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Ayodhya Ram Mandir: छत्तीसगढ़ के रोम-रोम में बसते हैं भगवान राम

Sat, 20 Jan 2024 11:48 PM IST
अमर शर्मा ललित शर्मा
ललित शर्मा Published by: अमर शर्मा Updated Sat, 20 Jan 2024 11:48 PM IST
सार

छत्तीसगढ़ माता कौशल्या का मायका है। कोसल के राजा भानुमंनुतमं की पुत्री कौशल्या भगवान राम की माता हैं। यहां भांजों को श्रेष्ठ स्थान दिया जाता है एवं मामा भांजों के पैर छूते हैं। भांजा सारे गांव का होता है। पूरा गांव उसका नाम न लेकर भांजा कहता है, क्योंकि भगवान राम यहां के भांजे हैं और प्रत्येक भांजा राम सदृश्य ही मान पाता है।

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Ayodhya Ram Mandir Inauguration Ramlala Lord Shri Ram resides in every pore of Chhattisgarh
Ramlala - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

- ललित शर्मा
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भारत के मानचित्र में हृदय स्थल पर छत्तीसगढ़ प्रदेश स्थित है। मान्यता है कि वहां भगवान राम ने वनवास के 14 वर्षों में से 12 वर्ष बिताए। प्रदेश का पूरा वाता वरण राम मय है। स्थान वाचक और नामवाचक संज्ञा के रूप में राम का प्रयोग होता है। राम भक्ति की पराकाष्ठा तब हो जाती है, जब व्यक्ति अपने सर्वांग में राम नाम का गोदना गुदगुवा लेता है। यहां तक कि पलकों पर भी राम नाम गोदा हुआ दिखाई देता है। यह किसी एक व्यक्ति की बात नहीं है, पूरा रामनामी समुदाय ऐसा करता है। राम भक्ति की ऐसी अद्वितीय मिसाल विश्व में कहीं नहीं मिलेगी।

छत्तीसगढ़ में बच्चे के जन्म लेने पर रामचरित मानस का पाठ करने की परंपरा है। गांव-गांव में रामचरित मानस गान एवं व्याख्यान करने वाले दल होते हैं, जो निमंत्रण पर आकर रात्रि काल में सार्वजनिक रूप से मानस का पाठ करते हैं। टीका सुनते हैं एवं सस्वर गान करते हैं। कहीं-कहीं यह कार्यक्रम रात भर भी चलता है। रामायण दल को गृहस्वामी द्वारा धन-धान्य देकर विदा किया जाता है।
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ग्रामीण अंचल में राम सप्ताह मनाने की भी परंपरा है। किसान जब फ़सल कटने के बाद अवकाश पा लेता है, तब गांव गांव में राम सप्ताह का आयोजन होता है। इसमें आस-पास के गांवों की टोली मिलकर अखंड राम भजन करती हैं। कहीं सप्ताह भर यह अखंड आयोजन होता है तो कहीं दो-तीन दिन का। राम धुन पर नाचते-गाते यह कार्यक्रम तय सीमा तक अनवरत चलता है।
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प्रदेश की खेती भी राम पर ही आश्रित मानी जा सकती है। राम की चिड़िया, राम का खेत, खाए जा चिड़िया भरपेट। किसान जब खेत में धान की बुआई करता है, तो राम को सुमिरता है। गांव के ठाकुर देव की आराधना करता है, ग्राम देवता  एवं खेती के रक्षक देवों का सुमिरन करता है। जब फसल तैयार हो जाती है और खलिहान में लाकर निकाल कर रास सजा ली जाती है, तो काठा (काठ का माप) से नापते हुए भी राम का सुमिरन किया जाता है। 

