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Hindi News ›   Ram Mandir ›   Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Ram is most awakened noun of conscious-subconscious mind

Ayodhya Ram Mandir: चेतन-अवचेतन मन की सर्वाधिक जागृत संज्ञा हैं राम

Mon, 01 Jan 2024 07:53 PM IST
अमर शर्मा रवि पाराशर
रवि पाराशर Published by: अमर शर्मा Updated Mon, 01 Jan 2024 07:53 PM IST
सार

गांवों में परंपरा है कि किसी अपरिचित के सामने पड़ते ही या तो आपके मुंह से राम राम निकलता है या फिर वह राहगीर आपको राम राम कहते हुए निकलता है। आपसी अभिवादन की यह रीति कितनी सकारात्मक और जोड़ने वाली है, यह समझ में आता है। चौंकते या अवाक रह जाने के समय हमारे मुंह से बेतहाशा निकता है- हे राम! या हाय राम! इसी तरह जब कोई निषिद्ध वस्तु हमारे सामने आती है, तो बरबस ही मुंह से निकलता है राम राम! अर्थ यह हुआ कि राम हमारे जीवन में, चेतना में तो सांसों की तरह रचे-बसे हैं ही, हमारे अवचेतन में भी समाए हुए हैं।

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Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Ram is most awakened noun of conscious-subconscious mind
रवि पाराशर का आलेख - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

अयोध्या में राम लला का भव्य राष्ट्र मंदिर का निर्माण सभी भारतीय नागरिकों के लिए सदियों पुराने सपने के पूरे होने जैसा है। मंदिर निर्माण के लिए धन कोई भी आस्थावान धनी व्यक्ति, संस्था या समूह देने को सहर्ष तैयार हो जाता, लेकिन इसके लिए भारतीय सनातन चेतना की मूर्त-अमूर्त सर्वाधिक जागृत संज्ञा राम पर भरोसा रखने वाले सभी भारतीय नागरिकों को अवसर दिया गया।
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सामाजिक सनातन ताने-बाने में राम इस तरह रचे-बसे हैं कि उन्हें जब हम सायास सोच रहे होते हैं, तब तो उनकी अमृतमयी छवि हमारे अंतर्मन में उभरती ही है, लेकिन दिन भर में हम बहुत बार उन्हें बिना उनकी छवि निहारे भी स्मरण करते रहते हैं। किसी मूर्त रूप के इस तरह अदृश्य होकर हमारे सामाजिक जीवन में घुल-मिल जाने का कोई और दूसरा अप्रतिम उदाहरण नहीं मिलता। राम हमारे जन्म से लेकर दैनंदिन क्रियाकलापों तक और फिर मृत्यु के समय किए जाने वाले संस्कारों तक में अनिवार्य रूप से समाए हुए हैं।
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भारत की आत्मा ग्रामीण जीवन में बसती है। हम सबके पुरखे गांवों में ही रहते थे। गांवों में आज भी परंपरा है कि भले ही आप किसी राहगीर से परिचित नहीं हों, लेकिन सामने पड़ते ही या तो आपके मुंह से राम राम निकलता है या फिर वह राहगीर आपको राम राम कहते हुए निकलता है। गहराई से सोचें, तो आपसी अभिवादन की यह रीति कितनी सकारात्मक और परस्पर जोड़ने वाली है, यह समझ में आता है। यह तो नहीं पता कि अभिवादन के लिए राम राम कहने की परंपरा भारतीय काव्य जगत के भक्तिकाल में पड़ी या पहले से ही चली आ रही है, लेकिन इतना अवश्य समझ में आता है कि 16वीं शताब्दी में बादशाह अकबर के दीन-ए-इलाही को प्रचलित करने के प्रयासों के कारण सनातनी परंपराओं के पोषक समाज में राम राम रटने की प्रथा प्रतिक्रियावश और अधिक प्रचलित हुई होगी। आज भी गांवों में राम राम बोल कर अभिवादन किया जाता है। केवल सनातन समाज के लोग ही राम राम बोलते हों, ऐसा नहीं है। गांव में रहने वाले मुसलमान या दूसरे धर्मों को मानने वाले भी आपको राम राम बोलते हुए या आपके राम राम बोलने पर राम राम कह कर ही जवाब देते मिल जाएंगे।
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इस तरह के और भी बहुत से उदाहरण मिलते हैं, जिन पर हम प्राय: ध्यान नहीं देते। जैसे कि चौंकते हुए या अवाक रह जाने के समय हमारे मुंह से बरबस निकता है हे राम! या फिर हाय राम! इसी तरह जब कोई निषिद्ध वस्तु हमारे सामने आती है, तो हमारे मुंह से अनायास ही निकलता है राम राम! कहने का अर्थ यह हुआ कि राम हमारे जीवन में, चेतना में तो सांसों की तरह रचे-बसे हैं ही, हमारे अवचेतन में भी समाए हुए हैं। सांस लेना अनैच्छिक क्रिया है। हम निरंतर सांस लेते रहते हैं, लेकिन हमें हर क्षण इसका कोई भौतिक अनुभव नहीं हो रहा होता। इसी तरह राम हमारी समस्त चेतना में अनिवार्य रूप से सम्मिलित हैं, भले ही इसका अनुभव हम हर क्षण कर पाते हों या नहीं।

