।)
शबरी प्रसंग लोकगीतों में इस तरह आता है-
सबरी ओ दाई, हाय - हाय सबरी ओ दाई
जूठा-जूठा बोंइर ला खवाये प्रभु राम ल
जूठा-जूठा बोंइर ला खवाये प्रभु राम ल
खदर काड़ी के कुरिया बनाए, डारा-पतेरा छवाये
ओ दाई डारा-पतेरा छवाये
भाव-भक्ति म मगन हो के, तोर घर राम आये
ओ दाई तोर घर राम आये
सबरी ओ दाई, हाय - हाय सबरी ओ दाई
राम भजन में मन लगा के , बन मा जिनगी पहाये
ओ दाई बन मे जिनगी पहाये
देवता-धामी , सुर-नर-ज्ञानी, तोर महिमा ल गाये
ओ दाई तोर महिमा ल गाए।
सबरी ओ दाई, हाय - हाय सबरी ओ दाई
(शबरी माता तुम धन्य हो। तुमने भगवान राम को जूठे बेरों को खिलाया और उनकी कृपा प्राप्त कर ली। घास-फूस की तुम्हारी कुटिया बनी है। जिसमें सूखे पत्तों का छप्पर है। भक्ति-भाव में तुम लीन रहीं। आज तुम्हारी कुटिया में स्वयं श्रीराम आए हैं। राम के भजन में ध्यान लगाकर तुमने सारा जीवन व्यतीत किया है। देवी-देवता, ज्ञानी-ध्यानी व मनुष्य सब तुम्हारी महिमा का बखान कर रहे हैं। सचमुच तुम धन्य हो।)
छत्तीसगढ़ी लोक जीवन में राम कथा का बड़ा व्यापक प्रभाव है। श्रीराम कथा लोकजीवन का आधार है। यह लोक मानस का श्रृंगार है। इसलिए छत्तीसगढ़ के लोगों का जीवन राम के आदर्शो से सराबोर है। यहां का रहन-सहन, सुख-दुख, क्रिया-व्यापार, सभी कुछ लोक गीतों के माध्यम से मुखरित हुआ है। अतः छत्तीसगढ़ी लोक जीवन में ऋषि संस्कृति और कृषि संस्कृति का पूर्ण प्रभाव परिलक्षित होता है। यही छत्तीसगढ़ी लाकजीवन की विशिष्टता है।
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छत्तीसगढ़ की धरती वन और खनिज संपदाओं से जितनी परिपूर्ण है, उससे कहीं अधिक यह लोक साहित्य, लोक कला व लोक संस्कृति से परिपूर्ण है। वहां का लोकजीवन सीधा-सादा व सरल है। वहां के लोगों में राम के प्रति बड़ी आस्था है। सरगुजा राम की कर्मभूमि रही है। सरगुजिहा लोकगीतों में इसका उल्लेख मिलता है-
चउदस बछर विपत्ति ला बितावें
रामगढ़ पर्वत में घर ला बनावें
बनवासे अरण बनै राम चले।
एक अन्य लोकगीत में सीताहरण का उल्लेख इस प्रकार हुआ है-
कहां के मिरगा कहां चले आए
सीता ला रावन हरि लैल।
लंका के मिरगा रामगढ़ चलि आए
सीता ला रावन हरि लैल।
पिरभु मोर मिरगा के चरम लानि देते
सीता ला रावन हरि लैल
हाथे धनुष बान पिरभु, मिरगा मार गए
धाय मिरगा ओइल्हें चले
धाय मिरगा पइल्हे चले
मिरगा धाय रइले लुकाई
सीता ला रावन हरि लैल
(कहां का मृग कहां चला आया? सीता को रावण हर कर ले गया। लंका का मृग रामगढ़ चला आया। सीता ने प्रभु से मृग का चमड़ा लाने का निवेदन किया। हाथ में धनुष बाण लेकर प्रभु मृग की ओर दौड़े। मृग भागकर छिप गया फिर प्रकट हुआ । इस तरह सीता को हर कर रावण ले गया।)
