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Ayodhya Ram Mandir: भारत की आध्यात्मिक भाव-धारा के केंद्र बिंदु हैं राम

Mon, 22 Jan 2024 04:03 PM IST
अमर शर्मा राकेश कुमार उपाध्याय
राकेश कुमार उपाध्याय Published by: अमर शर्मा Updated Mon, 22 Jan 2024 04:03 PM IST
सार

आध्यात्मिक भाव-धारा राम नाम के बगैर आगे नहीं बढ़ सकती। चाहे उसे निर्गुण रूप में संतों ने देखा, अथवा सगुण रूप में देखा, जिसके अंतर्गत भागवत कथा-धारा पुराणकाल में विकसित हो गई, जिसमें राम और कृष्ण समेत लोकमंगल के लिए भगवान के सभी अवतारों की कथा का समावेश हुआ। विदेशी गुलामी के कठिन काल में स्वामी रामानंद के जीवन से राम-भक्ति का निर्मल कमल पुष्पित हुआ। जिसकी भक्ति-सुधा-सुर-धारा में समस्त भारत भाव विह्वल हो गया।

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Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Ram is the center of India's spiritual sentiment
प्रो. राकेश कुमार उपाध्याय का आलेख - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

- प्रो. राकेश कुमार उपाध्याय
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(लेखक आईआईएमसी, नई दिल्ली में हिंदी पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर हैं)

ऋषियों-मुनि-संतों ने मनुष्य जाति के लिए कलयुग को सबसे कठिन काल माना है, जिसमें धर्म का सर्वत्र लोप होने लगता है, नियम-साधनों का पालन अनेक कारणों से कठिन हो जाता है। ऐसे कठिन काल के लिए सबसे सरल पूजा-विधि नाम सुमिरन, नाम-जप और नाम के गुण-गान-कीर्तन-भजन के रूप में खोजी गई, जिसका आधार राम नाम को बनाया गया। इसीलिए भारतीय सनातन आध्यात्मिक परंपरा में ब्रह्म का अनुसंधान और लक्ष्य सब राम नाम में ही समाहित माना गया है।

राम शब्द के उच्चारण मात्र से ही कंठ से लेकर मष्तिष्क के सर्वोच्च बिंदु सहस्रार तक जो सूक्ष्म विद्युत तरंग दौड़ती है, वह राम नाम के महात्म्य को स्वयं ही प्रकट कर देती है। मनुष्य अपनी समस्त वेदना में, सभी कष्टों में जब बिल्कुल ही निःसहाय रह जाता है, तब भी यह राम नाम उसके भीतर शक्ति का संचार करता है। राम नाम का जाप उसे फिर से दुःख की धूल झाड़कर आनंद मार्ग पर चलने के लिए उत्प्रेरित कर देता है। अंत समय में अगर राम नाम मुख में आ जाए, तो सांसों को भी अनिवर्चनीय आराम मिल जाता है, जिस राम से सांसें शुरू हुईं, उसी राम ध्वनि के वायु रूप में सांसों का लय हो जाना जीवात्मा को परम मुक्ति प्रदान करता है।
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राम ही आराम और राम ही विश्राम। राम के बिना विश्राम नहीं हो सकता। यही शरीर का सत्य है। इस शरीर या देह के अंतिम समय में राम की ध्वनि से स्फुरित श्वांस-वायु जीवन के लिए कारणभूत प्राण-वायु को अपने भीतर समेटकर उसे ओंकार के लक्ष्य तक सहजता से पहुंचा देती है, जो इस जीवन-जगत की अंतिम विश्राम-स्थली है। राम से स्फुरित श्वांस-वायु ही इस कारण से सहजयान है, महायान है जो जीव को उस गंतव्य तक पार उतारता है, जहां से सब कुछ आता है, जहां सब कुछ चला जाता है। 
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संतों की अनुभूति रही है कि ओंकार को साकार रूप देने वाले निर्गुण राम दशरथ पुत्र श्रीराम के सगुण रूप में मनुष्य शरीर में साक्षात उपस्थित हो गए थे। सब जगत के कारण वह राम संपूर्ण मानवता के लिए मर्यादा रूप होकर आदर्श बन गए। जीवन जीना है, तो देखो कैसे राम ने जी लिया, तिनके की तरह राज्य और सर्वस्व त्याग दिया किंतु धर्म के मर्यादा पथ का उल्लंघन नहीं किया। लोक के सुख के लिए अपना सुख छोड़ दिया। लोक के सुख-दुख से अपना सुख-दुख समवेत मिलाकर लोक को भयमुक्त और भरपूर कर दिया।