जागृत चेतना ही नहीं, राम तो हमारी अवचेतन अवस्थाओं में भी समाए हैं। राम का स्मरण आते ही एक विचार मन में अक्सर आता है कि सत्य क्या होता है? राम नाम सत्य है, तो क्यों? अगर राम नाम सत्य है, तो यह एक ही अवस्था के लिए सत्य है या फिर हर समय सत्य है? अगर राम नाम सत्य है, तो घर, मंदिर या कहीं पर नियमित पूजा-पाठ करते समय हम क्यों नहीं बोलते कि राम नाम सत्य है? अगर राम नाम सत्य है, तो क्या कृष्ण या फिर दूसरे अवतारों का नाम भी सत्य है? अगर हां, तो फिर सनातन धर्मानुयायी शव-यात्रा के दौरान ऐसा क्यों नहीं कहते कि कृष्ण नाम सत्य है? प्रश्न यह भी है कि क्या कोई नाम किसी विशेष शब्द समुच्चय और क्रिया विशेष से किसी भी तरह जुड़ जाए, तो वह अन्यथा वर्जित हो सकता है?

राम हमारे भगवान हैं, यह सार्वभौमिक सत्य है, तो शव-यात्रा में शामिल कुटुंबियों, मित्रों और आसपास से गुजर रहे लोगों को यह बताने की जरूरत क्यों पड़ती है कि राम नाम सत्य है? क्यों शव यात्रा के दौरान लगातार सिर्फ राम-राम, राम-राम बोलने की परंपरा नहीं पड़ी? यदि माता कौशल्या और पिता दशरथ ने अपने ज्येष्ठ पुत्र का नाम राम नहीं रखकर कुछ और रखा होता, तब भी उस युग के महानायक होने के नाते उन्हें भगवान का स्तर मिलना तय था। ऐसी अवस्था में हम बोल रहे होते- ..... नाम सत्य है!! हालांकि यह सत्य है कि हिंदुओं की शव-यात्राओं के दौरान ‘राम नाम सत्य है’ का उच्चार किया जाता है, लेकिन जरा सोचें कि राम का नाम सत्य होते हुए भी क्रियाकर्म की यह लीक क्यों पड़ी होगी? समझ में यह आता है कि ‘राम नाम सत्य है’ के उच्चारण में सत्य संदेश यही है कि मृत्यु ही अटल सत्य है, इसका ध्यान रखा जाए और जीवन में ऐसा कोई काम न किया जाए, जिससे किसी को चोट पहुंचे। इसलिए सत्य बोलने में ही जीवन की गति है और यदि व्यक्ति राम के नाम का स्मरण करता रहेगा, तो फिर वह असत्य की ओर जाने से बच सकेगा। भारतीय सनातन परंपराओं में राम को किस तरह आत्मसात किया गया है, इसे समझने के लिए इससे उचित उदाहरण नहीं मिलेगा।

अयोध्या में भव्य दिव्य राम लला मंदिर इस बात का उदाहरण है कि सामूहिक चेतना से जो काम होते हैं, उनमें अलग ही आनंद की अनुभूति होती है। आज भारतीय चेतना पूरी दुनिया के संचालन में अहम भूमिका निभा पा रही है, तो ऐसा हमारे पूर्वज भगवान राम की ही विशेष अनुकंपा के कारण हो पा रहा है। जय सियाराम!


- रवि पाराशर 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्क्रिप्ट राइटर और साहित्यकार हैं। प्रिंट और टीवी न्यूज चैनलों में विभिन्न पदों पर रहे हैं। कई विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर हैं।)
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