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छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक रामायण मंडलियां हैं, जो छत्तीसगढ़ी गीतों व भजनों के साथ श्री रामचरित मानस का गान करती हैं। इसलिए छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में भी रामकथा की परिव्याप्ति है। छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की गीत विधा सोहर जन्म संस्कार गीत, विवाह संस्कार गीत, सुवा गीत, नाचा गीत, लोक भजनों में इसका पूरा प्रभाव दिखाई पड़ता है।
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छत्तीसगढ़ में आज भी नवजात शिशु के जन्म पर मनाए जाने वाले छठी कार्यक्रम में सोहर गीतों के माध्यम से गरीब घर जन्म लेने वाला बालक भी श्रीराम की संज्ञा पाता है, और माता-पिता को कौशल्या व दशरथ कहकर मान दिया जाता है। लोक बड़ा उदार होता है। इसलिए गरीब की झोपड़ी भी राजमहल कहलाती है।
छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में संतानोत्पत्ति के अवसर पर सोहर गीत गाने की परंपरा है। रामायण मंडली द्वारा श्रीराम चरित मानस के राम जन्म प्रसंग का सस्वर पाठ किया जाता है। महिलाओं के द्वारा सोहर गीत गाए जाते हैं। उछाह- मंगल मनाया जाता है-
कोन घड़ी भए सिरी राम, कोन घड़ी लछमन हो
ललना कोन घड़ी भरत भुवाल हो, सोहर पद गावंव हो
सुभ घड़ी भए सिरी राम, सुभ घड़ी लक्षमन हो
ललना सुभ घड़ी भरत भुवाल, सोहर पद गावँव हो
काखर भए सिरी राम, काखर भए लक्षमन हो
ललना काखर भरत भुवाल, सोहर पद गावंव हो
कौशल्या के भए सिरी राम, सुमित्रा के भए लक्ष्मन हो
ललना केकई भरत भुवाल, सोहर पद गावंव हो।
(शुभ घड़ी में श्रीराम पैदा हुए। शुभ घड़ी में लक्ष्मण जी और शुभ घड़ी में ही भरत भुवाल पैदा हुए। किस से श्रीराम ने जन्म लिया, किस से लक्ष्मण पैदा हुए और किस से भरत भुवाल पैदा हुए? कौशल्या से श्रीराम ने जन्म लिया। सुमित्रा से लक्ष्मण पैदा हुए और कैकयी से भरत भुवाल पैदा हुए)।
वन में राक्षस, मुनियों के यज्ञ-पूजा आदि में विघ्न डालते हैं। अतः यज्ञ की रक्षा के लिए विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को राजा दशरथ से अनुनय पूर्वक मांगते हैं। गुरु वशिष्ठ की सलाह पर श्रीराम और लक्ष्मण वन को जाते हैं। यज्ञ की रक्षा कर राक्षसों को मारते हैं। जनकपुर जाते समय पाषण हुई अहिल्या का उद्धार करते हैं। जनक श्रीराम और लक्ष्मण के रूप सौंदर्य पर मोहित होकर उनका परिचय पूछते हैं। यह प्रसंग नाचा गीत से इस तरह उद्धृत हुआ है-
मुनि संगे में बालक दूनों कहां के दाई ओ
मुनि संगे में बालक दूनों कहां के?
रतनारे नैना बांके दाई ओ
मुनि संगे में बालक दूनों कहां के?
राजा बोले सुनो मुनि जी, ये दोनों बालक कहां के ?
कोन नगर में जनम लिए हें, का हे नाम पिता के?