राम नाम से ही फसल का नाप प्रारंभ होता है। अपनी साल भर की कमाई राम को समर्पित कर देना राम के प्रति समर्पण का उदात्त भाव है। छत्तीसगढ़ माता कौशल्या का मायका है। कोसल के राजा भानुमंनुतमं की पुत्री कौशल्या भगवान राम की माता हैं। यहां भांजों को श्रेष्ठ स्थान दिया जाता है एवं मामा भांजों के पैर छूते हैं। भांजा सारे गांव का होता है। पूरा गांव उसका नाम न लेकर भांजा कहता है, क्योंकि भगवान राम यहां के भांजे हैं और प्रत्येक भांजा राम सदृश्य ही मान पाता है।

बचपन में खेलते हुए हम कहते थे कि "गंगा ले गोदावरी जा बो, पाका पाका बेर खाबो ।" उस समय यह सहज मनोरंजन था। इसका शब्दार्थ ज्ञात नहीं था । परंतु इन शब्दों में गूढ़ बातें छिपी हैं कि गंगा से लेकर गोदावरी के मध्य का क्षेत्र दंडकारण्य है। यह उस सीमा को दर्शाता है, जहां भगवान राम ने वनवास व्यतीत किया था। जनश्रुतियों में इतिहास छिपा होता है। जब राम ने दंडकारण्य में निवास किया है, तो उसके साक्ष्य भी हमें लोकमान्यताओं, लोकगीतों, लोक कथाओं में मिलते हैं। गंगा के मीरजापुर से लेकर गोदावरी तट के भद्राचलम तक फैले दंडकारण्य में राम हर जगह किसी न किसी रूप में दिखाई देते हैं। महाजनपद काल में उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाला मार्ग दक्षिणापथ कहलाता था। मान्यता है कि दक्षिणापथ मार्ग होने के कारण भगवान राम ने इसी मार्ग से दक्षिण में प्रवेश किया था। लोकमान्यताओं के रूप में स्थान-स्थान पर इसके साक्ष्य मिलते हैं।

सरगुजा अंचल के कोरिया जिले की भरतपुर तहसील के जनकपुर नामक स्थान में सीतामढ़ी हरचौका नामक प्राचीन एवं पुरातत्व महत्व की गुफा है। यहां मवई नदी के तट पर रखे एक शिलाखंड पर चरण चिन्ह मिलते हैं, जिनकी लोग श्री राम चरण चिन्ह मान कर पूजा करते हैं। यहां से भगवान राम का छत्तीसगढ़ में प्रवेश होता है। सरगुजा को गजों की भूमि कहा जाता है। वहां वनों में निवास करने वाले हाथियों के विषय में कहा जाता है कि ये इंद्र के एरावत जैसे से सुंदर एवं बलशाली हैं। इसी के आधार पर अंचअ का नाम सरगुजा माना जाता है। जिला मुख्यालय अंबिकापुर बिलासपुर मार्ग पर उदयपुर कस्बे के समीप रामगिरि पर्वत है। मान्यता है कि भगवान ने वहां चौमासा किया। रामगिरि पर्वत को रामगढ़ कहा जाता है। वहां पर्वत के शिखर पर प्राचीन दुर्ग के अवशेष मिलते हैं तथा रामदरबार की प्राचीन प्रतिमाएं भी वहां स्थापित हैं। वहां विश्व की सबसे प्राचीन नाट्यशाला भी सीता बेंगरा नामक गुफा में है। साथ ही जोगीमाड़ा गुफा भी है।

वनवास काल में सीता के निवास करने के कारण इस गुफ़ा को सीता बेंगरा गुफा कहा जा ता है। इस गुफा के पार्श्व में स्थित गुफा को लक्ष्मण बेंगरा कहा जाता है। सीता बेंगरा एवं जोगीमाड़ा गुफाओं में ब्राह्मी लिपि के लेख मिलते हैं। वहां रामनवमी को भव्य मेला भरता है। समीप ही पंपापुर नामक स्थान मांड नदी के पास ही है।