भारतीय प्रज्ञा की परंपरा में यह तथ्य सदैव रेखांकित है कि परमात्मा लोक के लिए लोक में ही जीते और रहते हैं। लोक-जीवन परमात्मा का ही मंदिर है, जनता ही जनार्दन है, इस जन के लिए ही राम जीते हैं। राम अंतर्यामी बनकर लोक की वेदना स्वयं सहते हैं, शरीर और लोक का सब सहन करते हुए उसे सब सहने की शक्ति प्रदान करते हैं। इसीलिए शिवजी उमाजी से कहते हैं- गुणातीत सचराचर स्वामी, राम उमा सब अंतरजामी। 
अर्थात- हे पार्वती सुनो, श्रीराम तीनों गुणों यानी सात्विक, राजसिक, तामसिक, से परे हैं, वह चर और अचर यानी मनुष्य-पशु-पक्षी-कीट-पतंगे और वृक्षादि फल-फूल-अन्न एवं वनस्पतियों के कारण हैं। संपूर्ण जगत उन्हीं से है, वह सबके भीतर ही विराजमान हैं।

यही कारण है कि भारत की आध्यात्मिक भाव-धारा राम नाम के बगैर एक कदम आगे नहीं बढ़ सकती। चाहे उसे निर्गुण रूप में संतों ने देखा, अथवा सगुण रूप में देखा, जिसके अंतर्गत भागवत कथाधारा पुराणकाल में विकसित हो गई, जिसमें राम और कृष्ण समेत लोकमंगल के लिए भगवान के सभी अवतारों की कथा का समावेश हुआ। कालांतर में विदेशी गुलामी के कठिन काल में स्वामी रामानंद के जीवन से राम-भक्ति का निर्मल कमल पुष्पित हुआ। जिसकी भक्ति-सुधा-सुर-धारा में समस्त भारत भावविह्वल हो गया। कबीर ने भी जिन्हें गाया और गोस्वामी तुलसीदास से लेकर संत रविदास तक, समस्त संतशक्ति के भीतर उस पराधीनता के कालखंड में जो आत्मज्योति, प्रकाश और शक्ति स्वरूप बनकर प्रकट हुए। 

भक्ति आंदोलन के भी सैकड़ों वर्ष पूर्व आज से 2000 साल पूर्व, जब पश्चिमी देशों में सर्वत्र बर्बरता अट्टहास कर रही थी और जिसके द्वारा प्रेरित विषाणु शक-हूण आदि बर्बर शक्तियों के आक्रमण भारत के लोकजीवन को त्रस्त कर रहे थे, तब उस कष्टकाल, बाह्य आक्रमणकाल में सुदर्शन चक्रधारी भगवान विष्णु के धनुर्धारी स्वरूप को हमारी राजनीति ने अपने सम्मुख प्रकट किया। शार्ङग धनुष को धारण करने वाले भागवत भगवान विष्णु को भारतीय शासन ने अपना आदर्श घोषित किया। फन उठा कर सदा फुफकारने वाले देश-शत्रुओं का पलक झपकते ही भक्षण कर शत्रु के समूल विनाश की कूटनैतिक एवं राजनैतिक प्रज्ञा से संपंन्न पक्षीराज गरुड़ को तब भारत ने अपना राष्ट्रचिन्ह बना लिया।

भागवत प्रेरित शासन व्यवस्था निर्मित करने वाला वह महान गुप्तवंशीय शासन आज भी हमारे इतिहास में स्वर्णिम युग माना गया है जिसमें से निकली विक्रमादित्य रूपी शासक परंपरा ने अयोध्या समेत समस्त भारत किंवा विश्वभर में भगवान विष्णु के धनुर्धारी स्वरूप अर्थात श्रीराम की प्रतिमा को जन-मन का वास्तविक शासक मानकर भारतीय राज्य को प्रजा के चरण कमलों की सेवा के लिए ही मानो सदा के लिए प्रस्तुत कर दिया। 