रतनारे नैना बांके दाई ओ
मुनि बोले सुनो राजा जी, ये दोनो बालक अवध के
राम - लखन नाम है इनके, दसरथ नाम पिता के।
रतनारे नैना बांके दाई ओ।
(मुनि के साथ जो दो बालक हैं, वे कहां के हैं ? जिनकी आंखों में लाली है, जिनकी छवि निराली है, वे कौन हैं? राजा जनक विश्वामित्र जी से पूछते हैं- ये दोनो बालक कहां के हैं? ये किस नगर के हैं और इनके पिता का नाम क्या है? ये दोनों बालक बड़े सुंदर हैं। मुनि विश्वामित्र राजा जनक को बताते हैं- ये दोनों बालक अयोध्या नगर के हैं। इनके नाम राम और लक्ष्मण हैं। इनके पिता का नाम दशरथ है।)
छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में विवाह गीत प्रमुख गीत है। लोक जीवन में विवाह गीतों की बहुलता है। जिनमें श्रीराम-सीता के विवाह का प्रसंग सन्निहित है-
कइसे के चिन्हंव मैं सिया जनुकिया
कइसे के चिन्हंव राजा रामे हो
कइसे के चिन्हंव राजा रामे हो
सोन रंग साड़ी, सिया जनुकिया
के मटुक चढ़े राजा रामे हो
के मटुक चढ़े राजा रामे हो
कइसे चिन्हंव तुलसी के बिरवा
के कइसे चिन्हंव आमा डारे हो
के कइसे चिन्हंव आमा डारे हो
अंगना मा चिन्हंव तुलसी के बिरवा
के मऊरत चिन्हंव आमा डारे हो
के मऊरत चिन्हंव आमा डारे हो।
(मैं जनक नंदनी सीता जी की पहचान कैसे करूं? सीता जी सोने के रंग की साड़ी पहने हैं और श्रीरामचंद्र जी ने माथे पर मुकुट पहना है। यही उनकी पहचान है। तुलसी के पौधे को मैं कैसे पहचानूं और आम की डाली को कैसे पहचानूं? आंगन के चबूतरे पर तुलसी का पौधा सुशोभित रहता है। आम की डाली की पहचान उसका बौर है।)
श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी। इसी बीच दासी मंथरा के उकसाने पर कैकेयी राजा दशरथ से दो वरदान मांगती हैं। भरत को राजगद्दी और श्रीराम को तापसी वेश में 14 वर्ष का वनवास। फलतः श्रीराम , लक्ष्मण व सीता वन को जाते हैं। श्रीराम के वियोग में दशरथ का प्राणांत हो जाता है-
मोर राम लखन ला, मोर राम लखन ला
काबर दिए बनवास, हो माता केकई
आगु-आगु राम चलत हे, पाछू में लक्ष्मण भाई
मांझ मंझोलन सिया जानकी, चित्रकोट बर जाई
चित्रकोट बरजाई, सुनो ग मोर भाई
मोर राम लखन ल
रिमझिम - रिमझिम महुला बरसे, पवन चले पुरवाही
कोन बिरिज में ठाढ़े होही, राम लखन दूनों भाई
राम लखन दूनों भाई, संग में सीता माई
तुलसीदास सिया रघुबर के, हरिचरन चितलाई
तोर चरन में ध्यान बसत हे, छोड़ चरन कहां जाई
छोड़ चरन कहां जाई, सुनो ग मोर भाई।
(मेरे राम और लक्ष्मण को तुमने वनवास क्यों दिया? माता कैकेयी तुम कितनी निष्ठुर हो। आगे- आगे राम चल रहे हैं, पीछे-पीछे लक्ष्मण जी और बीच मे सीता जी चल रही हैं। ये चित्रकोट की ओर जा रहे हैं। रिमझिम-रिमझिम वर्षा हो रही है। ठंडी पुरवाई चल रही है। पता नहीं ऐसे में राम और लक्ष्मण किस जगह ठहरे होंगे?)
राम-केवट संवाद कुछ इस तरह होता है-
नई उतारवं गंगा पार प्रभु जी, जब तक ना लेहूं पांव पखार
जानत हंव तोर चरन के मरम, जानत हंव तोर बेवहार।
नई उतारवं गंगा पार प्रभु जी, जब तक ना लेहूं पांव पखार
तोर चरन के धुर्रा म प्रभु जी, कइथें जादू हे बड़ भारी
पखरा म पांव परत , पखरा होगे सुंदर नारी
पखरा जब नारी होगे तब , कठवा के कोन चिन्हार ?