इसके साथ ही मल्हार, जांजगीर, चांपा, कोरबा भी प्राचीन नगर हैं। मल्हार तो मौर्यकार्य कालीन बड़ा नगर एवं राजधानी था, जहां पुरातात्विक उत्खनन में प्राचीन देवालयों के अवशेषशे प्राप्त हुए हैं। मल्हार से आगे बढ़ने पर महानदी, शिवनाथ एवं जोंक नदी का संगम है। इस नगर को शबर राजकुमारी शबरी से संबंधित बताया जाता है। इसे छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरी भी माना जाता है। प्राचीन मान्यता है कि प्रत्येक माघ मास में भगवान जगन्नाथ शिवरी नारायण में विराजते हैं। इसलिए माघ पूर्णिमा से शिवरात्रि तक वहां बड़ा मेला लगता हैं। इसके समीप ही खरौद गांव है, जहां छठी शताब्दी का प्राचीन शिवालय है, जिसमें लक्षेश्वर महादेव स्थापित हैं और इसे लक्ष्मणेश्वर मंदिर कहा जाता है। कसडोल के नारायणपुर में प्राचीन मंदिर है, जो अपनी मिथुन  प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध है। इससे आगे चलने पर वन क्षेत्र में तुरतुरिया नामक स्थान है, इसे महर्षि वाल्मिकि का आश्रम माना जाता है एवं किवदंती है कि सीता जी ने निर्वा सन के पश्चात वहीं लव एवं कुश को जन्म दिया था। 

वहां से आगे बढ़ने पर छतीसगढ़ की प्राचीन राजधानी श्री पुर (सिरपुर) है। वहां से हम राजिम पहुंचते हैं, जिसे धर्म क्षेत्र कहा जाता है। वहां सोंढूर, पैरीपैरी एवं महानदी का त्रिवेणी संगम है, जिसे प्रयाग जैसी मान्यता मिली हुई है। वहां संगम पर ऊंचे अधिष्ठान पर कुलेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। मान्यता है कि शिवपूजन के लिए सीता ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया। लोमस ॠषि आश्रम है। मान्यता है कि वहां भी राम ने निवास किया था। प्रति वर्ष वहां पर माघी मेले का आयोजन होता है, जिसे राजिम कुंभ नाम मिल गया है। लोमस ॠषि आश्रम से आगे चलने पर सिहावा के सप्त ॠषि पर्वतों की श्रृंखला है। इसे शुक्षुतमान पर्वत श्रेणी कहा जाता है। वहां महानदी का उद्गम है। इस पर्वत श्रेणी में माना जाता है कि श्रृंगी ॠषि, अगस्त्य ॠषि, अंगिरा ॠषि, महर्षि गौतम, शरभंग ॠषि, मुचकुंद ॠषि तथा कंक ॠषि के आश्रम थे। कंक पर्वत से निकलने के कारण शास्त्रों में वर्णित चित्रोत्पला गंगा महा नदी का एक नाम कंक नंदिनी भी पड़ा। पुत्रेष्टि यज्ञ के लिए राजा दशरथ की पुत्री शांता के पति श्रृंगी ॠषि वहीं से अयोध्या गए थे। वहां से आगे बढ़ने पर बस्तर की भूमि प्रारंभ हो जाती है।


यह दंडकारण्य क्षेत्र ॠषि-मुनियों की तपो भूमि रहा है। बस्तर अंचल में वर्तमान में भी मंदिर, देवालयों के भग्नावशेषशे मिलते हैं। बस्तर भूमि से गुजरते हुए राम गोदावरी के तट पर स्थि  भद्रा चलम तक जाते हैं एवं वहां से लंका पहुंचते हैं। इस तरह छत्तीसगढ़ अंचल भगवान राम की लीला स्थली रहा है, जहां कण-कण में राम बसते हैं, तो जन-जन के हृदय संग रोम-रोम में भी राम निवास करते हैं।
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