स्कंदगुप्त विक्रमादित्य का नाम इस दृष्टिकोण से उल्लेखनीय है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद के भितरी ग्राम में जो विजय स्तंभ और शिलालेख खुदवाया, वह हूणों के समूल विनाश के विजय उत्सव के फलस्वरूप धनुर्धारी भगवान विष्णु अर्थात प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण के संदर्भ में ही आज से 1600 वर्ष पूर्व उत्कीर्णित किया गया था। त्रेतायुग से प्रवाहित होती आ रही श्रीराम की आदर्श परंपरा को गुप्तकाल में नवीन आधार मिला। उनका विग्रह भारत के गांव-गांव में अपने महान स्थापत्य और सर्वांग सुंदर सभी के भरण-पोषण-सुंदर स्वास्थ्य और लोकमन-रंजन की व्यवस्था के साथ जन-जीवन का आदर्श बना।

इसके अंतर्गत आयुर्वेद, धनुर्वेद, स्थापत्यवेद, गांधर्ववेद आदि वेदों के समस्त उपवेदों की ज्ञान गंगा में सभी वर्ण और सभी जाति-उपजाति, संप्रदाय और यहां तक कि विदेशों से आने वाले ज्ञानपिपासु इच्छुक म्लेच्छ लोग भी सुसंस्कृत और उपकृत हुए। तक्षशिला से नालंदा, काशी से कांची, नवद्वीप से ब्रह्म देश और सुवर्णभूमि, द्वारिका से जगन्नाथपुरी और कश्मीर से गांधार व कन्याकुमारी तक ज्ञान-विज्ञान के महान केंद्र नए सिरे से चमक-दमक उठे। उस समय लौकिक सुख-समृद्धि के आधार स्वरूप शिक्षा-कला-कौशल में भारत का आम आदमी संसार का सबसे अधिक हुनरमंद उत्पादक घटक माना और जाना जाने लगा, तो यह हर आत्मा के भीतर उपस्थित परमात्मा स्वरूप श्रीराम की ओर निरंतर देखने और प्रत्येक कार्य में उनकी छवि को निरखकर कर्मयोग को भगवान की भक्ति का महामंत्र मानने के कारण ही भारत ने संभव कर दिखाया था। कुशलता और संपूर्ण प्रतिभा के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ प्रकट करना, अपने कुशल कर्म से, उत्पादन से सर्वत्र हर ओर भगवान की कर्ममय पूजा करना ही प्रत्येक भारतवासी का धर्म बन गया।

आज फिर वही श्रीराम अयोध्या में भारत की राजनीति के आदर्श रामराज्य की संकल्पना को साकार देखने के लिए अपने वैभव के साथ अपनी जन्मभूमि पर नवीन आभा के साथ पुनः विराजमान हो गए हैं। संपूर्ण मानवजाति के लिए भारत की ओर से नियति का यह संदेश सुना और सुनाया जाना ही चाहिए कि राम सभी के हैं, सभी जन राम के ही हैं। वह मर्यादा के आदर्श हैं, समन्वय के आधार हैं, जीव की सद्गति हैं, निरंतर सृजित होते और मिटते जीवन की वह चिर ध्वनि और संजीवनी हैं।


अपने स्व में सदैव विराजमान राम रूपी अमृत को पाकर ही मानवता सदा के लिए संतुष्ट और सुखी हो सकती है। सदियों के बाद भारत में हो रहे इस चिरप्रतिक्षित नव-विहानकाल को घटित होते देख अयोध्या समेत भारत का वर्तमान आनंदित हो उठा है, उसका लोक प्रसन्न होने लगा है और सारा काला-कलुष-कल्मष-कलप-कलाप विलाप करते हुए मिट रहा है। यह भविष्य की आहट है कि घने अंधेरे अब संसार के प्रांगण से विदा होंगे और सत्य का सूर्य सर्वत्र एक समान प्रकाश देता हुआ प्रकट होकर ही रहेगा। भाग्यवान है यह पीढ़ी और वे लोग, जो इस राम-कार्य के साक्षी और कारण बने हैं।

उससे भी बड़भागी हैं वे, जिन्होंने अपना सर्वस्व राम-काज के लिए समर्पित किया है। हमें भारत के हर गांव में राम के उसी संकल्प की प्रतिष्ठा करनी होगी, जिसके बिना प्राचीन भारत में ग्राम का रूप बन ही नहीं सकता था। राम हमारे जीवन के सुख के कारण रूप ग्राम हैं, तो समस्त संकटों से जीवन को मुक्ति दिलाने वाले संग्राम भी हैं। ऐसे राम की साधना जब तक भारत करेगा, वह अपने आत्मनिर्भर ध्येयपथ पर अविकल चलता रहेगा, ऐसा हमारे पूर्वजों का पूर्वकाल से हमें दिया गया पाथेय है। 

रामाय रामचंद्राय रामभद्राय वेधसे। 
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम:।।
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