नई उतारवं गंगा पार प्रभु जी, जब तक ना लेहूं पांव पखार
मोर डोंगा कहूं साधु जोगी के, माई लोगिन बन जाही
तब तो मोर घर - परिवार, बिन मारे के मर जाही।
गारी बखाना दे दे के, पार ही लइका लोग गोहार।
नई उतारवं गंगा पार प्रभु जी, जब तक ना लेहूं पांव पखार
धन - धन जिंनगी तोर केवट, तैं राम के दरसन पाए
रिसी-मुनि देवी - देवता, भाग तोर संहिराए।
भवसागर के तारन हार ला , आज लगा देस पार
मैं उतारवं गंगा पार प्रभु जी, डोंगा में चघाके मैं उतारवं।
(केवट कहता है -“मैं जब तक आपके पांव नही पखार लूंगा, तब तक गंगा पार नही उतारूंगा। क्योंकि मैं आपके चरणों की महिमा और आपके व्यवहार को जानता हूं। लोग कहते हैं कि प्रभु जी आपके चरणों की धूल में बड़ा जादू है। पत्थर पर आपके चरण पड़ते ही वह पत्थर नारी बन गया। जब पत्थर नारी हो गया, तब तो मेरी नाव लकड़ी की है, इसकी क्या बिसात? मैं बिना पांव धोए आपको गंगा पार नही करूंगा। मेरी नाव यदि किसी साधु - योगी की पत्नी बन जाएगी, तब तो मेरा घर - परिवार बिना मारे मर जाएगा। मेरे घर वाले मुझे कोसेंगे। मेरे बाल-बच्चे भूखों मर जाएंगे। नहीं! मैं बिना पैर धोए आपको गंगा पार नही करूंगा।केवट तुम्हारा जीवन धन्य है। जो सारी दुनिया के खेवनहार हैं, उन्हें तुमने गंगा पार लगाया।“)
रावण-मारीच संवाद छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में कुछ इस तरह होता है-
तोर हाथ में मर के रावन का पाहूं रे?
ओखर हाथ मे मर के मैं तर जाहूं रे।
(मारीच रावण से कहता है कि रावण तेरे हाथ से मर कर मुझे कुछ नही मिलेगा, जब मरना ही
है, तो अच्छा होगा कि मैं प्रभु श्रीराम के हाथों मरूं। उनके हाथों मरने से मुझे मुक्ति मिल जाएगी।)
सुवा गीत छत्तीसगढ़ की लोकप्रिय गीत - नृत्य विधा है। सीता हरण पर यह नारी मन की सहज अभिव्यक्ति है-
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
मोर सीता ल लेगत हे लंका के रावन ओ
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
जोगी के रूप धरे निसाचर, दे भिक्षा मोही माई
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
लेकर भिक्षा आंगन बीच ठाढ़े, रथ में लिए बैठाई
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
काखर हो तुम धिया-पतोहिया, काखर हो भौजाई
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
काखर हो तुम प्रेम-सुंदरी , कौन हरे ले जाई?
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
दसरथ के तुम धिया-पतोहिया, लछमन के भौजाई
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
रामचंद्र के प्रेम-सुंदरी, रावन हर ले जाई
मैं का जानवं, मैं का करवं? मोर राम नई हे ओ
( मैं क्या जानूं, मैं क्या करूं? मेरा राम नहीं है। सीता को रावण हर कर ले जा रहा है। राक्षस रावण जोगी (साधु) का रूप धारण कर आया और कहा- “मुझे भिक्षा दो।“ जब सीता आंगन में भिक्षा लेकर आईं, तो रावण ने उन्हें रथ पर बैठा लिया। तुम किसकी बहू हो? किसकी भौजाई हो? किसकी प्रेम सुंदरी हो और कौन हर कर ले जा रहा है? राजा दशरथ की तुम बहू हो, लक्ष्मण की तुम भौजाई हो, तुम रामचंद्र की प्रेम सुंदरी हो और तुम्हे रावण हर कर ले जा रहा है।)
सीता हरण के बाद राम कुछ इस तरह से विलाप करते हैं-
हर ले गय, हर ले गय, हर ले गय रे
लंका के राजा रावन, जोगी के रूप धरके
सिया ल हर ले गय न।
जंगल-जंगल, पतबत-परबत, राम बइहा बन गिंजरय
आँसू पोंछइया के आंखी ले, झर-झर आंसू झरय
सिया ल हर ले गय न।
चिरई-चिरगुन, फांफा-मिरगा, रूखराई ल पूछय
सिया बिना राम के हिरदे, आगी-अंगरा कस धधके
सिया ल हर ले गय न।
मनि बिन मनिहार सांप, बिन पानी जस मछरी
जानकी बिना राम होगे, बिन पानी के बदरी
सिया ल हर ले गय न।
(लंका का राजा रावण साधु का रूप धारण कर सीता को हर ले गया। जंगल-जंगल, पर्वत-पर्वत, राम पागल की भांति भटक रहे हैं। दूसरों के आंसू पौंछने वाले श्रीराम की आंखों से झर-झर आंसू झर रहे हैं। ये कैसी विडंबना है। राम पशु-पक्षियों से, वृक्षों-लताओं से पूछते हैं कि उनकी सीता कहां है? सीता के वियोग में राम का हृदय अंगारे की तरह दहक रहा है। जैसे मणि के बिना मनिहार सर्प और पानी के बिना मछली जीवित नहीं रह सकते, ठीक उसी तरह राम की स्थिति है। जैसे बिना पानी का बादल हो।)
शबरी प्रसंग लोकगीतों में इस तरह आता है-
सबरी ओ दाई, हाय - हाय सबरी ओ दाई
जूठा-जूठा बोंइर ला खवाये प्रभु राम ल
जूठा-जूठा बोंइर ला खवाये प्रभु राम ल
खदर काड़ी के कुरिया बनाए, डारा-पतेरा छवाये
ओ दाई डारा-पतेरा छवाये
भाव-भक्ति म मगन हो के, तोर घर राम आये
ओ दाई तोर घर राम आये
सबरी ओ दाई, हाय - हाय सबरी ओ दाई
राम भजन में मन लगा के , बन मा जिनगी पहाये
ओ दाई बन मे जिनगी पहाये
देवता-धामी , सुर-नर-ज्ञानी, तोर महिमा ल गाये
ओ दाई तोर महिमा ल गाए।
सबरी ओ दाई, हाय - हाय सबरी ओ दाई
(शबरी माता तुम धन्य हो। तुमने भगवान राम को जूठे बेरों को खिलाया और उनकी कृपा प्राप्त कर ली। घास-फूस की तुम्हारी कुटिया बनी है। जिसमें सूखे पत्तों का छप्पर है। भक्ति-भाव में तुम लीन रहीं। आज तुम्हारी कुटिया में स्वयं श्रीराम आए हैं। राम के भजन में ध्यान लगाकर तुमने सारा जीवन व्यतीत किया है। देवी-देवता, ज्ञानी-ध्यानी व मनुष्य सब तुम्हारी महिमा का बखान कर रहे हैं। सचमुच तुम धन्य हो।)
छत्तीसगढ़ी लोक जीवन में राम कथा का बड़ा व्यापक प्रभाव है। श्रीराम कथा लोकजीवन का आधार है। यह लोक मानस का श्रृंगार है। इसलिए छत्तीसगढ़ के लोगों का जीवन राम के आदर्शो से सराबोर है। यहां का रहन-सहन, सुख-दुख, क्रिया-व्यापार, सभी कुछ लोक गीतों के माध्यम से मुखरित हुआ है। अतः छत्तीसगढ़ी लोक जीवन में ऋषि संस्कृति और कृषि संस्कृति का पूर्ण प्रभाव परिलक्षित होता है। यही छत्तीसगढ़ी लाकजीवन की विशिष्टता है।